

उत्तराखंड,सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर सड़क से लेकर सदन तक उठ रहे सवाल महज़ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत का आईना हैं। जब हजारों बच्चे आज भी फर्श पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हों, तब यह कहना कि “सुविधाओं के लिए धन की कोई कमी नहीं है” — व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
पिछले चार वर्षों में केंद्र सरकार से 2512 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम धनराशि मिलने के बावजूद, यदि 41,500 छात्र-छात्राएं बिना डेस्क-बेंच के पढ़ाई कर रहे हैं, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सिस्टम की गहरी विफलता और संभावित भ्रष्टाचार की ओर संकेत करता है।
बजट आया, लेकिन बच्चों तक क्यों नहीं पहुंचा?
समग्र शिक्षा योजना का उद्देश्य साफ है — स्कूलों में बुनियादी ढांचा मजबूत करना, स्मार्ट क्लास, प्रयोगशालाएं और बेहतर शिक्षण वातावरण तैयार करना। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि:
प्राथमिक विद्यालयों में 17 हजार बच्चे बिना फर्नीचर
माध्यमिक विद्यालयों में 26,500 छात्रों के लिए डेस्क-बेंच की कमी
टिहरी जैसे जिलों में 1195 स्कूलों में फर्नीचर का अभाव
यह आंकड़े किसी प्राकृतिक आपदा के नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता और योजनाओं की लूट के संकेत हैं।
“डिमांड नहीं आई” — क्या यह बहाना है?
शिक्षा विभाग का यह तर्क कि “विद्यालयों से समय पर मांग नहीं आती” — अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
क्या एक पूरी व्यवस्था सिर्फ “डिमांड लेटर” पर निर्भर है?
क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ फाइल आगे बढ़ाने तक सीमित है?
अगर स्कूलों के प्रधानाध्यापक मांग नहीं भेज रहे, तो:
जिला शिक्षा अधिकारी क्या कर रहे हैं?
मुख्य शिक्षा अधिकारी की निगरानी कहां है?
निदेशालय की जवाबदेही क्यों तय नहीं हो रही?
साफ है कि यह केवल निचले स्तर की गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सामूहिक विफलता है।
पहाड़ों में शिक्षा — सबसे बड़ी उपेक्षा
पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है।
जहां पहले से ही संसाधनों की कमी है, वहां बच्चों को फर्श पर बैठकर पढ़ने को मजबूर करना — यह सीधे-सीधे उनके भविष्य के साथ अन्याय है।
लंबे समय तक जमीन पर बैठने से:
बच्चों की शारीरिक सेहत प्रभावित होती है
पढ़ाई में एकाग्रता कम होती है
स्कूल आने की रुचि घटती है
“धन की कमी नहीं” — फिर कमी कहां है?
शिक्षा मंत्री का यह बयान कि “धन की कोई कमी नहीं है” — सबसे बड़ा सवाल यहीं से शुरू होता है।
अगर पैसा है, तो:
फर्नीचर क्यों नहीं?
सुविधाएं अधूरी क्यों?
बच्चे फर्श पर क्यों?
यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि: धन का उपयोग सही दिशा में नहीं हुआ
कहीं न कहीं बंदरबांट (मिसयूज़) हुई है
भ्रष्टाचार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता
जवाबदेही तय हो — वरना यह अन्याय है
यह मामला केवल फर्नीचर का नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार और बच्चों के भविष्य का है।
अब जरूरी है कि:
समग्र शिक्षा योजना के तहत मिले फंड का सोशल ऑडिट कराया जाए
जिला स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो
फर्जी या कागजी खरीद पर सख्त जांच और कार्रवाई हो
नए सत्र से पहले नहीं, तुरंत फर्नीचर उपलब्ध कराया जाए
सिस्टम सुधरे या सवाल और तेज होंगे
जब सरकार विकास के दावे करती है और बच्चे आज भी जमीन पर बैठते हैं, तो यह विरोधाभास नहीं, बल्कि विफलता की पराकाष्ठा है।
अगर समय रहते इस पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मुद्दा केवल सड़क या सदन तक सीमित नहीं रहेगा —
बल्कि जनता के गुस्से का बड़ा कारण बनेगा।
क्योंकि सवाल सिर्फ इतना है —
क्या बच्चों का भविष्य फाइलों में ही बैठा रहेगा, या उन्हें बैठने के लिए एक बेंच भी मिलेगी?




