

देहरादून। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से प्रदेश की राजनीति और विकास की दिशा को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल ने राज्य की मूल अवधारणा के साथ हो रहे कथित समझौते को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए ज्ञापन सौंपा है। पार्टी की वरिष्ठ नेत्री प्रमिला रावत के नेतृत्व में दिए गए इस ज्ञापन में राज्य की वर्तमान स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
ज्ञापन में कहा गया है कि जिस उद्देश्य के लिए उत्तराखंड का गठन किया गया था, आज वही उद्देश्य पूरी तरह हाशिए पर चला गया है। राज्य बनने के बाद से अब तक सत्ता मुख्यतः भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथों में रही, लेकिन जनता की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
प्रमिला रावत ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा व्यवस्था लगातार गंभीर होती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के संसाधनों पर माफियाओं का कब्जा बढ़ता जा रहा है, जिसमें अवैध खनन, भू-माफिया और वन माफिया का प्रभाव साफ दिखाई देता है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रदेश में सामाजिक और नैतिक गिरावट के संकेत भी सामने आ रहे हैं। स्पा सेंटरों की आड़ में चल रही अवैध गतिविधियां और बढ़ते अपराध समाज के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं।
उक्रांद ने मांग की है कि राज्य की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए नीतियों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए और स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।
पार्टी का कहना है कि यदि समय रहते इन मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो राज्य आंदोलन की मूल भावना पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। ज्ञापन के माध्यम से सरकार को चेतावनी देते हुए उक्रांद ने स्पष्ट किया कि वह जनता के हितों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं करेगी।
इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या उत्तराखंड अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया है, और क्या क्षेत्रीय राजनीति को पुनः मजबूत करने की आवश्यकता है।




