उत्तराखंड सरकार लगातार निवेश, उद्योग, रोजगार और पर्यटन में रिकॉर्ड उपलब्धियों के दावे कर रही है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से लेकर नए औद्योगिक निवेश और पर्यटन वृद्धि तक के आंकड़े जनता के सामने रखे जा रहे हैं। लेकिन मई 2026 के जीएसटी आंकड़े एक अलग कहानी कहते दिखाई दे रहे हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
जब पूरे देश का जीएसटी संग्रह 3.2 प्रतिशत बढ़ा है, तब उत्तराखंड में 19 प्रतिशत की गिरावट चिंताजनक सवाल खड़े करती है। यदि राज्य में उद्योग तेजी से बढ़ रहे हैं, पर्यटन चरम पर है और आर्थिक गतिविधियां मजबूत हैं, तो फिर कर संग्रह में इतनी बड़ी कमी क्यों आई?
सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि जीएसटी पंजीकृत कारोबारियों की संख्या एक वर्ष में लगभग 28 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन राजस्व घट गया। इसका अर्थ है कि या तो नए पंजीकरण आर्थिक गतिविधियों में अपेक्षित योगदान नहीं दे पा रहे हैं, या फिर बड़े करदाता पहले की तुलना में कम कारोबार कर रहे हैं। दोनों ही स्थितियां अर्थव्यवस्था की मजबूती के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
राज्य को राहत केवल आइजीएसटी सेटलमेंट से मिली है, जिससे कुल राजस्व संतुलित दिखाई देता है। लेकिन किसी भी राज्य की वास्तविक आर्थिक ताकत उसकी अपनी कर वसूली से मापी जाती है, न कि बाहरी समायोजन से मिलने वाली राहत से।
उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों ने वृद्धि दर्ज की है, जबकि उत्तराखंड पीछे छूटता दिख रहा है। ऐसे में सरकार को केवल उपलब्धियों के विज्ञापन नहीं, बल्कि गिरावट के वास्तविक कारणों को भी सार्वजनिक करना चाहिए। क्या उद्योगों में सुस्ती है? क्या उपभोग घट रहा है? क्या निवेश धरातल पर नहीं उतर पा रहा? या फिर सरकारी दावों और आर्थिक हकीकत के बीच कोई बड़ी खाई मौजूद है?
जीएसटी के ये आंकड़े केवल राजस्व का विषय नहीं हैं, बल्कि राज्य की आर्थिक सेहत का आईना हैं। सरकार के लिए यह आत्ममंथन का समय है, क्योंकि आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि चमकदार दावों के पीछे कहीं न कहीं आर्थिक सुस्ती की परछाईं भी मौजूद है।
