परशुराम चौक पर अवैध कट, बढ़ते हादसे और राजनीति: क्या सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा है?परशुराम जी की मूर्ति पर भी उठ रहे सवाल ? मरने से अच्छा है थोड़ा घूमकर चला जाए”

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रुद्रपुर। शहर के व्यस्ततम क्षेत्रों में शामिल विशाल मेगा मार्ट के सामने स्थित परशुराम चौक एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां लंबे समय से सड़क सुरक्षा, अवैध आवागमन और बढ़ती दुर्घटनाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय लोगों का एक वर्ग जहां सड़क के बीच लगी लोहे की ग्रिल को हटाकर आवागमन के लिए रास्ता खोलने की मांग कर रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे सीधे तौर पर जनसुरक्षा से जुड़ा विषय मानते हुए किसी भी प्रकार के कट खोलने का विरोध कर रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।


विशेषज्ञों और यातायात नियमों की जानकारी रखने वाले लोगों का मानना है कि सड़क सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्थाओं को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय समाजहित और जनहित के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि थोड़ी सी सुविधा के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता किया गया तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
जानकारी के अनुसार विशाल मेगा मार्ट के सामने सड़क के बीचों-बीच लगी सुरक्षा ग्रिल को कुछ लोगों द्वारा क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। ग्रिल के सरिए उखाड़े जाने के बाद वहां से लोगों ने सड़क पार करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह एक अनौपचारिक रास्ते का रूप लेने लगा।
समस्या यह थी कि यह स्थान सड़क पार करने के लिए अधिकृत कट नहीं था। इसके बावजूद स्कूली बच्चों से लेकर आम राहगीर तक इसी रास्ते का उपयोग करने लगे। नतीजतन यहां दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ने लगी और आए दिन किसी न किसी वाहन और राहगीर के बीच टकराव की घटनाएं सामने आने लगीं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब कोई स्थान आधिकारिक रूप से सड़क पार करने के लिए निर्धारित नहीं होता, तब वहां वाहन चालक भी पैदल यात्रियों की उपस्थिति की अपेक्षा नहीं करते। ऐसे में अचानक सामने आने वाले व्यक्ति को बचाना मुश्किल हो जाता है।
हाईवे और मुख्य मार्गों पर क्यों लगाई जाती हैं ग्रिल?
यातायात विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी राष्ट्रीय या राज्य राजमार्ग पर सड़क के बीच डिवाइडर और लोहे की ग्रिल लगाने का मुख्य उद्देश्य अनियंत्रित आवागमन को रोकना होता है।
सुरक्षा मानकों के तहत जहां आवश्यकता होती है वहां अधिकृत कट बनाए जाते हैं ताकि लोग निर्धारित स्थान से ही सड़क पार कर सकें। बाकी हिस्सों को ग्रिल से बंद रखा जाता है।
देश के बड़े महानगरों में भी यही व्यवस्था देखने को मिलती है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, जयपुर और अन्य बड़े शहरों में सड़कों के बीच बनी ग्रिल लोगों को निर्धारित स्थानों से ही सड़क पार करने के लिए प्रेरित करती है। इससे दुर्घटनाओं में कमी आती है और यातायात सुचारु रूप से संचालित होता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार कहीं से भी सड़क पार करने लगे तो यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।
कट खोलने की मांग के पीछे क्या तर्क?
कट खोलने की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि सड़क पार करने के लिए उन्हें काफी दूरी तय करनी पड़ती है। उनका तर्क है कि यदि बीच में एक रास्ता उपलब्ध हो जाए तो समय और दूरी दोनों की बचत होगी।
हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञ इस तर्क को अधूरा मानते हैं। उनका कहना है कि कुछ मिनटों की बचत के लिए किसी व्यक्ति के जीवन को जोखिम में नहीं डाला जा सकता।
एक वरिष्ठ यातायात अधिकारी का कहना है कि सड़क पार करने के लिए यदि किसी व्यक्ति को 50 से 100 मीटर अतिरिक्त चलना पड़ जाए तो यह किसी भी दुर्घटना से कहीं बेहतर विकल्प है।
कट खोलने के संभावित नुकसान
यदि परशुराम चौक क्षेत्र में ग्रिल हटाकर स्थायी कट बना दिया जाता है तो इसके कई गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
1. दुर्घटनाओं में वृद्धि
सबसे बड़ा खतरा सड़क दुर्घटनाओं का है। जब लोग किसी भी समय और किसी भी दिशा से सड़क पार करेंगे तो वाहन चालकों के लिए उन्हें देख पाना कठिन हो जाएगा।
विशेषकर रात के समय या खराब मौसम में यह खतरा और बढ़ जाएगा।
2. स्कूली बच्चों की सुरक्षा पर खतरा
क्षेत्र में स्कूल होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं यहां से गुजरते हैं। यदि अनियंत्रित कट बना दिया गया तो बच्चे भी उसी रास्ते का उपयोग करेंगे।
बच्चों में सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए उनके दुर्घटना का शिकार होने की संभावना बढ़ सकती है।
3. यातायात जाम
जहां-तहां सड़क पार करने वाले लोगों के कारण वाहन बार-बार धीमे होंगे और अचानक ब्रेक लगेंगे। इससे जाम की स्थिति बन सकती है।
4. आपातकालीन सेवाओं पर असर
एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और अन्य आपातकालीन वाहनों की गति प्रभावित हो सकती है। सड़क पर अनियंत्रित गतिविधियां आपातकालीन प्रतिक्रिया समय को बढ़ा सकती हैं।
5. नियमों की अवहेलना को बढ़ावा
यदि एक स्थान पर अवैध रूप से रास्ता बना दिया गया तो अन्य स्थानों पर भी लोग इसी तरह की मांग करने लगेंगे। इससे पूरे शहर की यातायात व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
क्या चुनावी राजनीति का विषय बन रहा है मुद्दा?
स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि आगामी चुनावों को देखते हुए कुछ राजनीतिक दल और नेता इस विषय को मुद्दा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जनसुविधा से जुड़े विषयों पर चर्चा होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन सड़क सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामलों में तथ्यों और विशेषज्ञों की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कई लोगों का कहना है कि यदि सुरक्षा मानकों के विरुद्ध जाकर निर्णय लिए गए तो उसके परिणाम जनता को ही भुगतने पड़ेंगे।
“मरने से अच्छा है थोड़ा घूमकर चला जाए”
सड़क सुरक्षा से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी।
उनका तर्क है कि यदि अधिकृत कट 100 मीटर दूर है तो वहां तक पैदल जाना किसी दुर्घटना का शिकार होने से कहीं बेहतर है।
वे कहते हैं कि अक्सर लोग कुछ सेकंड बचाने के लिए जोखिम उठाते हैं और बाद में गंभीर हादसों का सामना करते हैं। सड़क सुरक्षा में सुविधा से अधिक महत्व जीवन का होना चाहिए।
डीडी चौक पर ट्रैफिक पुलिस की भूमिका सराहनीय
रुद्रपुर के डीडी चौक का उदाहरण देते हुए स्थानीय नागरिक बताते हैं कि स्कूलों की छुट्टी के समय ट्रैफिक पुलिस और पुलिसकर्मी वहां पूरी सक्रियता के साथ ड्यूटी करते हैं।
वे बच्चों को सुरक्षित तरीके से सड़क पार कराते हैं और यातायात नियमों का पालन सुनिश्चित करते हैं।
अभिभावकों का कहना है कि पुलिस की इस पहल से दुर्घटनाओं की संभावना काफी कम हो जाती है। साथ ही बच्चों में भी सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता विकसित होती है।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि ऐसे प्रयासों की सराहना होनी चाहिए और अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी इसी तरह की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
बच्चों को नियम सिखाने का अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। समाज और परिवार की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
यदि बच्चों को शुरू से ही निर्धारित कट, जेब्रा क्रॉसिंग और ट्रैफिक संकेतों का पालन करना सिखाया जाए तो वे बड़े होकर जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।
परशुराम चौक जैसे मामलों में नियमों का पालन करवाना भविष्य की पीढ़ी को सुरक्षित और अनुशासित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
परशुराम जी की मूर्ति पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे विवाद के बीच परशुराम चौक पर स्थापित भगवान परशुराम की प्रतिमा को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।
कुछ लोगों का मानना है कि सड़क के मध्य स्थित यह प्रतिमा दृश्यता को प्रभावित करती है। उनका तर्क है कि कई बार वाहन चालकों को सामने से आने वाले वाहन या सड़क की स्थिति स्पष्ट दिखाई नहीं देती।
यातायात विशेषज्ञ बताते हैं कि सड़क डिजाइन में दृश्यता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई संरचना वाहन चालकों के दृष्टिकोण को बाधित करती है तो दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि प्रतिमा धार्मिक और सामाजिक आस्था से जुड़ा विषय है, इसलिए इस पर किसी भी निर्णय से पहले व्यापक सहमति और प्रशासनिक अध्ययन आवश्यक होगा।
क्या प्रतिमा को अन्य स्थान पर स्थापित किया जा सकता है?
कुछ नागरिक सुझाव दे रहे हैं कि यदि तकनीकी अध्ययन में यह साबित होता है कि प्रतिमा यातायात सुरक्षा को प्रभावित कर रही है, तो उसे किसी पार्क या सार्वजनिक स्थल पर सम्मानपूर्वक स्थानांतरित किया जा सकता है।
इसके लिए गांधी पार्क या किसी अन्य उपयुक्त स्थान का सुझाव भी दिया जा रहा है, जहां लोग प्रतिमा के दर्शन भी कर सकें और यातायात व्यवस्था भी प्रभावित न हो।
हालांकि इस विषय पर अंतिम निर्णय प्रशासन, विशेषज्ञों और समाज के विभिन्न वर्गों की सहमति से ही संभव है।
समाजहित बनाम राजनीति
परशुराम चौक का मुद्दा केवल एक कट खोलने या बंद करने का प्रश्न नहीं है। यह सड़क सुरक्षा, जनजागरूकता, प्रशासनिक जिम्मेदारी और सामाजिक अनुशासन से जुड़ा विषय है।
विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि सड़कों पर बनाए गए सुरक्षा मानकों का उद्देश्य जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। यदि इन व्यवस्थाओं को केवल सुविधा के आधार पर बदल दिया जाए तो दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि लोग नियमों का पालन करें, बच्चों को भी सुरक्षित यातायात व्यवहार सिखाएं और प्रशासन द्वारा बनाए गए सुरक्षा मानकों का सम्मान करें।
क्योंकि अंततः कुछ कदम अतिरिक्त चल लेना किसी भी दुर्घटना से कहीं बेहतर है। सड़क पार करने का सही स्थान चुनना केवल नियम का पालन नहीं, बल्कि अपने और अपने परिवार के भविष्य की सुरक्षा भी है। इसलिए इस विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय समाजहित, जनहित और मानव जीवन की सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।


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