उद्योगों की चमक के पीछे श्रमिकों का अंधेरा सच: धामी सरकार से जवाब मांग रहा उत्तराखंड

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देहरादून/रुद्रपुर।उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक भौगोलिक पुनर्गठन की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह उस सपने की लड़ाई थी जिसमें पहाड़ के युवाओं को अपने ही राज्य में सम्मानजनक रोजगार मिले, पलायन रुके, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार हो और विकास का मॉडल जनहित आधारित हो। वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद सत्ता में आई हर सरकार ने इसी भावना को आधार बनाकर बड़े-बड़े वादे किए। कहा गया कि उत्तराखंड को औद्योगिक हब बनाया जाएगा, निवेश आएगा, रोजगार बढ़ेगा और युवा समृद्ध होंगे।
इसी सोच के तहत पंतनगर, रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार, सितारगंज और देहरादून जैसे क्षेत्रों में उद्योगों को आकर्षित करने के लिए सरकारों ने जमीन औने-पौने दामों पर उपलब्ध कराई। टैक्स में भारी छूट दी गई, बिजली सब्सिडी दी गई, परिवहन सुविधाएं दी गईं और कई औद्योगिक नीतियों के माध्यम से निवेशकों के लिए लाल कालीन बिछा दी गई। सरकारों ने दावा किया कि इससे उत्तराखंड में रोजगार क्रांति आएगी।
लेकिन आज जब इन दावों की जमीनी हकीकत देखी जाती है तो तस्वीर बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। उद्योगों की चमकदार इमारतों के पीछे हजारों श्रमिकों का दर्द छिपा हुआ है। जिन हाथों ने उद्योगों को खड़ा किया, उन्हीं हाथों को आज न्यूनतम वेतन, सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां और सामाजिक सुरक्षा तक नसीब नहीं हो रही।
8 घंटे की जगह 12 घंटे का श्रम
उत्तराखंड के कई औद्योगिक क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिक लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि उनसे तय मानकों से अधिक काम लिया जा रहा है। श्रम कानून स्पष्ट रूप से कार्य अवधि तय करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई फैक्ट्रियों में मजदूरों से 10 से 12 घंटे तक काम कराया जा रहा है।
ओवरटाइम कराया जाता है लेकिन उसका भुगतान या तो बहुत कम होता है या कई मामलों में दिया ही नहीं जाता। श्रमिकों की मजबूरी यह है कि रोजगार के सीमित अवसरों के कारण वे इस शोषण को सहने के लिए मजबूर हैं।
महंगाई के दौर में जब गैस सिलेंडर, बच्चों की फीस, इलाज, किराया और खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, तब 8 हजार, 10 हजार या 12 हजार रुपये की आय किसी परिवार के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
ठेकेदारी प्रथा बना शोषण का सबसे बड़ा हथियार
उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्रों में स्थायी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं। कंपनियां सीधे भर्ती करने के बजाय ठेकेदारों के माध्यम से श्रमिकों को नियुक्त कर रही हैं।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान मजदूरों को उठाना पड़ रहा है—
ईपीएफ की अनियमितता
ईएसआई सुविधाओं में कटौती
नौकरी की कोई गारंटी नहीं
कभी भी हटाए जाने का डर
वेतन में कटौती
स्थायी कर्मचारी का दर्जा न मिलना
कई श्रमिकों का आरोप है कि जैसे ही किसी कर्मचारी को स्थायी करने का समय आता है, उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है या कुछ समय का ब्रेक देकर दोबारा अस्थायी आधार पर रख लिया जाता है।
यह व्यवस्था कंपनियों के लिए लाभकारी हो सकती है, लेकिन मजदूरों के लिए यह आर्थिक गुलामी से कम नहीं।
महिला श्रमिकों की स्थिति और अधिक गंभीर
उत्तराखंड की कई फैक्ट्रियों में बड़ी संख्या में महिलाएं कार्यरत हैं। लेकिन उनके सामने चुनौतियां और अधिक गंभीर हैं।
महिला कर्मचारियों द्वारा समय-समय पर आरोप लगाए गए हैं कि—
शौचालय की पर्याप्त व्यवस्था नहीं
पीने के पानी की समस्या
मातृत्व सुविधाओं का अभाव
प्रबंधन का अमानवीय व्यवहार
कार्यस्थल पर असुरक्षा की भावना
सरकार मंचों से महिला सम्मान की बातें करती है, लेकिन यदि उद्योगों में कार्यरत महिलाओं की स्थितियां ऐसी हैं तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
न्यूनतम मजदूरी पर सरकार की विफलता
मार्च 2024 में राज्य सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का निर्णय लिया था। इससे मजदूरों में उम्मीद जगी कि शायद उन्हें राहत मिलेगी। लेकिन यह फैसला कानूनी विवादों में फंस गया।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सरकार ने निर्णय लेने से पहले पर्याप्त कानूनी तैयारी नहीं की थी?
यदि मजदूरी वृद्धि का फैसला अदालत में टिक नहीं पाया तो इसका सीधा नुकसान गरीब मजदूरों को हुआ। यह सरकार की नीति निर्माण क्षमता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
सबसे कम मजदूरी वाले राज्यों में उत्तराखंड?
यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि जिस राज्य ने रोजगार के नाम पर उद्योगों को करोड़ों की रियायतें दीं, वहीं श्रमिकों को देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में कम मजदूरी मिल रही है।
कई मजदूर बताते हैं कि उन्हें 7 हजार से 9 हजार रुपये तक मासिक वेतन दिया जाता है। कुछ कंपनियों में 10 से 12 हजार रुपये मिलते हैं, लेकिन उसके बदले श्रमिकों से अत्यधिक काम लिया जाता है।
यह मॉडल विकास नहीं, बल्कि सस्ता श्रम आधारित आर्थिक शोषण प्रतीत होता है।
आखिर श्रम विभाग कर क्या रहा है?
सबसे बड़ा सवाल फैक्ट्री मालिकों से पहले राज्य के श्रम विभाग पर खड़ा होता है।
यदि—
न्यूनतम मजदूरी तय है
कार्य घंटे तय हैं
सुरक्षा मानक तय हैं
महिला सुरक्षा कानून मौजूद हैं
तो फिर इनका पालन क्यों नहीं हो रहा?
क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित है?
क्या भ्रष्टाचार ने श्रम विभाग की भूमिका कमजोर कर दी है?
क्या राजनीतिक दबाव के कारण अधिकारी उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते?
यह प्रश्न आज उत्तराखंड का हर श्रमिक पूछ रहा है।
उद्योगों को लाभ, पहाड़ खाली
राज्य गठन के समय कहा गया था कि उद्योगों के माध्यम से पलायन रोका जाएगा। लेकिन दो दशक बाद भी पहाड़ों की स्थिति गंभीर बनी हुई है।
गांव खाली हो रहे हैं।
युवा दिल्ली, चंडीगढ़, गुजरात और अन्य राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं।
बड़े उद्योग मैदानी क्षेत्रों तक सीमित रहे और पहाड़ी जिलों में रोजगार आधारित औद्योगिक मॉडल विकसित नहीं हो पाया।
यह राज्य निर्माण के मूल उद्देश्य की विफलता है।
राजनीतिक चंदा और कॉरपोरेट प्रभाव?
श्रमिक संगठनों द्वारा समय-समय पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि बड़ी कंपनियां राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को भारी चंदा देती हैं और बदले में उनके हितों की रक्षा की जाती है।
यदि यह आरोप गलत हैं तो सरकार को पारदर्शिता के साथ जवाब देना चाहिए।
यदि आरोप सही हैं तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
बढ़ता श्रमिक असंतोष
 

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने कहा था कि “2025 का दशक उत्तराखंड का दशक होगा”, और मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने इसे विकास, निवेश और रोजगार के बड़े नारे के रूप में पूरे देश में प्रचारित किया। निवेश सम्मेलनों में उत्तराखंड की तस्वीर चमकदार दिखाई गई, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इस तथाकथित “स्वर्णिम दशक” में प्रदेश का श्रमिक आज भी शोषण, कम वेतन और ठेकेदारी व्यवस्था की जंजीरों में जकड़ा हुआ है।
जिस उत्तराखंड राज्य की मूल अवधारणा स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देने, पलायन रोकने और संसाधनों पर जनता का अधिकार सुनिश्चित करने की थी, आज वही राज्य सस्ते श्रम की प्रयोगशाला बनता दिख रहा है। उद्योगों को जमीन, टैक्स छूट और सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन मजदूर को 8 घंटे की जगह 12 घंटे काम, असुरक्षित नौकरी और अपमानजनक वेतन मिल रहा है।
यदि यही “उत्तराखंड का दशक” है तो फिर पहाड़ क्यों खाली हो रहे हैं? युवा क्यों पलायन कर रहे हैं? और मजदूर अपने ही राज्य में शोषण क्यों झेल रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह दशक उत्तराखंड का नहीं, बल्कि केवल उद्योगपतियों के मुनाफे का दशक बनता जा रहा है।


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