“विकास के नाम पर बाहरी कब्जा? उत्तराखंड में रोजगार और संसाधनों पर उठते सवाल”

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अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


उत्तराखंड की पहचान कभी “देवभूमि” और “रोजगार के अवसरों वाले शांत प्रदेश” के रूप में की जाती थी, लेकिन आज हालात को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य में हो रहे बड़े-बड़े विकास कार्यों और निवेश के दावों के बीच यह आरोप तेजी से उभर रहा है कि रोजगार के अवसर स्थानीय युवाओं के बजाय बाहरी राज्यों—हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार—के लोगों को अधिक मिल रहे हैं।

केदारनाथ से हल्द्वानी तक: क्या 2027 की राह आसान है?मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की केदारनाथ से लेकर हल्द्वानी तक की सक्रिय यात्राएं राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संकेत दे रही हैं। धार्मिक आस्था, विकास योजनाओं और जनसभाओं के जरिए सरकार जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ दिखाने की कोशिश कर रही है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये यात्राएं केवल प्रतीकात्मक हैं या जमीनी बदलाव का संकेत भी देती हैं? एक ओर सरकार निवेश, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर के बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय युवाओं की उपेक्षा जैसे मुद्दे अभी भी कायम हैं।
2027 के चुनाव नजदीक आते ही यह साफ है कि केवल घोषणाएं और कार्यक्रम पर्याप्त नहीं होंगे। जनता अब परिणाम चाहती है, आंकड़े नहीं।
ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या धामी सरकार केदारनाथ की आस्था और हल्द्वानी की राजनीति के बीच संतुलन बनाकर जनता का विश्वास जीत पाएगी, या 2027 में यही यात्राएं सवालों के घेरे में आ जाएंगी?


स्वास्थ्य विभाग में नर्सिंग ऑफिसर की भर्ती से लेकर एम्स अस्पतालों, पोस्ट ऑफिस, बैंकिंग सेवाओं और अन्य संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं, उद्यान विभाग, मेडिकल कॉलेज निर्माण और अन्य परियोजनाओं में घोटालों के आरोप भी सामने आ रहे हैं। सड़क निर्माण, सुरंग परियोजनाओं और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों में गुजरात की कंपनियों को लगातार ठेके मिलने से स्थानीय ठेकेदार और श्रमिक खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
स्थिति केवल यहीं तक सीमित नहीं है। राज्य में आयोजित बड़े सरकारी आयोजनों—यहां तक कि हल्द्वानी जैसे कार्यक्रमों में भी—बाहरी कंपनियों को प्राथमिकता मिलने के आरोप लगे हैं। इससे स्थानीय व्यवसायियों और युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है। साथ ही, बाहरी निवेशकों द्वारा जमीनों की बड़े पैमाने पर खरीद और सरकार की अनुमति ने भी लोगों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या उत्तराखंड की भूमि और संसाधन धीरे-धीरे बाहरी नियंत्रण में जा रहे हैं।
इन तमाम मुद्दों के बीच यह धारणा बन रही है कि प्रदेश में “विकास” के नाम पर कहीं न कहीं असंतुलन पैदा हो रहा है। जरूरत इस बात की है कि सरकार पारदर्शिता, स्थानीय भागीदारी और रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता दे, ताकि उत्तराखंड का युवा खुद को ठगा हुआ महसूस न करे।


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