इस फैसले के बाद अब उनके केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाने का रास्ता लगभग साफ हो गया है.
प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने 13 जून को आधिकारिक रूप से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी कर दिया है. यह अनुमति राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा लोकपाल के स्थापना विभाग को भेजी गई है. इससे पहले संजीव चतुर्वेदी लंबे समय से लोकपाल में काम करने की इच्छा जता चुके थे और उन्होंने इसके लिए आवेदन भी किया था.
संजीव चतुर्वेदी वर्तमान में उत्तराखंड में मुख्य वन संरक्षक और हल्द्वानी स्थित वन प्रशिक्षण अकादमी के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं. वह 2002 बैच के IFS अधिकारी हैं और अपनी ईमानदारी तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख के लिए देशभर में जाने जाते हैं.
चतुर्वेदी का नाम खासतौर पर इसलिए चर्चा में रहता है क्योंकि उन्होंने अपने करियर के दौरान कई बड़े भ्रष्टाचार मामलों का खुलासा किया है. हरियाणा में वन घोटाले और दिल्ली के एम्स में अनियमितताओं के मामलों को उजागर करने के कारण उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली. उनकी इसी ईमानदार छवि के चलते उन्हें वर्ष 2015 में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.
संजीव चतुर्वेदी की नियुक्ति को माना जा रहा अहम कदम
लोकपाल में संयुक्त सचिव का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह संस्था देश में उच्च स्तर के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और निगरानी का काम करती है. ऐसे में संजीव चतुर्वेदी जैसे अधिकारी की नियुक्ति को पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
गौरतलब है कि संजीव चतुर्वेदी पहले भी लोकपाल में प्रतिनियुक्ति के लिए प्रयास कर चुके हैं. इस संबंध में उनका मामला न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर भी लंबित रहा था. वर्ष 2022 में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने केंद्र सरकार को उनके आवेदन पर निर्णय लेने के निर्देश दिए थे. अब राज्य सरकार की मंजूरी मिलने के बाद यह प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है.
अंतिम निर्णय लिया जाएगा केंद्र सरकार की ओर से
हालांकि अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और लोकपाल कार्यालय की ओर से लिया जाएगा, लेकिन राज्य सरकार की सहमति इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण मानी जाती है. इस मंजूरी के बाद अब केंद्र स्तर पर औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उनकी नियुक्ति पर अंतिम मुहर लग सकती है.
कुल मिलाकर, संजीव चतुर्वेदी की लोकपाल में संभावित नियुक्ति को एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है. यह न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि इससे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ संस्थागत लड़ाई को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है.
