पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले डेढ़ दशक से जिस पार्टी का दबदबा रहा,वह आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। 2011 में वामपंथी शासन को समाप्त कर सत्ता में आई ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पहली बार ऐसी स्थिति में पहुंची है,जहां उसे केवल विपक्ष के राजनीतिक हमलों का ही नहीं,बल्कि अपने ही संगठन के भीतर पैदा हो रहे असंतोष का भी सामना करना पड़ रहा है।

Spread the love

विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ही टीएमसी में उठापटक जारी है। कई विधायक टीएमसी शीर्ष नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों से दूरी बना रहे हैं, तो बड़ी संख्या में नेता पार्टी से इस्तीफा दे रहे हैं। ऐसे में बंगाल के सियासी गलियारों में टीएमसी में फूट और मनमुटाव की खबरें छाई हुई हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड

इस बीच बीजेपी नेता सौमित्र खान ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि टीएमसी के कई सांसद और विधायक बीजेपी में आने को तैयार है। जिसके बाद यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या टीएमसी वास्तव में अपने सबसे बड़े संगठनात्मक संकट से गुजर रही है? क्या यह केवल चुनावी हार के बाद की अस्थायी बेचैनी है या फिर पार्टी की शक्ति-संरचना में किसी बड़े बदलाव का संकेत? आज हम इन्हीं सवालों के जवाब जानने की कोशिश करेंगे…

हार के बाद दिख रही संगठनात्मक कमजोरी

राजनीति में चुनावी हार केवल सत्ता छिनने का नाम नहीं होती। कई बार हार के बाद यह भी पता चलता है कि पार्टी की वास्तविक ताकत कितनी है और संगठन कितना एकजुट है। 15 साल तक सत्ता का सुख भोगने के बाद अब टीएमसी के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है। आज ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर बुलाई गई बैठक में से पार्टी के 80 में से 60 विधायकों का नदारद रहना इस बात की बानगी है। अब इसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में हो रही है।

कालीघाट बैठक में क्या रहा?

अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हमले के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के विधायक दल के नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय द्वारा रविवार दोपहर को ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर एक बैठक बुलाई गई थी। हालांकि बाद में इसे रद्द कर दिया गया, क्योंकि वहां केवल 80 विधायकों में से 20 ही उपस्थित थे। जिस कालीघाट को कभी बंगाल की सत्ता का एक तरह से केंद्र कहा जाता था,उससे विधायकों की दूरी ने साफ संकेत दे दिए हैं कि अब उनका मन बदल चुका है और ममता के नेृत्तृव के प्रति विद्रोह की कहानी लिखी जा चुकी है। पार्टी प्रमुख के आवास पर हुई बैठक में तृणमूल कांग्रेस के 60 विधायकों की अनुपस्थिति से संकेत मिलता है कि अपने 80 विधायकों के बीच समन्वय मजबूत करने का नेतृत्व का प्रयास बुरी तरह विफल रहा।

बीजेपी के दावे ने क्यों बढ़ा दी हलचल?

स्थिति तब और दिलचस्प हो गई जब पश्चिम बंगाल भाजपा के सांसद सौमित्र खान ने दावा किया कि टीएमसी के लगभग 20 सांसद और करीब 50 विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं तथा भाजपा के संपर्क में हैं।इस दावे का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि टीएमसी के पास लोकसभा में 29 सांसद हैं। दलबदल विरोधी कानून के तहत यदि किसी दल के दो-तिहाई सांसद एक साथ अलग होते हैं तो वे अयोग्यता से बच सकते हैं। 29 सांसदों के मामले में यह संख्या लगभग 20 बैठती है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी झटके के बाद टीएमसी संगठन में बदलाव और नेतृत्व स्तर पर लिए जा रहे फैसलों पर सभी की नजर है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि बीजेपी सांसद के दावों में कितनी सच्चाई है, लेकिन इन बयानों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में संभावित समीकरणों को लेकर चर्चा जरूर छेड़ दी है। इन राजनीतिक अटकलों के बीच पार्टी के भीतर संगठनात्मक बदलाव भी चर्चा में हैं। हाल ही में टीएमसी ने लोकसभा में अपने वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी को पार्टी का नया चीफ व्हिप नियुक्त किया है। इससे पहले ये जिम्मेदारी काकोली घोष संभाल रही थीं। इस बदलाव के बाद से काकोली घोष की नाराजगी को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। हाल ही में बंगाल के उत्तर 24 परगना के कई टीएमसी पार्षदों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। जिस वजह से टीएमसी में टूट और फूट की खबरों को और ज्यादा बल मिल रहा है।

पार्टी के भीतर बढ़ती खींचतान ने बढ़ाई चिंता

चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर संगठन की कार्यप्रणाली, नेतृत्व के तौर-तरीकों और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि शीर्ष स्तर पर फैसले लेने का तरीका बदलने की जरूरत है, जबकि दूसरा वर्ग मौजूदा व्यवस्था को संगठन की मजबूती और अनुशासन के लिए जरूरी बता रहा है। इस बहस के बीच वरिष्ठ नेता कुणाल घोष का बयान भी चर्चा में आ गया, जिसमें उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी के कई नेता लगातार राजनीतिक और मानसिक दबाव के माहौल में काम कर रहे हैं। उनके इस बयान ने संगठन के भीतर चल रही बेचैनी की चर्चाओं को और हवा दे दी है।

क्या बदल रही है टीएमसी की आंतरिक शक्ति-संरचना?

विश्लेषकों का मानना है कि हाल के घटनाक्रम केवल कुछ नेताओं की नाराजगी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पार्टी के भीतर चल रहे व्यापक बदलावों की ओर संकेत करते हैं। चुनावी पराजय के बाद नेतृत्व की भूमिका, निर्णय प्रक्रिया और संगठन में शक्ति के केंद्रीकरण को लेकर बहस तेज हुई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां संगठनात्मक पुनर्संतुलन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यदि नेतृत्व समय रहते असंतोष को नियंत्रित करने और विभिन्न धड़ों के बीच संतुलन बनाने में सफल नहीं हुआ, तो इसका असर पार्टी की जमीनी पकड़, कार्यकर्ताओं के मनोबल और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर पड़ सकता है।


Spread the love