अनुच्छेद 370 के बाद बदली तस्वीर: कश्मीर से उत्तराखंड तक सीख लेने का समय? राज्य आंदोलनकारियों का सवाल: कुमाऊनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषा को कब मिलेगा शिक्षा और शासन में सम्मान?

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5 अगस्त 2019 भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35(ए) के प्रावधानों को निष्प्रभावी करते हुए जम्मू-कश्मीर को पूर्ण रूप से भारतीय संविधान की मुख्यधारा से जोड़ा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बने। इस निर्णय के पक्ष और विपक्ष में व्यापक राजनीतिक बहस हुई, किंतु सात वर्षों के दौरान कई ऐसे बदलाव सामने आए हैं जिन पर गंभीरता से चर्चा होना स्वाभाविक है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा केंद्र सरकार की पूरी टीम ने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ यह ऐतिहासिक निर्णय लागू किया, उसका प्रभाव आज जम्मू-कश्मीर के अनेक क्षेत्रों में दिखाई देता है। पर्यटन, आधारभूत संरचना, निवेश, शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय एकता और अनुशासन को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाए गए कदम उल्लेखनीय हैं।
जम्मू-कश्मीर के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना सभा की शुरुआत राष्ट्रगान “जन गण मन” से करने का निर्देश इसी दिशा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। निर्धारित समय सीमा के भीतर आयोजित होने वाली प्रार्थना सभा में राष्ट्रगान के साथ-साथ महापुरुषों, स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान में निहित नागरिक कर्तव्यों पर भी विद्यार्थियों को प्रेरित किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी में राष्ट्र के प्रति सम्मान, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है।
शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित विषय नहीं है। विद्यालय वह स्थान है जहां भविष्य के नागरिक तैयार होते हैं। यदि विद्यालयों में राष्ट्रगान, संविधान, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय मूल्यों पर नियमित चर्चा हो, तो उसका सकारात्मक प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। जम्मू-कश्मीर में लागू की गई यह व्यवस्था इसी सोच को मजबूत करती है।
पर्यटन के क्षेत्र में भी जम्मू-कश्मीर ने नई पहचान बनाई है। रिकॉर्ड संख्या में देश-विदेश से पर्यटकों का पहुंचना यह संकेत देता है कि विकास, सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिरता का सीधा प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। होटल उद्योग, परिवहन, हस्तशिल्प, कृषि और छोटे व्यापारियों को इसका व्यापक लाभ मिला है। विकास का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी अध्ययन का विषय बन सकता है।
यहीं से उत्तराखंड के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। देवभूमि उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक पहचान और राष्ट्रीय चेतना के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यहां चारधाम, जागेश्वर, केदारनाथ, बदरीनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश, पूर्णागिरि और अनेक ऐतिहासिक स्थल स्थित हैं। फिर भी विद्यालयों में राष्ट्रीय मूल्यों के व्यवस्थित और एकरूप कार्यक्रम को लेकर व्यापक नीति आज भी स्पष्ट रूप में दिखाई नहीं देती।
उत्तराखंड सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या प्रदेश के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में प्रतिदिन राष्ट्रगान, संविधान की प्रस्तावना, प्रेरक विचार, स्वतंत्रता सेनानियों का परिचय और नागरिक कर्तव्यों पर संक्षिप्त चर्चा को नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाया जा सकता है। यह किसी राजनीतिक विचारधारा का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का विषय है।
यदि जम्मू-कश्मीर जैसा संवेदनशील क्षेत्र शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की दिशा में प्रभावी कदम उठा सकता है, तो उत्तराखंड जैसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रदेश के लिए यह कार्य और भी सहज होना चाहिए। यहां के विद्यार्थी देश की सेना, विज्ञान, प्रशासन, खेल और शिक्षा सहित अनेक क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देते रहे हैं। ऐसी स्थिति में विद्यालयी वातावरण को और अधिक संस्कारयुक्त तथा राष्ट्रोन्मुख बनाने की आवश्यकता महसूस होती है।
उत्तराखंड सरकार शिक्षा में अनेक सुधारों की बात करती है। आधुनिक विद्यालय, स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं पर कार्य भी जारी है। साथ ही चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय चेतना और संवैधानिक दायित्वों को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है।
प्रदेश के शिक्षा विभाग को एक व्यापक नीति बनाकर विद्यालयों में प्रतिदिन निर्धारित समय की प्रार्थना सभा, राष्ट्रगान, प्रेरक प्रसंग, पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति, संविधान के मूल कर्तव्यों और उत्तराखंड के महान व्यक्तित्वों पर नियमित संवाद की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। इससे विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने जम्मू-कश्मीर में जो परिवर्तनकारी पहल की, उससे यह संदेश स्पष्ट मिलता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीति के साथ बड़े बदलाव संभव हैं। उत्तराखंड सरकार के सामने भी अवसर है कि वह शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखने के स्थान पर उसे संस्कार, राष्ट्रभावना और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने का व्यापक अभियान शुरू करे।
आज आवश्यकता किसी तुलना की नहीं, बल्कि सकारात्मक सीख लेने की है। जम्मू-कश्मीर में लागू व्यवस्थाओं से प्रेरणा लेकर यदि उत्तराखंड शिक्षा के क्षेत्र में नई पहल करता है तो यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। राष्ट्र निर्माण की शुरुआत विद्यालयों से होती है और विद्यालयों में विकसित होने वाले संस्कार ही भविष्य के भारत की दिशा तय करते हैं।


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