मां नंदा-सुनंदा की भक्ति में डूबा कुमाऊं, नैनीताल में 23 सितंबर को निकलेगा डोला!नंदा-सुनंदा की पौराणिक मान्यता


नैनीताल/अल्मोड़ा। कुमाऊं में इन दिनों मां नंदा-सुनंदा की आराधना का वातावरण बना हुआ है। नैनीताल और अल्मोड़ा दोनों प्रमुख नंदा देवी धामों में नंदा महोत्सव के धार्मिक अनुष्ठान चल रहे हैं और श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


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नैनीताल में मां नंदा-सुनंदा का डोला 23 सितंबर को निकलेगा। आज 21 सितंबर को डीएसए मैदान में महाभंडारे का आयोजन है। 22 सितंबर को सुंदरकांड और नंदा चालीसा पाठ के साथ शाम को नैनी झील में दीपदान होगा। इसके बाद 23 सितंबर को दोपहर 12 बजे मां नंदा-सुनंदा का डोला नगर भ्रमण पर निकलेगा और नगर भ्रमण के बाद मंदिर के समीप विसर्जन किया जाएगा। �
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Shree Maa Naina Devi Temple, Nainital में इन दिनों श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है। महोत्सव को देखते हुए नैनीताल पुलिस ने भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा के लिए अतिरिक्त व्यवस्था के साथ ड्रोन निगरानी शुरू की है। �
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 अल्मोड़ा में भी चरम पर नंदा देवी महोत्सव
अल्मोड़ा में 16 से 23 सितंबर तक चल रहा नंदा देवी महोत्सव भी अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। मां नंदा-सुनंदा की कदली वृक्षों से तैयार प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। रविवार को भी मंदिर परिसर जयकारों, घंटियों और मंत्रोच्चार से गूंजता रहा। �
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Maa Nanda Devi Mandir, Almora में धार्मिक आयोजनों के साथ झोड़ा, लोकनृत्य, कवि सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चल रहे हैं। 23 सितंबर को मां नंदा देवी के डोले की भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी और विसर्जन के साथ महोत्सव का समापन होगा।
आस्था का यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊं की लोकपरंपरा, संस्कृति और मां नंदा-सुनंदा के प्रति गहरी श्रद्धा का प्रतीक है। नैनीताल और अल्मोड़ा में अब श्रद्धालुओं की नजर 23 सितंबर के उस भावुक क्षण पर है, जब मां का डोला नगर भ्रमण के बाद अपने गंतव्य की ओर विदा होगा।

मां नंदा-सुनंदा की पौराणिक मान्यता
मां नंदा देवी को उत्तराखंड की लोकदेवी और हिमालय की पुत्री के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता है। कुमाऊं की धार्मिक परंपरा में नंदा को भगवान शिव की अर्धांगिनी मां पार्वती का ही स्वरूप माना गया है। नंदा को पर्वतीय समाज की बेटी और बहन के रूप में भी देखा जाता है, इसलिए उनके मायके से ससुराल कैलाश जाने की भावनात्मक कल्पना नंदा महोत्सव की परंपराओं में दिखाई देती है।
नंदा और सुनंदा को बहनों के रूप में पूजने की परंपरा विशेष रूप से कुमाऊं में प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां नंदा का संबंध हिमालय, प्रकृति, समृद्धि और जनकल्याण से जुड़ा है। लोकविश्वास है कि मां की पूजा-अर्चना से परिवार और समाज में सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की कामना पूरी होती है।
डोली निकलने का आध्यात्मिक अर्थ
नंदा महोत्सव के अंतिम दिन मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की डोली/शोभायात्रा निकाली जाती है। इसे केवल विसर्जन की रस्म नहीं माना जाता, बल्कि भावनात्मक रूप से बेटी नंदा की विदाई से जोड़ा जाता है। भक्त मां को विदा करते समय उनसे अगले वर्ष फिर अपने मायके आने का आशीर्वाद मांगते हैं।
इसीलिए डोली यात्रा के दौरान वातावरण में एक साथ भक्ति, उल्लास और विदाई की भावुकता दिखाई देती है। भक्तों के लिए मां नंदा केवल देवी नहीं, बल्कि अपने घर की बेटी हैं।
आध्यात्मिक संदेश हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
नंदा परंपरा का सबसे गहरा संदेश प्रकृति, नारी शक्ति, परिवार और मातृभूमि के प्रति सम्मान से जुड़ा माना जाता है। हिमालय को मां का स्वरूप और नंदा को हिमालय की बेटी मानने की लोकपरंपरा उत्तराखंड की आध्यात्मिक संस्कृति को विशिष्ट बनाती है।
नैनीताल और अल्मोड़ा में नंदा-सुनंदा की डोली का नगर भ्रमण इसी जीवंत परंपरा की सबसे भावुक अभिव्यक्तियों में से एक है।