

उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में आयोजित विधानसभा का बजट सत्र इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा। यह सत्र ऐसे समय में आयोजित हुआ जब राज्य के मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami के नेतृत्व वाली सरकार अपने चार वर्ष पूरे होने की दहलीज पर खड़ी है। इसलिए इस सत्र को केवल एक औपचारिक विधायी प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इसे सरकार की नीतियों, उपलब्धियों और जनता की अपेक्षाओं के बीच टकराव के रूप में भी समझा जा सकता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
9 मार्च से प्रारंभ हुए इस बजट सत्र में सदन की कार्यवाही कुल 41 घंटे 10 मिनट तक चली, जो घंटों के लिहाज से अब तक का सबसे लंबा सत्र माना जा रहा है। इस दौरान वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट पारित किया गया, साथ ही 12 विधेयकों को मंजूरी दी गई और चार अध्यादेशों को भी सदन ने स्वीकृति प्रदान की।
उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं ने बजट सत्र पर उठाए सवाल
Kashi Singh Airy, Puspush Tripathi, Ashish Negi, Ashutosh Negi और Pramila Rawat ने गैरसैंण में संपन्न विधानसभा के बजट सत्र पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया है।
संयुक्त बयान में नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड राज्य का गठन केवल बजट के आंकड़े बढ़ाने या घोषणाओं की राजनीति के लिए नहीं हुआ था, बल्कि इसकी मूल अवधारणा पहाड़ के लोगों को सम्मानजनक जीवन, रोजगार, मजबूत स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था तथा गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने से जुड़ी हुई थी।
उन्होंने कहा कि राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी इन मूल मुद्दों पर सरकारें गंभीर नहीं दिखाई देतीं। आज भी युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, पहाड़ों से पलायन जारी है और स्वास्थ्य व शिक्षा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
नेताओं ने आरोप लगाया कि जब जनता शांतिपूर्वक अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरती है तो सरकार संवाद के बजाय पुलिस बल का सहारा लेती है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं ने कहा कि गैरसैंण में हुए बजट सत्र में राज्य आंदोलन की मूल भावना को नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने सरकार से मांग की कि राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों को केंद्र में रखकर नीतियां बनाई जाएं, अन्यथा जनता का आक्रोश और बढ़ेगा।
सत्र के दौरान विधानसभा को 50 अल्पसूचित प्रश्न और 545 तारांकित प्रश्न प्राप्त हुए, जिनमें से 291 प्रश्नों के उत्तर सदन में दिए गए। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि सदन में विधायी सक्रियता दिखाई दी और कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा भी हुई। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सदन के भीतर की यह सक्रियता वास्तव में जनता की वास्तविक समस्याओं के समाधान तक पहुंच पा रही है या नहीं।
राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने अपने आक्रामक और मुखर राजनीतिक अंदाज में विपक्ष, विशेषकर Indian National Congress पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार केवल घोषणाएं करने वाली नहीं बल्कि उन्हें जमीन पर उतारने वाली सरकार है। मुख्यमंत्री के अनुसार “मुख्य सेवक” के रूप में की गई 3885 घोषणाओं में से 2408 घोषणाएं पूरी हो चुकी हैं और शेष पर तेजी से कार्य चल रहा है।
मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि एक समय प्रदेश में खनन गतिविधियां बाहुबलियों के भरोसे छोड़ दी गई थीं और राजस्व माफिया के हाथों में चला जाता था। उनके अनुसार उस समय खनन से मिलने वाला राजस्व करीब 400 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1200 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है।
सरकार के आर्थिक आंकड़ों का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि पिछले चार वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। राज्य का बजट आकार 60 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है और प्रति व्यक्ति आय में लगभग 41 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके साथ ही राज्य में 20 हजार से अधिक नए उद्योग स्थापित हुए हैं और स्टार्टअप की संख्या 700 से बढ़कर 1700 तक पहुंच गई है।
लेकिन राजनीतिक विमर्श का दूसरा पक्ष भी है, जो सदन के बाहर सड़कों पर दिखाई देता है। उत्तराखंड राज्य के गठन का सपना केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं था। यह सपना स्थाई राजधानी, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन जैसे मूल मुद्दों से जुड़ा हुआ था। आज भी इन सवालों को लेकर लोग शांतिपूर्वक सड़कों पर उतर रहे हैं और अपनी मांगों को उठा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी कई मूल प्रश्न अनसुलझे हैं। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग, पहाड़ों में स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाल स्थिति, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के आरोप—ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जो समय-समय पर सरकारों को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं।
सरकार विकास के आंकड़े प्रस्तुत कर रही है, लेकिन दूसरी ओर जनता का एक वर्ग यह भी कह रहा है कि जब-जब आंदोलन तेज होते हैं, तब-तब प्रशासन और पुलिस का सहारा लेकर उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। लोकतंत्र में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या जनता की आवाज को केवल व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर दबाया जा सकता है, या फिर इन मुद्दों का स्थायी समाधान खोजने की जरूरत है।
गैरसैंण में संपन्न यह बजट सत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तराखंड की राजनीति केवल विकास के आंकड़ों की नहीं, बल्कि जनभावनाओं, आंदोलनों और मूल राज्य आंदोलन की अवधारणा की भी राजनीति है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और विपक्ष दोनों मिलकर उस मूल भावना को समझें जिसके लिए उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ था। जब तक स्थायी राजधानी, पहाड़ों में रोजगार, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और पारदर्शी शासन जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति नहीं होगी, तब तक बजट सत्रों की उपलब्धियां अधूरी ही मानी जाएंगी।
गैरसैंण का यह सत्र एक संदेश जरूर देता है—सदन के भीतर विकास के दावे हैं, लेकिन सदन के बाहर जनता के सवाल भी उतने ही मजबूत हैं। लोकतंत्र की असली कसौटी यही है कि इन दोनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाता है।




