⚡ “ऊर्जा प्रदेश” या “ऊर्जा संकट”? उत्तराखंड के पावर सिस्टम पर बड़ा सवाल“ऊर्जा प्रदेश की विडंबना: जो बिजली अपने काम न आए, वही विकास कहलाए!” ⚡

Spread the love


उत्तराखंड—जिसे कभी “ऊर्जा प्रदेश” के रूप में पहचान मिली—आज खुद बिजली संकट से जूझता नजर आ रहा है। पहाड़ों की नदियों पर बने विशाल जलविद्युत परियोजनाओं के बावजूद, राज्य को अपनी ही जरूरतों को पूरा करने के लिए महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही है। यह स्थिति केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता और संसाधनों के दुरुपयोग की कहानी कहती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


मार्च के आंकड़े: संकट की असली तस्वीर
ऊर्जा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार:
कुल बिजली उत्पादन (हाइड्रो शेयर छोड़कर): 218.30 मिलियन यूनिट
कुल उपलब्धता (केंद्रीय + अन्य स्रोत): 587.88 मिलियन यूनिट
कुल मांग: 1079.92 मिलियन यूनिट
कुल कमी: लगभग 492.03 मिलियन यूनिट
यानी राज्य की आधी से ज्यादा जरूरत बाहरी स्रोतों से पूरी करनी पड़ी।
गर्मी, उद्योग और गिरता जलस्तर
मार्च में तापमान बढ़ते ही:
एसी, कूलर और सिंचाई की मांग बढ़ी
औद्योगिक गतिविधियों ने बिजली खपत को बढ़ाया
नदियों का जलस्तर घटने से हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का उत्पादन गिर गया
परिणाम: मांग 40 मिलियन यूनिट प्रतिदिन के आसपास, जबकि उपलब्धता मात्र 21–22 मिलियन यूनिट।
टिहरी बांध: क्षमता बड़ी, फायदा कितना?
उत्तराखंड की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना टिहरी बांध इस बहस के केंद्र में है।
टिहरी परियोजना की वास्तविक क्षमता:
स्टेज-1 (टिहरी HEP): 1000 मेगावाट
कोटेश्वर परियोजना: 400 मेगावाट
पम्प्ड स्टोरेज (निर्माणाधीन): 1000 मेगावाट
कुल संभावित क्षमता: 2400 मेगावाट से अधिक
लेकिन सच्चाई:
राज्य को पूरी बिजली नहीं मिलती
बड़ा हिस्सा केंद्र/अन्य राज्यों को जाता है
जलस्तर पर निर्भरता के कारण उत्पादन अस्थिर
सवाल उठता है:
जिस जमीन, पानी और विस्थापन की कीमत उत्तराखंड ने चुकाई, उसका लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
महंगी बिजली, महंगा बिल
पावर एक्सचेंज से खरीदी गई बिजली: 150.39 मिलियन यूनिट
बैंकिंग (अन्य राज्यों से): 341.02 मिलियन यूनिट
ऊर्जा विशेषज्ञों का साफ कहना है:
महंगी खरीद का बोझ अब जनता पर डाला जाएगा
अप्रैल से फ्यूल और पावर परचेज सरचार्ज लागू
बिजली बिल में बढ़ोतरी तय
सरकारों पर बड़ा सवाल
यह संकट केवल मौसम का नहीं—नीतियों का भी है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं:
ऊर्जा प्रदेश होने के बावजूद आत्मनिर्भरता क्यों नहीं?
जलविद्युत परियोजनाओं का लाभ स्थानीय जनता को क्यों नहीं?
क्या पूर्व और वर्तमान सरकारों ने दीर्घकालिक ऊर्जा नीति बनाई?
उत्तराखंड की जनता आज पूछ रही है:
“अपनी ही बिजली हमें खरीदनी पड़े—क्या इससे बड़ा दुर्भाग्य हो सकता है?”
संसाधन बनाम वास्तविकता
उत्तराखंड के पास:
प्रचुर जल संसाधन
विशाल हाइड्रो पावर क्षमता
फिर भी:
बिजली संकट
महंगी खरीद
बढ़ते बिल
यह विरोधाभास केवल तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता का प्रतीक है।
✍️ संपादकीय टिप्पणी
उत्तराखंड के पहाड़ों ने देश को रोशनी दी, लेकिन अपने ही घर अंधेरे में क्यों हैं?
जब “ऊर्जा प्रदेश” की पहचान केवल कागजों में रह जाए और जनता महंगी बिजली के बोझ तले दब जाए, तब यह सिर्फ संकट नहीं—नीतिगत विफलता का आईना है।
अब समय आ गया है कि राज्य अपनी ऊर्जा नीति पर पुनर्विचार करे—वरना आने वाले महीनों में यह “दबाव” एक बड़े ऊर्जा संकट में बदल सकता है।


Spread the love