उत्तराखंड में मानसून केवल बारिश का मौसम नहीं होता, बल्कि यह प्रकृति की परीक्षा और इंसानों के व्यवहार का आईना भी बन जाता है। हर वर्ष जून के अंत से लेकर सितंबर तक होने वाली बारिश राज्य के लिए जीवनदायिनी भी है और विनाशकारी भी। पहाड़ों में यही बारिश नदियों को जीवन देती है, जंगलों को हरियाली देती है और खेतों को पानी उपलब्ध कराती है। दूसरी ओर, यही बारिश भूस्खलन, बादल फटना, सड़कें टूटना और बाढ़ जैसी घटनाओं का कारण बन जाती है।
इस वर्ष भी मानसून के शुरुआती दौर में ही उत्तराखंड के कई जिलों में भारी बारिश ने जनजीवन प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सड़कें बंद हो रही हैं, पहाड़ दरक रहे हैं और नदियां उफान पर हैं। लेकिन हर घटना को केवल प्राकृतिक आपदा कहकर जिम्मेदारी से बचना उचित नहीं होगा। उत्तराखंड में प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानव निर्मित कारण भी इन आपदाओं को गंभीर बना रहे हैं।
रुद्रपुर की कल्याणी नदी—जो बरसात में ही याद आती है
ऊधमसिंह नगर जिले के मुख्यालय रुद्रपुर की कल्याणी नदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कभी यह नदी शहर की पहचान हुआ करती थी, लेकिन आज इसका अधिकांश हिस्सा प्लास्टिक, घरेलू कचरे और अतिक्रमण से पट चुका है। वर्षभर यह नदी नाले जैसी दिखाई देती है और कई स्थानों पर इसका प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
मानसून आते ही यही नदी अचानक अपने वास्तविक स्वरूप में लौटने का प्रयास करती है। पहाड़ों और आसपास के क्षेत्रों से आने वाला पानी जब कल्याणी नदी में पहुंचता है तो नदी अपने पुराने मार्ग की तलाश करती है। लेकिन जहां-जहां नदी का रास्ता कचरे, प्लास्टिक और अतिक्रमण से बंद कर दिया गया है, वहां पानी आबादी की ओर फैलने लगता है। परिणामस्वरूप जलभराव, मकानों में पानी घुसना और लोगों का परेशान होना शुरू हो जाता है।
बचाओ अभियान बारिश के बाद ही क्यों?
हर वर्ष मानसून शुरू होते ही प्रशासन, नगर निगम और अन्य विभाग नदी की सफाई, जेसीबी मशीनें लगाने और बचाव कार्य शुरू करने में जुट जाते हैं। सवाल यह है कि यह अभियान अप्रैल और मई में क्यों नहीं चलता?
हालांकि केवल प्रशासन को दोष देना भी उचित नहीं होगा। वास्तविकता यह है कि जब तक नदी में कचरा फेंकने की प्रवृत्ति नहीं रुकेगी, तब तक कोई भी सफाई अभियान स्थायी समाधान नहीं बन सकता।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी?
रुद्रपुर की कल्याणी नदी के किनारे हजारों परिवार रहते हैं। नगर निगम घर-घर जाकर कूड़ा संग्रहण की सुविधा उपलब्ध कराता है और इसके लिए मात्र लगभग 50 रुपये प्रतिमाह सेवा शुल्क लिया जाता है।
इसके बावजूद अनेक परिवार इस मामूली राशि से बचने के लिए घरेलू कचरा, प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें, निर्माण सामग्री और अन्य अपशिष्ट सीधे नदी में डाल देते हैं।
यही प्लास्टिक बरसात के दौरान पुलों और संकरे स्थानों पर फंस जाती है। पानी का बहाव रुकता है और नदी आसपास की बस्तियों में फैलने लगती है। ऐसे में यदि केवल नगर निगम या सरकार को दोष दिया जाए तो यह पूरी तस्वीर नहीं होगी। नागरिकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
नदी नहीं, कूड़ाघर बना दिया गया
कल्याणी नदी के कई हिस्सों में आज पानी से अधिक प्लास्टिक दिखाई देती है। पॉलीथिन, पुराने कपड़े, घरेलू कचरा, फर्नीचर, मलबा और पशुओं का अपशिष्ट खुलेआम नदी में डाला जाता है।
जब बरसात होती है तो यही कचरा जलनिकासी व्यवस्था को पूरी तरह बाधित कर देता है। फिर वही लोग प्रशासन से शिकायत करते हैं कि पानी घरों में घुस गया।
नगर निगम की भूमिका
नगर निगम नियमित रूप से कूड़ा संग्रहण करता है। अधिकांश वार्डों में वाहन घर-घर पहुंचते हैं। सफाई अभियान भी समय-समय पर चलाए जाते हैं।
यदि नागरिक निर्धारित स्थान पर कचरा देने के बजाय नदी में फेंकेंगे, तो किसी भी नगर निकाय के लिए व्यवस्था बनाए रखना कठिन होगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि नगर निगम की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। जहां अतिक्रमण है, जहां अवैध डंपिंग हो रही है और जहां नालों की नियमित सफाई नहीं हो रही, वहां सख्ती और निगरानी भी आवश्यक है। लेकिन समाधान तभी संभव है जब प्रशासन और नागरिक दोनों अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
पहाड़ों की पीड़ा
यदि मैदानों में जलभराव मानव लापरवाही का परिणाम है तो पहाड़ों में स्थिति और गंभीर है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पिछले दो दशकों में सड़कों, सुरंगों, होटल, रिसॉर्ट और अन्य निर्माण कार्यों में तेजी आई है। विकास आवश्यक है, लेकिन वैज्ञानिक मानकों की अनदेखी विनाश को आमंत्रित करती है।
कई स्थानों पर पहाड़ों को आवश्यकता से अधिक काटा गया। ढलानों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई। मलबा सीधे नदियों और घाटियों में डाल दिया गया। जंगलों की कटाई हुई और प्राकृतिक जलधाराओं के मार्ग बदल दिए गए।
परिणामस्वरूप भारी वर्षा के दौरान मिट्टी अपनी पकड़ खो देती है और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
बादल फटना और बदलता मौसम
जलवायु परिवर्तन ने भी उत्तराखंड को नई चुनौतियां दी हैं।
पहले कई दिनों तक सामान्य वर्षा होती थी। अब कुछ घंटों में ही अत्यधिक वर्षा हो जाती है। छोटे-छोटे जलस्रोत अचानक उफान पर आ जाते हैं। नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है और बादल फटने जैसी घटनाएं तबाही मचा देती हैं।
इन परिस्थितियों में वैज्ञानिक योजना और मजबूत आपदा प्रबंधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
विकास और पर्यावरण का संतुलन
उत्तराखंड को सड़कें चाहिए, अस्पताल चाहिए, पर्यटन चाहिए और रोजगार भी चाहिए। लेकिन विकास का अर्थ प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर निर्माण करना नहीं हो सकता।
जहां पहाड़ कमजोर हैं वहां भूगर्भीय अध्ययन के बाद ही निर्माण होना चाहिए। सुरंग, सड़क और भवन निर्माण के दौरान निकले मलबे का वैज्ञानिक निस्तारण अनिवार्य होना चाहिए।
वनों का संरक्षण, वर्षाजल संरक्षण और प्राकृतिक जलधाराओं को सुरक्षित रखना विकास का ही हिस्सा होना चाहिए।
केवल सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार
हर आपदा के बाद सरकार पर सवाल उठाना आसान होता है। लेकिन क्या समाज स्वयं अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है?
क्या लोग नदी में कचरा डालना बंद कर रहे हैं?
क्या प्लास्टिक का उपयोग कम हो रहा है?
क्या अवैध निर्माण का विरोध स्थानीय स्तर पर होता है?
क्या लोग जलनिकासी मार्गों पर कब्जा नहीं कर रहे?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है तो केवल सरकारी व्यवस्था बदलने से भी समस्या समाप्त नहीं होगी।
क्या होना चाहिए?
मानसून से पहले सभी नदियों और नालों की वैज्ञानिक सफाई।
कल्याणी नदी में कचरा फेंकने वालों पर कठोर जुर्माना।
नदी किनारे सीसीटीवी और नियमित निगरानी।
प्लास्टिक मुक्त नदी अभियान।
स्कूलों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से जनजागरूकता।
पहाड़ों में निर्माण कार्यों के लिए वैज्ञानिक मानकों का कड़ाई से पालन।
अवैध खनन और अवैध कटान पर सख्त कार्रवाई।
आपदा संभावित क्षेत्रों की पहले से पहचान और समय पर चेतावनी प्रणाली।
निष्कर्ष
मानसून न तो केवल आपदा है और न ही केवल वरदान। यह प्रकृति का वह चक्र है जो हर वर्ष हमें हमारी गलतियों का आईना दिखाता है।
रुद्रपुर की कल्याणी नदी हमें बताती है कि यदि हम नदियों को कूड़ाघर बनाएंगे तो बरसात में वही नदी अपना रास्ता स्वयं बनाएगी। दूसरी ओर उत्तराखंड के पहाड़ चेतावनी देते हैं कि यदि विकास पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर होगा तो भूस्खलन और आपदाएं लगातार बढ़ती रहेंगी।
उत्तराखंड को सुरक्षित बनाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। प्रशासन, स्थानीय निकाय, वैज्ञानिक संस्थान, सामाजिक संगठन और सबसे बढ़कर आम नागरिक—सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी।
जिस दिन रुद्रपुर का प्रत्येक परिवार नदी में कचरा फेंकना बंद कर देगा और पहाड़ों में प्रत्येक निर्माण वैज्ञानिक मानकों के अनुसार होगा, उस दिन मानसून केवल हरियाली और खुशहाली लेकर आएगा, तबाही नहीं।
मानसून: वरदान भी, चेतावनी भी — उत्तराखंड में प्रकृति से छेड़छाड़ और रुद्रपुर की कल्याणी नदी का कड़वा सच
