दोहरी मार : उधर पेट्रोल के रेट, इधर चीनी के दाम—सरकार महंगाई पर कब देगी जवाब?उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष रुद्रपुर संजय जुनेजा का सरकार से सीधा सवाल—महंगाई की मार से आम आदमी को राहत कब?

Spread the love


रुद्रपुर में चीनी के दामों में पिछले 15 दिनों में आया अप्रत्याशित उछाल आम आदमी की रसोई के बजट को झकझोरने वाला है। पांच अगस्त को जिस चीनी का फुटकर भाव 45 से 46 रुपये प्रति किलो था, वही 19 अगस्त को 61 से 62 रुपये किलो तक पहुंच गई। यानी महज पंद्रह दिनों में करीब 17 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी। गुड़ 50 से बढ़कर 80 रुपये किलो और मिश्री 50 से बढ़कर करीब 70 रुपये किलो हो गई। यह केवल किसी एक वस्तु की कीमत बढ़ने का मामला नहीं है, यह उस घरेलू अर्थव्यवस्था का सवाल है जहां हर दिन की चाय, बच्चों के दूध, मिठाई, नाश्ते और त्योहार की तैयारियां सीधे प्रभावित होती हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


उद्योग व्यापार मंडल रुद्रपुर के अध्यक्ष संजय जुनेजा का कहना है कि महंगाई का यह दबाव आम उपभोक्ता के साथ व्यापारियों और छोटे कारोबारियों पर भी पड़ रहा है। उनका कहना है कि सरकार को चीनी के बढ़ते दामों के पीछे वास्तविक कारणों की तत्काल जांच करानी चाहिए और जमाखोरी, कृत्रिम कमी तथा आपूर्ति व्यवस्था की खामियों पर सख्त निगरानी रखनी चाहिए।
आज आम आदमी के सामने महंगाई की दोहरी मार खड़ी है—उधर पेट्रोल के रेट, इधर चीनी के दाम। पेट्रोल महंगा होता है तो परिवहन महंगा होता है, परिवहन महंगा होता है तो सब्जी, दूध, राशन से लेकर रोजमर्रा की हर वस्तु की लागत बढ़ती है। अब चीनी जैसी मूलभूत खाद्य वस्तु की कीमत में अचानक 17 रुपये किलो तक की वृद्धि हो जाए तो इसका असर घर की रसोई से निकलकर मिठाई की दुकानों, चाय-कॉफी कारोबार, होटल, रेस्टोरेंट और खाद्य उद्योग तक पहुंचना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि चीनी के दाम इतनी तेजी से क्यों बढ़े?
कारोबारियों के अनुसार शुगर मिलों के एजेंट गन्ने की कम उपलब्धता और चीनी के सीमित स्टॉक की बात कर रहे हैं। नई फसल आने में अभी करीब तीन महीने का समय है। बाजार में आपूर्ति और मांग के बीच अंतर बढ़ने से कीमतों पर दबाव बन रहा है। कुछ कारोबारियों का यह भी तर्क है कि गन्ने का एक हिस्सा चीनी उत्पादन के स्थान पर एथेनॉल निर्माण की ओर डायवर्ट हुआ है। ऐसे में सरकार को स्थिति की पूरी तस्वीर जनता के सामने रखनी चाहिए।
गन्ने से चीनी बने या एथेनॉल, नीति का अंतिम लाभ किसान और उपभोक्ता तक पहुंचना चाहिए। एथेनॉल नीति का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोलियम आयात में कमी और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना रहा है। यह नीति अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है, मगर इसका संतुलन भी उतना ही जरूरी है। यदि गन्ने के उपयोग में बदलाव से घरेलू बाजार में चीनी की आपूर्ति प्रभावित होती है और कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो सरकार को तत्काल संतुलनकारी कदम उठाने चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी की केंद्र और राज्य सरकारें लगातार महंगाई पर नियंत्रण तथा किसानों की आय बढ़ाने की बात करती रही हैं। ऐसे में उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां बड़ी आबादी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए सीमित आय पर निर्भर है, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अचानक उछाल सरकार के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।
यहां राजनीति से ऊपर उठकर सवाल पूछा जाना चाहिए कि नीतियों का बोझ आखिर किसकी जेब पर पड़ रहा है?
सरकार की जिम्मेदारी केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। उत्पादन, भंडारण, परिवहन, थोक बाजार और फुटकर बिक्री—पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभावी निगरानी जरूरी है। यदि कहीं जमाखोरी है तो कार्रवाई होनी चाहिए। यदि उत्पादन में कमी है तो वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था करनी चाहिए। यदि एथेनॉल नीति के कारण चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई है तो आवश्यकतानुसार नीति में संतुलन बनाना चाहिए।
त्योहारी सीजन सिर पर है। आने वाले महीनों में मिठाई, बेकरी, चॉकलेट, शीतल पेय और अन्य खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ेगी। चीनी के दाम इसी तरह बढ़ते रहे तो इसका सीधा असर उत्पादों की लागत पर पड़ेगा। अभी रुद्रपुर के कई मिठाई विक्रेताओं ने उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने से परहेज किया है। मगर कारोबारियों की भी अपनी लागत है। लंबे समय तक बढ़ी हुई लागत को सहन करना उनके लिए कठिन होगा।
संजय जुनेजा का कहना है कि सरकार को इस विषय को केवल बाजार की सामान्य गतिविधि मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा। प्रशासन को थोक और फुटकर बाजार की निगरानी करनी चाहिए। चीनी के स्टॉक, आवक और बिक्री की स्थिति का परीक्षण होना चाहिए। उपभोक्ताओं को यह भरोसा मिलना चाहिए कि कीमतों में अचानक हुई वृद्धि के पीछे कोई कृत्रिम खेल तो नहीं है।
भाजपा सरकारों की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आम जनता रोजमर्रा की जिंदगी में इनके परिणाम महसूस करती है। सरकार जब पेट्रोलियम, ऊर्जा, कृषि और उद्योग से जुड़ी नीतियां बनाती है तो उसके प्रभाव का आकलन रसोई के स्तर पर भी होना चाहिए। आर्थिक विकास के बड़े आंकड़े अपनी जगह हैं, मगर परिवार के मासिक बजट में यदि दूध, तेल, दाल, सब्जी, पेट्रोल और अब चीनी का खर्च लगातार बढ़ रहा है तो सरकार को जनता की परेशानी सुननी होगी।
उत्तराखंड की जनता ने हमेशा सरकारों से विकास के साथ राहत की भी उम्मीद की है। राज्य में पर्यटन, रोजगार, उद्योग और निवेश की चर्चा के साथ महंगाई का मुद्दा भी उतनी ही गंभीरता से उठना चाहिए। छोटे दुकानदार, मिठाई कारोबारी, होटल व्यवसायी और मध्यम वर्गीय परिवार सभी इस दबाव को महसूस कर रहे हैं।
सरकार को तत्काल तीन स्तरों पर कार्रवाई करनी चाहिए—पहला, चीनी की उपलब्धता और स्टॉक की जांच; दूसरा, जमाखोरी एवं कृत्रिम मूल्यवृद्धि पर प्रभावी कार्रवाई; तीसरा, एथेनॉल और चीनी उत्पादन के बीच संतुलित नीति।
किसान को गन्ने का उचित मूल्य मिले, मिलों को उत्पादन के लिए पर्याप्त कच्चा माल मिले और उपभोक्ता को उचित कीमत पर चीनी मिले—यही संतुलित व्यवस्था की पहचान होगी।
महंगाई को केवल विपक्ष का राजनीतिक मुद्दा समझकर खारिज करना जनता की पीड़ा को नजरअंदाज करना होगा। आज सवाल किसी पार्टी का नहीं, रसोई का है। सवाल किसी राजनीतिक भाषण का नहीं, परिवार के मासिक बजट का है।
उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष संजय जुनेजा की ओर से सरकार से स्पष्ट मांग है कि रुद्रपुर समेत पूरे उत्तराखंड में चीनी के दामों में हुई अचानक वृद्धि की समीक्षा कराई जाए और आम उपभोक्ता को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
उधर पेट्रोल के रेट बढ़ते हैं, इधर चीनी के दाम। बीच में पिसता है आम आदमी। अब सरकार को आंकड़ों से आगे बढ़कर रसोई की आवाज सुननी होगी।
महंगाई पर राजनीति बाद में हो सकती है, मगर राहत आज चाहिए। सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए, ताकि त्योहारों के मौसम में मिठास आम आदमी की पहुंच से बाहर न हो जाए।


Spread the love