नवरात्रि की सप्तमी तिथि को महासप्तमी पूजा के नाम से भी जाना जाता है। कालरात्रि देवी पार्वती का सबसे उग्र और भयंकर रूप है लेकिन वह अपने भक्तों को अभय एवं वरद मुद्रा द्वारा आशीर्वाद प्रदान करती हैं। उग्र रूप में विद्यमान अपनी शुभ अथवा मंगलदायक शक्ति के कारण देवी कालरात्रि को देवी शुभंकरी के नाम से भी जाना जाता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
नवरात्रि के सातवें दिन की कथा (मां कालरात्रि व्रत कथा)
पौराणिक कथा के अनुसार, माता ने शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नामक राक्षसों का वध करके देवी-देवताओं और मनुष्यों की रक्षा की थी। कथा है कि एक बार शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज के आतंक से तीनों लोक थर-थर कांपने लगे। चारों ओर इन राक्षसों का भय व्याप्त था। तब समस्त देवी-देवता भगवान शिव के पास इस समस्या का समाधान पाने के लिए गए। महादेव ने माता पार्वती से शुंभ-निशुंभ का अंत करने की बात कही। इसके बाद माता ने दुर्गा रूप धारण कर शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। हालांकि, जब रक्तबीज का संहार करने माता गई तो एक समस्या सामने आई। रक्तबीज को यह वरदान मिला था कि उसके रक्त की बूंद धरती पर गिरते ही उसके जैसा एक और राक्षस जन्म लेगा। तब माता दुर्गा ने अपने तेज से मां कालरात्रि का रूप धारण किया। माता कालरात्रि ने रक्तबीज के रक्त को धरती पर नहीं गिरने दिया और गिरने से पहले ही उसे अपने मुंह में भर लिया। इस तरह माता कालरात्रि ने अंत में रक्तबीज का भी संहार कर दिया। मां कालरात्रि न केवल दुष्टों का विनाश करती हैं, बल्कि अपने भक्तों के लिए वे शुभ फलदायी हैं।
नवरात्रि के सातवां दिन- शुभ रंग और भोग
नवरात्रि के सातवें दिन नीला रंग पहनना शुभ होता है। वहीं इस दिन मां कालरात्रि को गुड़ और मालपुआ का भोग लगाएं। इस दिन देवी कालरात्रि को गुड़ और गुड़ से बनी चीजों का भोग लगाने से जीवन में सुख-समृद्धि की वर्षा होती है। साथ ही हर तरह के भय और नकारात्मकता से भी छुटकारा मिलता है।
इस पावन दिन मां दुर्गा के उग्र किंतु कल्याणकारी स्वरूप, मां कालरात्रि की आराधना की जाती है.
भले ही मां का रूप प्रथम दृष्टि में भयावह लगे, लेकिन सच्चे भक्तों के लिए वे सुरक्षा की ढाल साबित होती हैं. मां कालरात्रि अंधकार, भय और नकारात्मक शक्तियों का समूल नाश कर जीवन में नई आशा और रोशनी का संचार करती हैं. यही वजह है कि इस दिन की पूजा को खास महत्व दिया जाता है और श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से मां को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं.
मां कालरात्रि का स्वरूप और महत्व
मां कालरात्रि का स्वरूप अन्य देवियों से पूरी तरह अलग है. उनका वर्ण श्याम, बाल खुले, गले में बिजली की तरह चमकती माला और तीन नेत्र उन्हें अत्यंत शक्तिशाली बनाते हैं. पहली नजर में उनका रूप भय उत्पन्न कर सकता है, लेकिन सच्चाई यह है कि मां अपने भक्तों को हर संकट से बचाती हैं.
धार्मिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से मां कालरात्रि की पूजा करता है, उसके जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है. कई लोग बताते हैं कि कठिन समय में मां का स्मरण करने से उन्हें मानसिक शांति और साहस मिला. यही कारण है कि मां को शुभंकारी भी कहा जाता है.
पूजा विधि
नवरात्रि के सातवें दिन सुबह जल्दी उठना शुभ माना जाता है. स्नान के बाद साफ कपड़े पहनकर पूजा का संकल्प लें. पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. इसके बाद रोली, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें. ध्यान रखें कि पूजा में सादगी और श्रद्धा सबसे जरूरी है. दिखावे से ज्यादा भाव मायने रखता है.
भोग और आरती का महत्व
मां कालरात्रि को गुड़ और चने का भोग बेहद प्रिय माना जाता है. पूजा के दौरान यह भोग अर्पित करें और फिर परिवार के साथ प्रसाद बांटें. अंत में मां की आरती जरूर करें यही पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
मंत्र और शुभ रंग का महत्व
इस दिन मां के बीज मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः’ का जाप विशेष फलदायी माना जाता है. नियमित जाप से मन स्थिर होता है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं. जहां तक शुभ रंग की बात है, इस दिन नीला रंग धारण करना शुभ माना गया है. यह रंग आत्मविश्वास और शांति का प्रतीक है. कई लोग इस दिन नीले कपड़े पहनकर पूजा करते हैं, जिससे उन्हें सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है.
मां कालरात्रि की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जब दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था, तब मां दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण किया. रक्तबीज को यह वरदान था कि उसकी हर बूंद से नया राक्षस पैदा हो जाता है. ऐसे में मां कालरात्रि ने अद्भुत रणनीति अपनाई. उन्होंने रक्तबीज का वध करते हुए उसके रक्त को जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में समेट लिया. इस तरह बुराई का अंत हुआ और देवताओं को राहत मिली. यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, साहस और बुद्धिमत्ता से हर समस्या का समाधान संभव है.
मां कालरात्रि की आरती
कालरात्रि जय जय महाकाली. काल के मुंह से बचाने वाली॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा. महाचंडी तेरा अवतारा॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा. महाकाली है तेरा पसारा॥
खड्ग खप्पर रखने वाली. दुष्टों का लहू चखने वाली॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा. सब जगह देखूं तेरा नजारा॥
सभी देवता सब नर-नारी. गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥
रक्तदन्ता और अन्नपूर्णा. कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥
ना कोई चिंता रहे ना बीमारी. ना कोई गम ना संकट भारी॥
उस पर कभी कष्ट ना आवे. महाकाली मां जिसे बचावे॥
तू भी भक्त प्रेम से कह. कालरात्रि मां तेरी जय॥

