“उत्तराखण्ड की महिलाएँ” — 351 नारी शक्तियों के संघर्ष, साहस और उपलब्धियों का जीवंत दस्तावेज! उत्तराखण्ड की महिलाओं पर पुस्तक में आंदोलनकारी नारी शक्ति की उपेक्षा क्यों?

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रुद्रपुर/देहरादून, 17 अप्रैल 2026।
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है, बल्कि इस राज्य की असली ताकत उसकी संघर्षशील नारी शक्ति रही है। इसी सशक्त परंपरा, इतिहास और वर्तमान की जीवंत कहानियों को एक साथ समेटती पुस्तक “उत्तराखण्ड की महिलाएँ : संघर्ष और उपलब्धियों का परिचयात्मक संचयन” इन दिनों बौद्धिक जगत, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शोधार्थियों के बीच विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


यह पुस्तक उत्तराखण्ड की 351 महिलाओं के जीवन, उनके संघर्ष, उनके साहस और उनके द्वारा अर्जित उपलब्धियों का विस्तृत और तथ्यपरक दस्तावेज प्रस्तुत करती है। इसमें 60 दिवंगत और 291 वर्तमान में सक्रिय महिलाओं को शामिल किया गया है, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है।
प्रकृति, संघर्ष और नारी शक्ति का संबंध
पुस्तक की शुरुआत उत्तराखण्ड के जनजीवन और प्रकृति के बीच गहरे संबंध के विश्लेषण से होती है। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में उत्तराखण्ड की महिलाओं की भूमिका ऐतिहासिक रही है। जब-जब इन संसाधनों पर संकट आया, तब-तब यहाँ की महिलाओं ने आगे बढ़कर उसका मुकाबला किया।
चिपको आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाया। इसी तरह शराब विरोधी आंदोलनों में भी महिलाओं की निर्णायक भूमिका रही। इन आंदोलनों ने यह साबित किया कि उत्तराखण्ड की महिलाएँ केवल परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज और पर्यावरण की संरक्षक भी हैं।
वैश्विक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
पुस्तक में लेखिका ने महिलाओं की स्थिति को वैश्विक दृष्टिकोण से भी समझाने का प्रयास किया है। चीन की मोसुओ संस्कृति, इंडोनेशिया के मिनांगकाबाउ समाज, कोस्टारिका के ब्रिब्रि समुदाय, घाना के अकान समाज तथा मेघालय के खासी, गारो और जैंतिया समाज का उल्लेख करते हुए यह बताया गया है कि मातृसत्तात्मक परंपराएँ विश्व के विभिन्न हिस्सों में मौजूद रही हैं।
वहीं वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति का उल्लेख करते हुए अदिति, शची, गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्ववरा जैसी विदुषी महिलाओं का जिक्र पुस्तक को ऐतिहासिक गहराई प्रदान करता है।
स्वतंत्रता संग्राम से संविधान तक महिलाओं की भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी को भी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। भिकाजी कामा, एनी बेसेंट, प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, कस्तूरबा गांधी, मुथुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख और कैप्टन लक्ष्मी सहगल जैसी महान हस्तियों का उल्लेख प्रेरणादायी है।
स्वतंत्र भारत के संविधान में महिलाओं को मिले समान अधिकार—अनुच्छेद 14, 15 और 16—का भी पुस्तक में विस्तृत वर्णन किया गया है।
उत्तराखण्ड की वीरांगनाओं का स्वर्णिम इतिहास
उत्तराखण्ड के इतिहास में तीलू रौतेली, गौरा देवी, टिंचरी माई और बछेन्द्री पाल जैसी वीरांगनाओं का योगदान अमिट है। इन महिलाओं ने न केवल अपने साहस से इतिहास रचा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनीं।
विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय महिलाओं की सूची
राजनीति के क्षेत्र में
जिया राणी ‘मौला देवी’, रानी कर्णावती, तीलू रौतेली, गुलेरिया कुन्दन देई, महारानी कमलेन्दुमति शाह, आइरिन पंत, विनय लक्ष्मी सुमन, इला पंत, डाॅ० इन्दिरा हृदयेश, डाॅ० रीता बहुगुणा जोशी, माला राज्यलक्ष्मी शाह, गीता देवी, विजय बड़थ्वाल, मनोरमा डोबरियाल शर्मा, शैलारानी रावत, अमृता रावत, डाॅ० कल्पना सैनी, सरिता आर्य, ऋतु खण्डूड़ी भूषण, आशा नौटियाल, गरिमा मेहरा दसौनी, रेखा आर्य, नेहा जोशी, अनुकृति गुसाईं।
प्रशासन, न्याय और सेना में
माया टम्टा, मार्गरेट अल्वा, कंचन चौधरी भट्टाचार्य, न्यायमूर्ति रितु बाहरी, राधा रतूड़ी, वर्तिका जोशी।
शिक्षा के क्षेत्र में
चन्द्रमुखी बोस, महादेवी भटनागर, विद्यावती सेठ, चन्द्रावती लखनपाल, ललिता चन्दोला वैष्णव, बसन्त कुमारी घिल्डियाल, गंगोत्री गर्ब्याल, गिरिजा सकलानी, सुशीला डोभाल, सुधारानी पाण्डेय, उमा मैठाणी, उमा भट्ट, वीना साह, सविता मोहन, आशा पाण्डे, अन्नपूर्णा नौटियाल, मृदुला जुगरान, मंजुला राणा, कल्पना पंत, किरन त्रिपाठी, सुरेखा डंगवाल, अंजना जोशी।
पर्यावरण के क्षेत्र में
गौरा देवी, संग्रामी देवी राणा, सुलोचना गैरोला, बाली देवी, बौणी देवी, विशेश्वरी देवी, बसंती देवी।
सामाजिक आंदोलनों में
सरला बहन, शर्मदा त्यागी, टिंचरी माई, बिशनी देवी शाह, विमला बहुगुणा, सुशीला बलूनी, कौशल्या डबराल, कलावती देवी रावत, कमला पंत, बसंती पाठक, मधु थपलियाल।
समाज सेवा में
मीरा बहन, मंगला देवी जुयाल, राजमाता राजेश्वरी देवी, रेवती उनियाल, देविका चौहान, राधा भट्ट, जीवन्ती देवी खोयाल, मंगला माता, जाह्नवी तिवारी, गिरिबाला जुयाल, मधु मैखुरी, हेमलता बहन, अनुराधा पांडे, विजयलक्ष्मी बिजल्वाण जोशी, सविता नगरकोटी, किरन पाण्डेय, कमला रावत, ममता रावत।
उद्यमिता में
तुलसी देवी, शशि रतूड़ी ‘नमकवाली’, किरन भट्ट टोडरिया, नीलम नेगी ‘नीलकंठ’, स्वतंत्री बंधानी ‘श्वेता’, मंजू काला, पुष्पा चौहान, किरण नौगांई शर्मा, सीता भट्ट, रानू बिष्ट, मंजू टम्टा, सुमन अधिकारी, दीना रमोला, प्रेमा मेहता, पूजा गौड़, ममता मेहरा, मंजू आर. शाह, ऋचा डोभाल, नेहा कन्नौजिया, नूतन तन्नु पंत, दिव्या रावत, शिल्पा बहुगुणा भट्ट, रीना रावत, ऋतु नौटियाल श्रीयाल, बबीता रावत, संगीता बहुगुणा।
पर्वतारोहण में
चन्द्रप्रभा ऐतवाल, बछेन्द्री पाल, हर्षवन्ती बिष्ट, सुमन कुटियाल दताल, हर्षा रावत, ताशी नुंग्शी, नूतन वशिष्ठ, प्रीति नेगी, शीतल राज, सविता कंसवाल, पूनम राणा।
खेलों में
हंसा मनराल शर्मा, मधुमिता बिष्ट, रीना कौशल धर्मसक्तू, नीरजा गोयल, वंदना पंवार, एकता बिष्ट, सुनीता चौहान, कमला रावत, रक्षिता पंत, स्वाति बिष्ट, वंदना कटारिया, अंकिता ध्यानी, मानसी नेगी।
योग एवं जीवन कौशल
इन्दु शर्मा उनियाल, उषा नेगी, अनीता मिश्रा, रश्मि बसलियाल, कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’, तन्नु मित्तल।
कला, रंगमंच, संगीत, साहित्य, पत्रकारिता और विज्ञान
(यहाँ पुस्तक में वर्णित सभी नामों को विस्तार से शामिल किया गया है — जैसे उर्वशी रौतेला, हिमानी शिवपुरी, नेहा कक्कड़, मीना राणा, नमिता गोखले, मृणाल पाण्डे, वंदना शिवा, वीणा टंडन, मीनाक्षी कण्डवाल, तान्या पुरोहित आदि—जो अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखती हैं।)
समग्र मूल्यांकन
यह पुस्तक उत्तराखण्ड की महिलाओं के संघर्ष और उपलब्धियों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह केवल नामों का संकलन नहीं है, बल्कि उन कहानियों का संग्रह है जो समाज को प्रेरित करती हैं। शोधार्थियों, विद्यार्थियों और समाज के हर वर्ग के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
उत्तराखण्ड की नारी शक्ति की यह गाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगी। यह पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि संघर्ष, साहस और संकल्प के बल पर महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ हासिल कर सकती हैं।

संपादकीय | हिन्दुस्तान ग्लोबल टाइम्स
उत्तराखण्ड की महिलाओं पर पुस्तक में आंदोलनकारी नारी शक्ति की उपेक्षा क्यों?
अवतार सिंह बिष्ट,उत्तराखण्ड की 351 कर्मशील महिलाओं पर आधारित यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण प्रयास है, परन्तु इसमें राज्य निर्माण के मूल आधार—उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन—की अग्रिम पंक्ति की महिलाओं का समुचित उल्लेख न होना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। जिस आंदोलन ने इस राज्य को जन्म दिया, उसी की नारी शक्ति को नजरअंदाज करना कहीं न कहीं ऐतिहासिक संतुलन को कमजोर करता है। अमर शहीद महिलाओं सहित हंस देनाई, बेलमती चौहान जैसी जुझारू हस्तियों का न केवल नाम, बल्कि उनका चित्र और संघर्ष भी इस संकलन में प्रमुखता से होना चाहिए था।
यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि भविष्य के संस्करणों में उन शीर्ष महिला आंदोलनकारियों को भी स्थान दिया जाए, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वस्व त्यागकर उत्तराखण्ड की पहचान गढ़ी। राज्य आंदोलन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था, यह जनभावनाओं का विस्फोट था, जिसमें महिलाओं की भूमिका निर्णायक रही। ऐसे में उन शहीद और अग्रणी महिलाओं को स्थान देना इतिहास के प्रति न्याय होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी।


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