रुद्रपुर,भारत की सनातन परंपरा में दान को धर्म का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार दान देकर समाज सेवा में सहभागी बनते हैं। यदि किसी नगर में धार्मिक स्थलों, मंदिरों अथवा विधिवत स्थापित पूजा स्थलों पर पारदर्शी और विधिसम्मत दान व्यवस्था विकसित की जाए, तो उससे सामाजिक कल्याण के अनेक कार्यों को सहयोग मिल सकता है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
रुद्रपुर में त्रिशूल चौक, प्रस्तावित डमरू चौक, शिव कॉरिडोर तथा प्रभु श्रीराम को समर्पित प्रस्तावित सांस्कृतिक स्थलों को लेकर आध्यात्मिक पहचान की चर्चा हो रही है। इसी संदर्भ में यह सुझाव सामने आया है कि जहाँ नियमित धार्मिक गतिविधियाँ विधिसम्मत रूप से संचालित हों, वहाँ नगर प्रशासन संबंधित कानूनी प्रावधानों और धार्मिक संस्थाओं की सहमति से पारदर्शी दान पेटी व्यवस्था पर विचार कर सकता है।
ऐसी व्यवस्था का मूल उद्देश्य राजस्व बढ़ाना भर न होकर लोककल्याण होना चाहिए। यदि दान राशि का सार्वजनिक लेखा-जोखा रखा जाए और उसका उपयोग निर्धन परिवारों की सहायता, जरूरतमंद विद्यार्थियों की शिक्षा, अनाथ एवं बेसहारा बच्चों के पुनर्वास, दिव्यांगजनों की सहायता, सामुदायिक भोजन, स्वच्छता अभियान तथा धार्मिक स्थलों के रखरखाव में किया जाए, तो श्रद्धालुओं का विश्वास भी मजबूत होगा और दान का सामाजिक प्रभाव भी दिखाई देगा।
कुछ नागरिक यह सुझाव भी देते हैं कि जहाँ धार्मिक गतिविधियाँ नियमित रूप से संचालित हों, वहाँ योग्य पुजारी द्वारा प्रतिदिन प्रातः और सायं आरती, वैदिक मंत्रोच्चार तथा धार्मिक आयोजन किए जाएँ। इससे श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक वातावरण मिलेगा और नगर की सांस्कृतिक पहचान भी सुदृढ़ हो सकती है।
ऐसी किसी भी व्यवस्था के सफल संचालन के लिए पारदर्शिता, वैधानिक अनुमति, सभी समुदायों के प्रति सम्मान, नियमित ऑडिट और सार्वजनिक जवाबदेही अत्यंत आवश्यक होगी। धर्म और सेवा का संबंध तभी सार्थक बनता है, जब आस्था के साथ विश्वास और सुशासन भी जुड़ा हो।
दान पेटी से जनसेवा का नया मॉडल: रुद्रपुर को आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र बनाने की एक सुझावात्मक पहल
देवभूमि उत्तराखंड के प्रवेश द्वार रुद्रपुर को आध्यात्मिक पहचान देने की दिशा में त्रिशूल चौक, प्रस्तावित डमरू चौक, प्रभु श्रीराम को समर्पित प्रस्तावित स्थल तथा शिव कॉरिडोर जैसी पहलें चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इसी क्रम में एक नया सुझाव सामने आया है कि इन धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों पर, यदि संबंधित कानूनी प्रावधानों और प्रशासनिक अनुमति के अनुरूप व्यवस्था बनाई जाए, तो श्रद्धालुओं के लिए स्वैच्छिक दान पेटियां स्थापित की जा सकती हैं।
इस प्रस्ताव के समर्थकों का मानना है कि उत्तराखंड के चारधाम, नैनीताल, कुमाऊँ और गढ़वाल की यात्रा पर जाने वाले लाखों श्रद्धालुओं का स्वागत सबसे पहले रुद्रपुर में आध्यात्मिक वातावरण के साथ किया जाए। त्रिशूल चौक, डमरू चौक, शिव कॉरिडोर और प्रभु श्रीराम से जुड़े सांस्कृतिक स्थल देवभूमि की पहली झलक बन सकते हैं। दर्शन और आरती के बाद श्रद्धालु अपनी इच्छा और श्रद्धा के अनुसार दान अर्पित कर सकते हैं।
सुझाव के अनुसार यह दान किसी व्यक्ति या संस्था के निजी उपयोग के लिए न होकर पूरी तरह जनहित में खर्च किया जाए। इसके लिए नगर निगम, धर्माचार्यों, चार्टर्ड अकाउंटेंट, समाजसेवियों तथा प्रबुद्ध नागरिकों की एक स्वतंत्र समिति गठित की जा सकती है। समिति की देखरेख में निर्धारित समय पर दान पेटियां खोली जाएं, पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग हो, राशि की सार्वजनिक गणना की जाए और पूरी धनराशि सीधे नगर निगम के नाम से संचालित अधिकृत बैंक खाते, जैसे यूको बैंक या किसी अन्य अधिकृत सरकारी बैंक खाते, में जमा की जाए।
पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रत्येक माह आय-व्यय का विवरण नगर निगम की वेबसाइट, सूचना पट्ट और सार्वजनिक बैठक के माध्यम से जारी किया जा सकता है। वार्षिक ऑडिट भी कराया जाए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे और प्रत्येक रुपये का उपयोग जनकल्याण में दिखाई दे।
प्रस्ताव के अनुसार दान राशि का उपयोग निर्धन विद्यार्थियों की शिक्षा, जरूरतमंद परिवारों की सहायता, असहाय बच्चों के पुनर्वास, वृद्धजनों की सेवा, स्वच्छता अभियान, पौधारोपण, धार्मिक स्थलों के रखरखाव, पेयजल, शौचालय, विश्राम स्थल और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के विकास में किया जा सकता है।
कुछ लोगों का यह भी सुझाव है कि जहाँ धार्मिक स्वरूप विकसित किया जाए, वहाँ योग्य पुजारियों द्वारा प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल आरती, वैदिक मंत्रोच्चार तथा नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्था हो। इससे रुद्रपुर आने वाले श्रद्धालुओं को देवभूमि का आध्यात्मिक अनुभव यात्रा के प्रारंभ में ही प्राप्त हो सकता है।
प्रस्ताव के समर्थकों का मानना है कि यदि ऐसी व्यवस्था पूरी पारदर्शिता, कानूनी प्रक्रिया और जनविश्वास के साथ लागू की जाए, तो रुद्रपुर आध्यात्मिक पर्यटन का एक महत्वपूर्ण स्वागत केंद्र बन सकता है। साथ ही दान की परंपरा को समाज सेवा और नगर विकास से जोड़कर एक ऐसा मॉडल विकसित किया जा सकता है, जिससे आस्था और लोककल्याण दोनों को समान रूप से बल मिले।
