

रुद्रपुर।उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और प्रकृति से जुड़ी परंपराओं का प्रतीक लोकपर्व फूलदेई इस वर्ष भी पूरे प्रदेश में उत्साह, उल्लास और सांस्कृतिक रंगों के साथ मनाया गया। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक पर्वतीय समाज में इस बालपर्व की अनूठी छटा देखने को मिली। यह ऐसा पर्व है जिसमें मुख्य भूमिका बच्चों की होती है और उनके मासूम कदमों से ही परंपराओं की खुशबू घर-घर तक पहुंचती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
फूलदेई पर्व के अवसर पर उधम सिंह नगर जिले के रुद्रपुर, शांतिपुरी और आसपास के पर्वतीय समाज बहुल क्षेत्रों में सुबह से ही उत्सव जैसा वातावरण दिखाई दिया। छोटे-छोटे बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे घरों की देहरियों पर फूल डालते हुए समृद्धि और खुशहाली की कामना करते नजर आए। “फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार…” जैसे पारंपरिक गीतों की गूंज से वातावरण पूरी तरह लोक संस्कृति के रंग में रंग गया।
पर्व के दौरान बच्चों की टोलियां घर-घर पहुंचीं और देहरी पर रंग-बिरंगे फूल अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। बदले में घरों के बुजुर्गों और महिलाओं ने बच्चों को गुड़, चावल, मिठाई और अन्य उपहार देकर आशीर्वाद दिया। यही इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें बच्चों को सम्मान और स्नेह मिलता है और समाज में अपनत्व की भावना मजबूत होती है।
रुद्रपुर में पर्वतीय समाज से जुड़े विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए। बच्चों को लोकपर्व के महत्व के बारे में बताया गया और पारंपरिक गीतों के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया गया।
इस अवसर पर उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद की ओर से प्रदेशवासियों को फूलदेई पर्व की शुभकामनाएं दी गईं। परिषद से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह पर्व बच्चों, प्रकृति और संस्कृति के संगम का प्रतीक है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।
सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा प्रेमी शैल सांस्कृतिक समिति रुद्रपुर गोपाल सिंह पटवाल ने अपने संदेश में कहा कि फूलदेई पर्व उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान है। उन्होंने कहा कि इस पर्व में बच्चों की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण होती है और यही बच्चे भविष्य में हमारी संस्कृति के संवाहक बनते हैं।
शैल सांस्कृतिक समिति रुद्रपुर फूल दे ई पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि फूलदेई हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और समाज में प्रेम व सौहार्द का संदेश देता है।
पर्वतीय समाज समिति रुद्रपुर के अध्यक्ष गिरीश चंद्र जोशी ने कहा कि पर्वतीय समाज की असली पहचान उसकी लोकसंस्कृति से है और फूलदेई जैसे पर्व उस पहचान को जीवंत बनाए रखते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की टोली जब घर-घर जाती है तो समाज में अपनापन और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।
इसी प्रकार पर्वतीय उत्थान मंच हल्द्वानी के वरिष्ठ सदस्य हुकम सिंह कुंवर ने कहा कि यह पर्व बच्चों के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य करता है। गांव और शहरों में बच्चों की भागीदारी इस पर्व को और अधिक जीवंत बनाती है।
शांतिपुरी से सामाजिक कार्यकर्ता गणेश उपाध्याय ने भी प्रदेशवासियों को फूलदेई की बधाई देते हुए कहा कि पर्वतीय संस्कृति में हर त्योहार का केंद्र परिवार और बच्चे होते हैं। इस दिन घरों में बच्चों के लिए विशेष पकवान बनाए जाते हैं और उन्हें स्नेह के साथ उपहार दिए जाते हैं।
फूलदेई उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है। मीन संक्रांति के साथ आने वाला यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के नवजीवन का संदेश देता है। पर्वतीय समाज में यह मान्यता है कि बच्चों द्वारा घरों की देहरी पर फूल डालने से पूरे वर्ष घर में सुख, समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है।
वास्तव में फूलदेई पर्व हमें यह याद दिलाता है कि त्योहारों का वास्तविक आनंद बच्चों की मुस्कान में छिपा होता है। उनके गीत, उनकी हंसी और उनकी मासूमियत ही इस पर्व को जीवंत बनाती है। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का यह अनमोल उत्सव आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना हुआ है।
गढ़वाल मंडल के श्रीनगर में भी फूलदेई पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। यहां सुबह से ही बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में सजे हुए घरों की देहरियों पर फूल डालते हुए दिखाई दिए। स्थानीय मंदिरों में पूजा-अर्चना के बाद बच्चों की शोभायात्रा भी निकाली गई, जिसमें पारंपरिक फुलारी गीतों की मधुर गूंज सुनाई दी। नगरवासियों ने बच्चों का स्वागत कर उन्हें गुड़, चावल और मिठाइयां भेंट कर आशीर्वाद दिया।
— अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर




