मानसून सीजन की वजह से कोसी व दाबका नदी सात माह बाद खनन कार्य के लिए बंद हो गई है। इस वित्तीय वर्ष रामनगर में खनन कार्य से सरकार को बंपर कमाई हुई है।

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1217 करोड़ का खनन राजस्व: उपलब्धि या उत्तराखंड के पर्यावरण की कीमत पर कमाई?
देहरादून। उत्तराखंड सरकार खनन क्षेत्र में रिकॉर्ड 1217 करोड़ रुपये के राजस्व को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। राज्य को खनन सुधारों में राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा स्थान मिलने के साथ केंद्र सरकार से 200 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि भी प्राप्त हुई है। मुख्यमंत्री और सरकार इसे पारदर्शी व्यवस्था, तकनीकी निगरानी और अवैध खनन पर नियंत्रण का परिणाम बता रहे हैं। लेकिन इस उपलब्धि के बीच कई ऐसे सवाल हैं जो सरकार के दावों पर गंभीर बहस खड़ी करते हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।


सरकार का दावा है कि खनन क्षेत्र में सैटेलाइट निगरानी, जीपीएस ट्रैकिंग, ई-नीलामी और रियल टाइम मॉनिटरिंग लागू कर पारदर्शिता बढ़ाई गई है। इससे राज्य का राजस्व 300-400 करोड़ रुपये के स्तर से बढ़कर 1217 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। आंकड़ों के आधार पर यह निश्चित रूप से बड़ी वृद्धि है। लेकिन क्या केवल राजस्व बढ़ना ही किसी नीति की सफलता का पैमाना हो सकता है?
उत्तराखंड एक सामान्य राज्य नहीं बल्कि संवेदनशील हिमालयी भूभाग है। यहां नदियां, जंगल और पहाड़ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि लाखों लोगों के जीवन का आधार हैं। ऐसे में जब सरकार खनन से रिकॉर्ड कमाई का जश्न मना रही है, तब यह भी बताना चाहिए कि इस कमाई की पर्यावरणीय कीमत क्या रही है।
राज्य के कई हिस्सों में वर्षों से खनन को लेकर विवाद होते रहे हैं। स्थानीय लोग लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि नदियों से अत्यधिक उपखनिज निकासी के कारण नदी तंत्र प्रभावित हो रहा है। बरसात के मौसम में नदी का स्वभाव बदल रहा है और कई क्षेत्रों में कटाव की समस्या बढ़ी है। हालांकि सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है, लेकिन यह भी सच है कि पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार संतुलित खनन की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।
सबसे गंभीर सवाल सड़क सुरक्षा को लेकर है। खनन क्षेत्रों में रोजाना हजारों डंपर और ट्रक सड़कों पर दौड़ते हैं। ओवरलोड वाहनों के कारण दुर्घटनाओं की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। कई परिवार सड़क हादसों में अपने प्रियजनों को खो चुके हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि खनन से होने वाली कमाई का लाभ कुछ लोगों तक सीमित रहता है, जबकि उसका दुष्प्रभाव आम जनता को झेलना पड़ता है।
सरकार कहती है कि उसने खनन माफियाओं पर शिकंजा कसा है। यदि यह दावा सही है तो सवाल उठता है कि आखिर इतने वर्षों तक राजस्व में भारी नुकसान क्यों होता रहा? यदि तकनीक और निगरानी के माध्यम से अचानक राजस्व तीन गुना तक बढ़ सकता है, तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि पहले व्यवस्था में गंभीर खामियां मौजूद थीं?
उत्तराखंड ने पिछले एक दशक में कई बड़ी प्राकृतिक आपदाएं देखी हैं। केदारनाथ त्रासदी से लेकर जोशीमठ संकट और विभिन्न जिलों में भूस्खलन की घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि हिमालयी क्षेत्र में विकास योजनाओं को बेहद सावधानी के साथ लागू करने की आवश्यकता है। ऐसे में खनन से होने वाली कमाई का मूल्यांकन केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं बल्कि पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से भी होना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी राज्य की वास्तविक उपलब्धि केवल राजस्व संग्रह नहीं होती। वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण और जनसुरक्षा भी सुनिश्चित हो। यदि सरकार 1217 करोड़ रुपये की कमाई का दावा करती है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण, नदी पुनर्जीवन, सड़क सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के कल्याण पर कितना निवेश किया गया।
आज जरूरत इस बात की है कि खनन राजस्व के साथ-साथ पर्यावरणीय लागत का भी सार्वजनिक आकलन किया जाए। कितनी नदियों पर दबाव बढ़ा, कितने हादसे हुए, कितनी सड़कें प्रभावित हुईं और खनन प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को क्या लाभ मिला—इन सवालों के जवाब भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने राजस्व के आंकड़े।
1217 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड राजस्व निश्चित रूप से एक बड़ा आंकड़ा है। लेकिन उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में यह बहस भी जरूरी है कि कहीं यह आर्थिक उपलब्धि भविष्य के पर्यावरणीय संकट की भूमिका तो नहीं बन रही। सरकार इसे सफलता का उत्सव मान रही है, जबकि आलोचकों का कहना है कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो आज की कमाई कल की भारी कीमत बन सकती है।
खनन से प्राप्त राजस्व का जश्न मनाने से पहले सरकार को जनता को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि उत्तराखंड की नदियां, जंगल, पहाड़ और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य किसी भी कीमत पर दांव पर नहीं लगाया जाएगा।

सरकार को कुल 9,79,19,791 रुपये का राजस्व मिला है।

पिछले साल की तुलना में यह 46 प्रतिशत अधिक है। तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अधीन कोसी व दाबका नदी से उपखनिज निकासी का कार्य वन विकास निगम करता है।

इस बार 46 प्रतिशत अधिक राजस्व

रामनगर में कोसी नदी के पांच गेट कालूसिद्ध, बंजारी प्रथम, बंजारी द्वितीय, खड़ंजा, कठियापुल व दाबका नदी के छोई गेट से खनन कार्य होता है। इस वर्ष यह 31 मई के बजाय 19 जून तक चला। तराई पश्चिमी वन प्रभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2024-25 में कोसी व दाबका नदी से 4,54,54,858 रुपये की आय हुई थी, जबकि वर्ष में 9,79,19,791 रुपये की आय हुई है।

इस वर्ष कुल 10,87,997 घनमीटर उपखनिज की निकासी हुई। इसमें कोसी नदी से 9,59,626 व दाबका नदी से 1,28,371 घनमीटर उपखनिज की निकासी की गई। अक्टूबर माह से खनन कार्य शुरू हुआ था। तराई पश्चिमी वन प्रभाग इस वर्ष राजस्व वृद्धि के पीछे आकस्मिक निरीक्षण, रात में औचक गश्त, निकासी गेट पर अभिलेख सत्यापन व नियमित गश्त को मुख्य वजह बता रहा है।

इस वर्ष खनन से पांच करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व अतिरिक्त मिला है। अवैध खनन, अवैध परिवहन, निर्धारित क्षेत्र से बाहर खनन गतिविधियों के विरुद्ध निरंतर अभियान चलाया गया। राजस्व हानि को रोका गया। अवैध खनन में शामिल लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। जिस वजह से इस वर्ष राजस्व लक्ष्य काफी अच्छा आया है। -प्रकाश चंद्र आर्या, डीएफओ तराई पश्चिमी वन प्रभाग रामनगर


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