ज्येष्ठ अमावस्या पर आने वाला वट सावित्री पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान , भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति, अटूट विश्वास और पारिवारिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक है। यह वह पावन अवसर है जब सनातन परंपरा नारी के त्याग, तप, बुद्धिमत्ता और संकल्प को प्रणाम करती है। माता सावित्री ने जिस प्रकार अपने सतीत्व और विवेक से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए, वह कथा आज भी समाज को यह संदेश देती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और धर्मनिष्ठा के सामने मृत्यु जैसी बाधा भी पराजित हो सकती है।
वट वृक्ष भारतीय संस्कृति में अक्षय जीवन, स्थिरता और संरक्षण का प्रतीक माना गया है। इसकी जड़ों में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में भगवान शिव का वास माना जाता है। यही कारण है कि वट सावित्री व्रत पति की दीर्घायु के साथ संपूर्ण परिवार की सुख-समृद्धि और वंश वृद्धि की मंगलकामना का पर्व है।
इस वर्ष वट सावित्री के साथ शनि जयंती का दुर्लभ संयोग इस पर्व को अधिक आध्यात्मिक बना रहा है। ऐसे समय में पूजा, दान, सेवा और संयम का महत्व बढ़ जाता है। शनि केवल दंड के देवता नहीं, वे कर्म और न्याय के प्रतीक हैं। जरूरतमंदों की सहायता, वृद्धजनों की सेवा और धर्मसम्मत आचरण ही वास्तविक शनि उपासना है।
आज आधुनिकता के दौर में जब पारिवारिक मूल्य और आध्यात्मिक चेतना कमजोर पड़ती दिखाई देती है, तब ऐसे पर्व समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। वट सावित्री हमें केवल व्रत करना नहीं सिखाता, यह भी बताता है कि रिश्तों की मजबूती त्याग, विश्वास और समर्पण से बनी रहती है।
शास्त्रों की मर्यादा, पूजा की पवित्रता और सेवा भाव के साथ मनाया गया यह पर्व निश्चित रूप से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करता है। अखंड सौभाग्य, सुख और धर्ममय जीवन की यही सनातन कामना इस पर्व का वास्तविक संदेश है।
तिथि: 16 मई 2026 (शनिवार)अमावस्या तिथि प्रारंभ: 16 मई सुबह 5:11 बजेपूजा का मुख्य मुहूर्त: सुबह 11:50 से दोपहर 12:44 तकअन्य शुभ मुहूर्त: सुबह 7:12 से 8:24 बजेमहत्व: यह व्रत सावित्री-सत्यवान की कथा से प्रेरित है, जो अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।पूजा विधि: महिलाएं लाल कपड़े पहनकर, बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा करती हैं। वे वट वृक्ष की जड़ में जल, रोली, और फूल अर्पित करती हैं और कच्चा सूत (धागा) लपेटकर 7, 21 या 108 बार परिक्रमा करती हैं।
