“साले नहीं, ‘सारे’ था शब्द; फिर भी सियासत ने बना दिया मुद्दा””साले” से “सारे” तक का सियासी सफर? साले” नहीं, “सारे”—राजनीति का सबसे सुविधाजनक शब्द

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“साले” से “सारे” तक का सियासी सफर
राजनीति में कई बार पूरा विवाद किसी फैसले से नहीं, बल्कि एक अक्षर से खड़ा हो जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। किसी ने सुना “साले”, किसी ने कहा “सारे”, और देखते-देखते बहस शब्दकोश से निकलकर सियासत के मंच पर पहुंच गई।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


आजकल बयान से ज्यादा उसकी व्याख्या चर्चा में रहती है। पहले लोग पूरी बात सुनते थे, अब आधा शब्द सुनकर पूरा फैसला सुना देते हैं। फिर शुरू होता है टीवी डिबेट, सोशल मीडिया की अदालत और बयानबाजी का महायज्ञ। ऐसा लगता है कि शब्दों की नहीं, सुनने वालों की कल्पनाशक्ति की परीक्षा चल रही हो।
अगर वास्तव में “सारे” कहा गया था, तो फिर विवाद इस बात का कम और राजनीति का ज्यादा हो जाता है। विरोधियों को मुद्दा चाहिए और समर्थकों को सफाई। नतीजा यह कि असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और एक शब्द पूरे प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन जाता है।
लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि किसी बयान को उसके पूरे संदर्भ में सुना और समझा जाए। वरना कल “घर” को “घेर” और “जन” को “जंग” सुन लिया जाएगा, फिर हर शब्द पर नया आंदोलन खड़ा होगा।
लगता है आज की राजनीति में शब्द कम बोलते हैं, उनकी व्याख्याएं ज्यादा बोलती हैं।

“साले” नहीं, “सारे”—राजनीति का सबसे सुविधाजनक शब्द
भारतीय राजनीति में शब्दों का भी अपना भाग्य होता है। वही शब्द, वही उच्चारण, लेकिन अर्थ सत्ता और विपक्ष के हिसाब से बदल जाता है। जब विवाद खड़ा होता है, तो सबसे पहले शब्दकोश नहीं, बल्कि सफाई सामने आती है—”उन्होंने ‘साले’ नहीं, ‘सारे’ कहा था।”
ऐसा लगता है कि “सारे” अब राजनीति का सबसे सुरक्षित हेलमेट बन गया है। कोई बयान विवादों में घिरा तो तुरंत कहा जाता है कि लोगों ने गलत सुन लिया। सुनने वालों के कान कटघरे में खड़े हो जाते हैं और बोलने वाले की जुबान निर्दोष घोषित कर दी जाती है।
दिलचस्प बात यह है कि जब अलग-अलग नेताओं के बयानों पर यही सफाई दोहराई जाती है, तब लगता है कि राजनीति में शब्द नहीं बदलते, केवल पात्र बदल जाते हैं। सत्ता में हों तो “सारे”, विपक्ष में हों तो “साले” सुनाई देने लगता है।
असल सवाल यह नहीं कि कौन-सा शब्द बोला गया, बल्कि यह है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा इतनी स्पष्ट क्यों नहीं होती कि विवाद की गुंजाइश ही न बचे। लोकतंत्र में नेताओं के शब्द केवल ध्वनि नहीं होते, वे संदेश भी होते हैं।

इस्तीफे की फसल में महेंद्र भट्ट किस खेत की मूली?
राजनीति भी बड़ी दिलचस्प खेती है। कहीं एक शब्द पर मंत्री की कुर्सी चली जाती है, तो कहीं उसी तरह के विवाद पर सफाई की खाद डालकर मामला सींचने की कोशिश होती है।
जब प्रेमचंद अग्रवाल के बयान पर इतना बवाल हुआ कि उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा, और जब देश के शिक्षा मंत्री भी राजनीतिक दबाव के बीच इस्तीफा दे सकते हैं, तो जनता अब मुस्कराकर पूछ रही है—”आखिर महेंद्र भट्ट किस खेत की मूली हैं?”
लगता है राजनीति में इस्तीफे का भी अपना गणित है। कोई छोटी बात पर बड़ा त्यागपत्र दे देता है, तो कोई बड़े विवाद पर भी कहता है—”अरे, बात को गलत समझ लिया गया।”
जनता भी अब कमाल की हो गई है। वह कहती है, अगर जवाबदेही सबके लिए बराबर है तो नियम भी बराबर होने चाहिए। अगर एक नेता के लिए नैतिकता का पैमाना अलग है और दूसरे के लिए अलग, तो फिर यह तराजू नहीं, झूला कहलाएगा।
आखिर लोकतंत्र में कुर्सी सम्मान से बड़ी नहीं होनी चाहिए। जब बड़े-बड़े पद छोड़ने की मिसालें सामने हैं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक जवाबदेही चुनिंदा लोगों के लिए ही है?
जनता का व्यंग्य बस इतना है—”अगर इस्तीफे की गाड़ी चल पड़ी है, तो टिकट सबका एक जैसा होना चाहिए।”

कहीं यह “संगत का असर” तो नहीं?
उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक शब्द ने जितनी सुर्खियां बटोरी हैं, उतनी शायद किसी विकास योजना ने भी नहीं बटोरी। विवाद यह नहीं कि किसने क्या कहा, बल्कि यह कि किसने क्या सुना और किसने क्या समझाया।
राजनीतिक गलियारों में अब मजाक चल पड़ा है—क्या नेताओं की बैठकों में अब चाय के साथ शब्दावली का भी आदान-प्रदान होता है? कोई कह रहा है, “लगता है संगत का असर है।” दूसरा तुरंत जोड़ देता है, “नहीं भाई, यह तो राजनीति का नया वायरस है, जो कभी-कभी जुबान पर चढ़ जाता है।”


इसलिए जनता अब शायद यही कह रही है—शब्दों की बाजीगरी छोड़िए, स्पष्ट बोलिए। वरना हर विवाद में “साले” और “सारे” की बहस चलती रहेगी, जबकि असली मुद्दे पीछे छूटते रहेंगे।


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