दक्षिण भारतीय सिनेमा के महानायक थलपति विजय ने अपनी राजनीतिक पारी का आगाज ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ के साथ कर दिया है. विजय की पहचान न केवल एक अभिनेता के तौर पर है, बल्कि वे ईसाई समुदाय से भी ताल्लुक रखते हैं.

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ऐसे में भारतीय राजनीति और प्रशासन में ईसाई समुदाय के योगदान पर चर्चा तेज हो गई है. आजाद भारत के इतिहास में थलपति विजय पहले ईसाई नहीं हैं जो सार्वजनिक जीवन में बड़ा बदलाव लाने निकले हैं; बल्कि उनसे पहले कई दिग्गजों ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक, राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर बैठकर राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया है.

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

संविधान निर्माण में ईसाई समाज की भूमिका

आजाद भारत की नींव रखने वाली संविधान सभा में ईसाई समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद प्रभावशाली रहा है. हरेन्द्र कुमार मुखर्जी संविधान सभा के उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन थे. उन्होंने भारत के संविधान को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई. स्वतंत्रता मिलने के बाद, उन्हें पश्चिम बंगाल का पहला राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने विभाजन के बाद की चुनौतियों को बखूबी संभाला और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले.

जॉन मथाई- देश के पहले रेल और वित्त मंत्री

भारत के शुरुआती मंत्रिमंडल में जॉन मथाई एक ऐसा नाम थे जिनकी विद्वत्ता का सम्मान हर कोई करता था. वे स्वतंत्र भारत के पहले रेल मंत्री बने और बाद में उन्होंने वित्त मंत्री के तौर पर देश की बागडोर संभाली. जॉन मथाई ने भारत की शुरुआती आर्थिक नीतियों और रेलवे के ढांचे को मजबूत करने में ऐतिहासिक काम किया. उनके आर्थिक दृष्टिकोण ने देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में शुरुआती कदम बढ़ाए थे, जिसका लाभ आज भी देश को मिल रहा है.

पी.सी. अलेक्जेंडर- प्रशासन और राजभवन के सारथी

प्रशासनिक और संवैधानिक पदों की बात हो तो पी.सी. अलेक्जेंडर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है. वे महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गोवा जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के राज्यपाल रहे. अलेक्जेंडर की प्रशासनिक पकड़ इतनी मजबूत थी कि उन्होंने न केवल राज्यपाल के तौर पर काम किया, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे निष्पक्ष पद की जिम्मेदारी भी निभाई. वे लंबे समय तक प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव भी रहे और भारतीय लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए कई सुधारों के पक्षधर रहे.

मार्गरेट अल्वा- चार राज्यों की राज्यपाल

महिला ईसाई नेताओं में मार्गरेट अल्वा का कद बहुत ऊंचा रहा है. उन्होंने गोवा, गुजरात, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में राज्यपाल की भूमिका निभाई. अल्वा न केवल एक कुशल प्रशासक रहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्री के रूप में भी उन्होंने सक्रिय राजनीति में अपनी छाप छोड़ी. उन्होंने संसद के भीतर और बाहर महिलाओं के अधिकारों और ईसाई समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए हमेशा मजबूती से आवाज उठाई और कई कड़े फैसले लिए.

अजीत जोगी- छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री का गौरव

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद उसके पहले मुख्यमंत्री बनने का गौरव अजीत जोगी को प्राप्त हुआ. वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) छोड़कर राजनीति में आए थे और अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर राज्य की राजनीति में शीर्ष तक पहुंचे. जोगी ने नए बने राज्य छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक मशीनरी को खड़ा करने और आदिवासी व पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए कई योजनाएं बनाईं. वे ईसाई समुदाय के उन चंद नेताओं में थे जिन्होंने एक नए राज्य की नींव रखी.

ओमन चांडी और ए.के. एंटनी: केरल की राजनीति के स्तंभ

केरल की राजनीति में ओमन चांडी और ए.के. एंटनी का नाम ईसाई समुदाय के सबसे कद्दावर नेताओं के रूप में लिया जाता है. ओमन चांडी केरल के मुख्यमंत्री रहे और अपनी सादगी व जनसंपर्क के लिए जाने गए. वहीं ए.के. एंटनी केरल के मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ देश के रक्षा मंत्री भी रहे. उनके कार्यकाल में भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए. इन दोनों नेताओं ने साबित किया कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में ईसाई समुदाय का कितना गहरा प्रभाव है.

रेड्डी परिवार- आंध्र प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व की कमान

आंध्र प्रदेश की राजनीति में वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (YSR) एक जननायक के तौर पर उभरे. उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में राज्य में कई कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं. उनके निधन के बाद उनके बेटे वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने भी मुख्यमंत्री पद संभाला. ईसाई समुदाय से आने वाले इस परिवार ने आंध्र प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा बदलने में अहम भूमिका निभाई. उनकी लोकप्रियता ने यह दर्शाया कि जनता नेतृत्व की क्षमता और कार्यों को सबसे ऊपर रखती है.

पूर्वोत्तर भारत और संगमा परिवार का दबदबा

मेघालय और पूर्वोत्तर की राजनीति में पी.ए. संगमा एक बड़ा नाम रहे. वे मेघालय के मुख्यमंत्री रहे और लोकसभा के पहले ईसाई अध्यक्ष भी बने. उनकी संसदीय कार्यशैली की आज भी मिसाल दी जाती है. उनके नक्शेकदम पर चलते हुए उनके बेटे कॉनराड संगमा वर्तमान में मेघालय के मुख्यमंत्री हैं. इसके अलावा, नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो और मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा भी ईसाई समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने राज्यों का नेतृत्व कर रहे हैं.

जॉर्ज फर्नांडीस- मजदूरों की आवाज और रक्षा मंत्री

जॉर्ज फर्नांडीस भारतीय राजनीति के एक ऐसे ‘अग्निशिखा’ नेता थे जिन्होंने सत्ता को हमेशा चुनौती दी. वे केंद्रीय रक्षा मंत्री और रेल मंत्री रहे. परमाणु परीक्षण (पोखरण) के समय वे रक्षा मंत्री थे और उन्होंने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए कई बार सियाचिन का दौरा किया. ईसाई समुदाय से आने वाले जॉर्ज ने देश में ट्रेड यूनियन आंदोलन को मजबूत किया और आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए लंबी लड़ाई लड़ी.

न्यायपालिका और सेना में समुदाय का गौरव

राजनीति के अलावा न्यायपालिका और रक्षा बलों में भी ईसाई समुदाय ने अपनी सेवा दी है. जस्टिस के.टी. थॉमस और जस्टिस कुरियन जोसेफ जैसे दिग्गजों ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर न्याय की अवधारणा को पुख्ता किया. वहीं, भारतीय सेना में सुनीथ फ्रांसिस रोड्रिगेज ने सेना प्रमुख (Chief of Army Staff) के पद को सुशोभित किया. इन हस्तियों ने साबित किया कि देश की सुरक्षा और न्याय प्रणाली में ईसाई समुदाय का योगदान अतुलनीय और प्रेरणादायक है.

Author : निधि पाल


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