राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण: क्या केवल चंपत राय जिम्मेदार हैं या जांच की जद में पूरा तंत्र आना चाहिए?

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अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा गबन का मामला अब केवल आर्थिक अनियमितता का नहीं रह गया है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास, धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है। एक ओर चंपत राय के पैतृक गांव बिजनौर से उनके समर्थन में आवाजें उठ रही हैं, वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियां लगातार पूछताछ और साक्ष्य जुटाने में लगी हैं। ऐसे में भावनाओं से अधिक तथ्यों के आधार पर चर्चा आवश्यक है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


चंपत राय के गांव के लोग उनके सादगीपूर्ण जीवन, त्याग और ईमानदारी की मिसाल देते हैं। यह भी सत्य है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान जेल काटी, अध्यापक की नौकरी छोड़ी और दशकों तक राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। किसी व्यक्ति का पूर्व जीवन और त्याग निश्चित रूप से उसके चरित्र के आकलन में महत्व रखता है। लेकिन केवल सादगी या त्याग किसी भी आर्थिक अनियमितता की जांच का विकल्प नहीं हो सकता।
दूसरी ओर, यदि वास्तव में SIT लगभग 150 लोगों से पूछताछ कर चुकी है, कथित रूप से लगभग 80 लाख रुपये की रिकवरी हुई है और संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज मिले हैं, तो यह संकेत देता है कि जांच केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया और जांच रिपोर्ट से ही निकलेगा, न कि मीडिया रिपोर्टों से।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न चंपत राय के उस कथित बयान पर उठता है जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें चढ़ावे में हुई कथित गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी। यदि कोई व्यक्ति किसी बड़े धार्मिक ट्रस्ट का शीर्ष पदाधिकारी या महासचिव रहा हो, तो उसके लिए “मुझे जानकारी नहीं थी” कहना नैतिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टियों से गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
यदि वास्तव में जानकारी नहीं थी, तो इसका अर्थ है कि ट्रस्ट की निगरानी व्यवस्था विफल थी। यदि जानकारी थी और कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला और गंभीर हो जाता है। दोनों ही स्थितियों में जवाबदेही का प्रश्न समाप्त नहीं होता।
इसी कारण चंपत राय द्वारा नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना अपने आप में यह स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता कि वे दोषी हैं, लेकिन यह अवश्य दर्शाता है कि संस्था की जवाबदेही शीर्ष नेतृत्व तक जाती है। लोकतांत्रिक और संस्थागत व्यवस्था में नैतिक जिम्मेदारी का सिद्धांत यही कहता है कि यदि किसी संस्था में गंभीर वित्तीय गड़बड़ी होती है तो शीर्ष पदाधिकारी उत्तरदायित्व से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू सामने आया है। विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों ने इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए चंपत राय का बचाव किया है। किसी भी व्यक्ति को निष्पक्ष जांच से पहले दोषी घोषित करना उचित नहीं है, लेकिन उतना ही अनुचित यह भी होगा कि जांच पूरी होने से पहले उसे पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दिया जाए। जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करने देना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की कसौटी है।
कुछ राजनीतिक वक्तव्यों में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य दलों पर आरोप लगाए गए हैं। ऐसे बयान राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन वे जांच का विकल्प नहीं हैं। इसी प्रकार यह कहना कि “भगवान स्वयं सजा देंगे” आस्था का विषय हो सकता है, परंतु कानून का स्थान न्यायिक प्रक्रिया ही ले सकती है।
यदि यह मामला केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित है तो जांच से स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन यदि जांच में वित्तीय लेन-देन, संपत्ति खरीद, आभूषण या अन्य लाभार्थियों के प्रमाण मिलते हैं, तो जांच को केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। किसी भी संस्थान में आर्थिक गड़बड़ी अक्सर कई स्तरों की स्वीकृति और निगरानी से जुड़ी होती है। इसलिए यदि बड़े अधिकारियों, ट्रस्ट के अन्य पदाधिकारियों या किसी बाहरी प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उन सभी की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं यदि जांच में उनके विरुद्ध कोई साक्ष्य नहीं मिलता, तो केवल अटकलों के आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए इस मामले में पारदर्शिता सामान्य सरकारी मामलों से भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि किसी श्रद्धालु द्वारा चढ़ाया गया धन कथित रूप से गलत हाथों में गया है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि धार्मिक विश्वास के साथ भी गंभीर विश्वासघात माना जाएगा। वहीं यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं, तो जिन लोगों ने बिना प्रमाण आरोप लगाए हैं, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आस्था और जवाबदेही साथ-साथ चलनी चाहिए। किसी व्यक्ति का त्याग, सादगी या वैचारिक योगदान उसे जांच से ऊपर नहीं बनाता, और केवल आरोप लग जाना भी उसे दोषी सिद्ध नहीं करता। अंतिम निर्णय निष्पक्ष जांच, साक्ष्यों और न्यायालय की प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए।
वर्तमान परिस्थितियों में तीन सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण हैं—पहला, किसी भी व्यक्ति को बिना जांच दोषी या निर्दोष घोषित न किया जाए; दूसरा, यदि शीर्ष नेतृत्व ने नैतिक जिम्मेदारी ली है तो प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए; और तीसरा, जांच केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित न रहकर जहां तक साक्ष्य ले जाए, वहां तक निष्पक्ष और निर्भीक रूप से पहुंचनी चाहिए। यही करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा करेगा और यही कानून के शासन की वास्तविक कसौटी भी होगी।


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