रुद्रपुर,उत्तराखंड सरकार ने राज्य की साक्षरता दर 98.7 प्रतिशत होने का दावा करते हुए कैबिनेट की मंजूरी के बाद राज्य को पूर्ण साक्षर घोषित करने का प्रस्ताव स्वीकृत कर दिया है। सरकार इसे शिक्षा क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, लेकिन इस दावे पर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और स्थानीय लोगों ने सवाल खड़े किए हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।
सरकार के अनुसार वर्ष 2023-24 में राज्य की साक्षरता दर 83.8 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 98.7 प्रतिशत हो गई। यानी मात्र दो वर्षों में लगभग 14.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सरकार का कहना है कि यह उपलब्धि नव भारत साक्षरता कार्यक्रम ‘उल्लास’, शिक्षा विभाग, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय निकायों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है।
हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि साक्षरता दर के आंकड़े और वास्तविक शिक्षा व्यवस्था में बड़ा अंतर है। राज्य के अनेक दूरस्थ गांवों में आज भी बच्चों की शिक्षा कक्षा 5 या 8 के बाद बाधित हो जाती है। कई क्षेत्रों में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय तक पहुंचने के लिए छात्रों को 10 से 20 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे अक्सर आगे की पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि साक्षरता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दो अलग-अलग विषय हैं। किसी व्यक्ति का अपना नाम लिख लेना या सामान्य पढ़ना-लिखना सीख लेना उसे साक्षर श्रेणी में ला सकता है, लेकिन इससे उच्च शिक्षा, रोजगार और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में उसकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती।
आलोचकों का यह भी कहना है कि उत्तराखंड में उच्च शिक्षा की पहुंच सीमित है। सरकारी संस्थानों की संख्या और क्षमता सीमित होने के कारण बड़ी संख्या में छात्रों को निजी संस्थानों का सहारा लेना पड़ता है, जहां शिक्षा का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह बोझ उठाना संभव नहीं होता।
एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर भी उठ रहा है। कई क्षेत्रों में सरकारी विद्यालयों में स्थानीय छात्रों की संख्या लगातार घट रही है। आरोप है कि सरकारी कर्मचारियों और सक्षम वर्ग के परिवार अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेज रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालय संसाधनों और शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में एक स्वतंत्र और व्यापक सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए, जिसमें यह आकलन हो कि साक्षरता दर में शामिल लोगों में कितने वास्तव में उत्तराखंड में रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और कितने वे लोग हैं जो दशकों पहले रोजगार और शिक्षा के लिए दिल्ली, मुंबई तथा अन्य महानगरों में बस गए थे। यह भी जांच का विषय है कि सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं की वास्तविक भागीदारी कितनी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार को केवल साक्षरता प्रतिशत के आधार पर सफलता का दावा करने के बजाय स्कूलों की गुणवत्ता, उच्च शिक्षा तक पहुंच, शिक्षकों की उपलब्धता, पलायन और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान देना चाहिए। उनका तर्क है कि जब तक पहाड़ के गांवों का बच्चा बिना आर्थिक और भौगोलिक बाधाओं के उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकेगा, तब तक शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक सफलता का दावा अधूरा रहेगा।
ऐसे में उत्तराखंड को पूर्ण साक्षर राज्य घोषित किए जाने के बावजूद यह बहस जारी है कि क्या बढ़ी हुई साक्षरता दर वास्तव में शिक्षा व्यवस्था की मजबूती का प्रमाण है, या फिर जमीनी चुनौतियां अभी भी सरकार के दावों से कहीं बड़ी हैं।
