राजस्व में रिकॉर्ड, गांव-गांव तक शराब की दुकानों का विस्तार: धामी सरकार की ‘नई आबकारी उपलब्धि’”नशा युक्त उत्तराखंड: बीजेपी सरकार की ‘उपलब्धि’ का कड़वा सच”

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“नशा युक्त उत्तराखंड: सरकार की ‘उपलब्धि’ का कड़वा सच”
उत्तराखंड—जिसे देवभूमि कहा जाता है, जहां की पहचान आध्यात्म, संस्कृति और शांति से जुड़ी रही है—आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां “नशा मुक्ति” का सपना धीरे-धीरे “नशा युक्त” हकीकत में बदलता दिखाई दे रहा है। 1 अप्रैल से शराब की कीमतों में ₹5 से ₹20 प्रति बोतल की वृद्धि कोई बड़ी आर्थिक खबर भले न लगे, लेकिन इसके पीछे छिपी सच्चाई राज्य की नीतियों, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

पुष्कर सिंह धामी सरकार की यह बड़ी “उपलब्धि” मानी जा सकती है कि राजस्व बढ़ाने के साथ शराब की पहुंच गांव-गांव तक सुनिश्चित हुई। 700 दुकानों के साथ जुड़ी कई “अप शॉप” के जरिए हजारों बिक्री केंद्र सक्रिय हैं। इससे आबकारी आय लगातार बढ़ रही है। सरकार की नीति ने लाइसेंसधारकों को विस्तार का अवसर दिया, वहीं आम जनता तक आसान उपलब्धता सुनिश्चित की। हालांकि इसके सामाजिक प्रभावों पर बहस जारी है, लेकिन आर्थिक दृष्टि से इसे राज्य की आय बढ़ाने वाला कदम बताया जा रहा
भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पिछले 9 वर्षों में उत्तराखंड ने राजस्व के नए रिकॉर्ड बनाए हैं—लेकिन क्या यह विकास है या सामाजिक पतन की कीमत पर खड़ा किया गया आर्थिक मॉडल?
राजस्व बनाम समाज: क्या यही विकास है?
राज्य सरकार का लक्ष्य इस वर्ष आबकारी से 5000 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व प्राप्त करना है। यह आंकड़ा सुनने में प्रभावशाली लगता है, लेकिन इसके पीछे का सच कहीं ज्यादा भयावह है। शराब की दुकानों की संख्या लगभग 700 तक पहुंच चुकी है, 700 अधिकृत दुकानों के नाम पर खेल कहीं बड़ा है। हर दुकान से जुड़ी 2 से 5 “अप शॉप” और समानांतर अवैध बिक्री केंद्रों को जोड़ दें तो आंकड़ा हजारों में पहुंचता है। वास्तविक संख्या क्या है—सरकार बताए या नहीं? जनता सब देख रही है, गिनती मुश्किल है, सच छुपाना नहीं।और पिछले 9 वर्षों में इनकी वृद्धि “बेतहाशा” कही जा सकती है।
गली-गली, मोहल्ला-मोहल्ला में खुलती शराब की दुकानें सिर्फ राजस्व का स्रोत नहीं हैं—ये सामाजिक ढांचे को कमजोर करने वाले केंद्र बन चुकी हैं। जहां पहले गांवों में मंदिर और चौपाल सामाजिक जीवन के केंद्र होते थे, आज कई जगहों पर शराब की दुकानें और उनके आसपास जुटने वाली भीड़ ने उस स्थान को ले लिया है।
युवाओं की पीढ़ी: भविष्य या विनाश?
सबसे चिंताजनक पहलू है—युवाओं का तेजी से नशे की ओर झुकाव। 18 से 25 वर्ष की उम्र, जो जीवन निर्माण का समय होता है, आज नशे की गिरफ्त में जाती दिख रही है।
हाल ही में एक मामला सामने आया, जिसमें एक युवा के 95% फेफड़े अत्यधिक शराब सेवन के कारण खराब हो गए और उसकी असमय मृत्यु हो गई। यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति का संकेत है।
आज कॉलेज, स्कूल, पार्क, टैक्सी स्टैंड, ओवरब्रिज, यहां तक कि धार्मिक स्थलों के आसपास भी नशे का खुला खेल देखने को मिल रहा है। “जय श्री राम” के नारे लगाने वाले कई युवा, उसी सांस में शराब की बोतल भी खोलते नजर आते हैं—यह विरोधाभास नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन का प्रतीक है।
ड्रग्स का फैलता जाल: पहाड़ से मैदान तक
देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों से लेकर पहाड़ों के अंतिम गांव तक स्मैक, नशीली गोलियां और इंजेक्शन आसानी से उपलब्ध हैं।
रुद्रपुर जैसे शहरों में स्थिति और भी गंभीर है, जहां:
लगभग हर गांव में नशे की उपलब्धता है
80% तक मेडिकल स्टोरों पर नशीली दवाइयों की अवैध बिक्री की शिकायतें हैं
कच्ची शराब खुलेआम बिक रही है
यह सवाल उठता है—इतना बड़ा नेटवर्क बिना संरक्षण के कैसे चल सकता है?
नशा माफिया: सत्ता का संरक्षण?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि नशा कारोबार में लगे 90% लोग बाहरी राज्यों से हैं। इससे भी ज्यादा गंभीर आरोप यह है कि इनमें से कई लोगों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।

“राजस्व में रिकॉर्ड, गांव-गांव तक शराब की दुकानों का विस्तार: धामी सरकार की ‘नई आबकारी उपलब्धि’ | नशा युक्त उत्तराखंड का कड़वा सच”
पुष्कर सिंह धामी सरकार आबकारी से 5000 करोड़ से अधिक राजस्व जुटाने को उपलब्धि बता रही है, लेकिन सवाल यह है कि शराब से आय तो सरकार को मिल रही है—पर स्मैक, नशीली दवाइयों और कच्ची शराब के बढ़ते जाल से किसे फायदा? ये अवैध धंधे नशा तस्करों, संरक्षण देने वाले तंत्र और काले कारोबारियों को मजबूत कर रहे हैं। एक ओर सरकारी खजाना भर रहा है, दूसरी ओर समाज खोखला हो रहा है—यही इस “उपलब्धि” का असली कड़वा सच है।


यहां तक कि:
कुछ नशा तस्कर पार्षद बन गए
कुछ ग्राम प्रधान और बीडीसी सदस्य तक पहुंच गए
अगर यह सच है, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के अपहरण का संकेत है।
अपराध और नशा: एक खतरनाक गठजोड़
उत्तराखंड में बढ़ते अपराधों—लूट, हत्या, बलात्कार—के पीछे नशे की भूमिका लगातार सामने आ रही है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड, देहरादून का गोलीकांड, और अन्य कई घटनाओं में नशे का सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध देखा गया है।
रुद्रपुर में हाल ही में मिले छह लावारिस शव इस बात का प्रमाण हैं कि:
नशेड़ी अब छोटी चोरी से आगे बढ़कर लूट और हत्या तक पहुंच चुके हैं
₹500–₹2000 के लिए किसी की जान लेना आम हो गया है
SIDCUL क्षेत्रों में तनख्वाह के दिनों में ऐसे अपराधों की संख्या और बढ़ जाती है।
पुलिस और प्रशासन: बेबस या सहभागी?
जब नशा घर-घर तक “होम डिलीवरी” के जरिए पहुंचने लगे, तो यह मानना मुश्किल हो जाता है कि प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है।
सवाल यह है:
क्या पुलिस असमर्थ है?
या कहीं न कहीं यह सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है?
अगर सरकार स्वयं “नशा युक्त उत्तराखंड” की ओर बढ़ रही है, तो प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका सीमित हो जाती है—या फिर वह उसी दिशा में काम करने लगती है।
नशा मुक्ति का सपना: एक राजनीतिक नारा?
“नशा मुक्त उत्तराखंड” एक समय सरकार का प्रमुख नारा था। लेकिन आज की स्थिति को देखते हुए यह नारा एक व्यंग्य जैसा लगता है।
वास्तविकता यह है कि:
नशे की उपलब्धता बढ़ी है
नशेड़ियों की संख्या बढ़ी है
नशे से जुड़े अपराध बढ़े हैं
ऐसे में “नशा मुक्ति” की परिकल्पना सिर्फ कागजों और भाषणों तक सीमित रह गई है।
चुनाव 2027: क्या होगा मुद्दा?
अगर यही स्थिति बनी रही, तो 2027 के चुनावों में एक अजीब दृश्य देखने को मिल सकता है:
नशा माफिया चुनाव मैदान में होंगे
नशे के शिकार युवा उनके समर्थक बनेंगे
और समाज का एक बड़ा वर्ग, जो इस दलदल में फंस चुका है, उसी व्यवस्था को आगे बढ़ाएगा
यह लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है।
उपलब्धि या विफलता?
अगर राजस्व बढ़ाना ही विकास का पैमाना है, तो निश्चित ही सरकार ने “उपलब्धि” हासिल की है। लेकिन अगर समाज, युवा पीढ़ी और कानून-व्यवस्था को भी विकास का हिस्सा माना जाए, तो यह उपलब्धि नहीं, बल्कि एक गंभीर विफलता है।
उत्तराखंड आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से दो रास्ते जाते हैं:
राजस्व के नाम पर नशे को बढ़ावा देना
या समाज को बचाने के लिए कठोर निर्णय लेना
सरकार को तय करना होगा कि वह किस दिशा में जाना चाहती है।
यह संपादकीय सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि चेतावनी है—अगर आज भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।


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