रुद्रपुर। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है। चुनावी वर्ष से पहले मतदाता सूची की शुचिता का यह अभियान अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के केंद्र में आ गया है। खासकर ऊधम सिंह नगर के किच्छा क्षेत्र से सामने आ रहे मामलों ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
किच्छा में SIR के दौरान आपत्तियां दर्ज कराने को लेकर ऐसा मामला सामने आया है, जिसने निर्वाचन प्रक्रिया की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, एक भाजपा नेता और BLA-02 के नाम से कुल 192 आपत्तियां दर्ज की गईं, जिनमें 147 आपत्तियां पूर्व भाजपा मंडल महामंत्री के नाम से बताई गई हैं। आपत्ति फॉर्म में दर्ज मोबाइल नंबरों को लेकर भी संदेह जताया गया है।
सवाल यह है कि यदि एक ही व्यक्ति के नाम से इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज हो सकती हैं, तो निर्वाचन तंत्र इन आपत्तियों के स्रोत, मोबाइल नंबर, डिजिटल रिकॉर्ड और आपत्ति दर्ज करने वाले व्यक्ति की पहचान की जांच किस स्तर पर करता है? अगर जांच में आपत्तियां फर्जी पाई जाती हैं तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
19 लाख से अधिक मतदाताओं के रिकॉर्ड में त्रुटियां
उत्तराखंड में SIR का पहला चरण पूरा होने के बाद 14 जुलाई को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार राज्य में करीब 71.33 लाख मतदाता ड्राफ्ट रोल में शामिल थे और लगभग 19 लाख मतदाताओं के फॉर्म में किसी न किसी प्रकार की त्रुटि सामने आने के बाद नोटिस की प्रक्रिया शुरू हुई। दावे और आपत्तियों के निस्तारण की प्रक्रिया सितंबर तक चलनी है।
यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि SIR कितना व्यापक अभियान है। इतने बड़े पैमाने पर नाम, उम्र, पता, मैपिंग और पुराने रिकॉर्ड से जुड़ी विसंगतियां सामने आने के बाद प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
किच्छा में धरने से लेकर गदरपुर तक उठे सवाल
SIR को लेकर किच्छा में कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ ने आपत्तियों के निस्तारण और प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए धरना दिया। गदरपुर में भी कांग्रेस नेताओं ने SIR के तहत दर्ज आपत्तियों के निष्पक्ष और नियमानुसार निस्तारण की मांग को लेकर तहसील परिसर में प्रदर्शन किया।
कांग्रेस का आरोप है कि कुछ मतदाताओं के खिलाफ बड़ी संख्या में आपत्तियां एक सुनियोजित तरीके से लगाई जा रही हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है, मगर इतने गंभीर आरोपों के बीच निर्वाचन प्रशासन के लिए सबसे जरूरी जिम्मेदारी यही है कि प्रत्येक आपत्ति की प्रक्रिया पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित हो।
असली सवाल सिर्फ नाम कटने का नहीं, प्रक्रिया की विश्वसनीयता का है
SIR का मूल उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करना है। मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित अथवा दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है। आधिकारिक प्रक्रियाओं में भी ASDD यानी Absent, Shifted, Dead और Duplicate मतदाताओं की पहचान तथा दावे-आपत्तियों की व्यवस्था शामिल है।
मगर लोकतंत्र में मतदाता सूची की सफाई जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि एक भी वास्तविक मतदाता गलत प्रक्रिया के कारण अपने मतदान अधिकार से वंचित न हो।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—यदि किसी मतदाता के नाम पर एक मामूली त्रुटि के कारण नोटिस जाता है, तो उसी कठोरता से उन मामलों की जांच भी होनी चाहिए जहां एक व्यक्ति के नाम से असामान्य संख्या में आपत्तियां दर्ज हुई हैं या किसी मतदाता की प्रविष्टि दो स्थानों पर होने की आशंका है।
दोहरी प्रविष्टियां भी बनें जांच का केंद्र
उत्तराखंड जैसे राज्य में बड़ी संख्या में लोग रोजगार और शिक्षा के कारण दूसरे राज्यों में रहते हैं। ऐसे मामलों में मतदाता सूची में पुराने और वर्तमान पते से जुड़ी प्रविष्टियों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। एक व्यक्ति का एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता के रूप में पंजीकरण कानून और निर्वाचन व्यवस्था के लिहाज से गंभीर विषय है।
इसलिए SIR की पारदर्शिता का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए। गरीब, मजदूर, प्रवासी, बंगाली, पहाड़ी, मुस्लिम, व्यापारी, कर्मचारी या किसी राजनीतिक दल से जुड़े व्यक्ति—हर मतदाता के मामले में एक ही नियम लागू होना चाहिए।
निर्वाचन आयोग के सामने पांच बड़े सवाल
SIR को लेकर पैदा हो रहे विवाद के बीच निर्वाचन तंत्र से पांच सवालों का स्पष्ट जवाब जनता के सामने आना चाहिए—
एक व्यक्ति के नाम से असामान्य संख्या में दर्ज आपत्तियों की स्वतः जांच की व्यवस्था क्या है?
संदिग्ध मोबाइल नंबर अथवा डिजिटल पहचान वाले आपत्ति फॉर्मों की जांच कैसे होती है?
दोहरी मतदाता प्रविष्टियों की पहचान होने पर दोनों स्थानों के रिकॉर्ड का मिलान किस स्तर पर किया जाता है?
गलत या फर्जी आपत्ति साबित होने पर आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?
जिन वास्तविक मतदाताओं को नोटिस मिला है, उनके नाम सुरक्षित रखने और त्रुटियां सुधारने की अंतिम जिम्मेदारी किस अधिकारी की होगी?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने से राजनीतिक आरोपों की जगह तथ्य सामने आएंगे।
2027 से पहले मतदाता सूची की परीक्षा
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक पृष्ठभूमि में SIR का महत्व और बढ़ जाता है। मतदाता सूची में एक-एक नाम आने वाले चुनाव में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इस पूरी प्रक्रिया को किसी दल के पक्ष या विपक्ष में देखने के बजाय मतदाता के अधिकार की कसौटी पर देखना होगा।
SIR की सफलता तब मानी जाएगी जब मृत और दोहरी प्रविष्टियां हटें, वास्तविक मतदाता सुरक्षित रहें, गलतियां सुधरें और फर्जी आपत्तियों पर कार्रवाई हो। प्रशासन को यह भरोसा पैदा करना होगा कि नाम काटने से पहले प्रमाण की जांच होगी और नाम बचाने के लिए भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाएगी।
किच्छा में एक नाम से बड़ी संख्या में आपत्तियों का मामला इसी व्यापक सवाल की ओर इशारा करता है—मतदाता सूची की सफाई जरूरी है, मगर सफाई की प्रक्रिया खुद कितनी साफ है?
यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर आम मतदाता के दरवाजे तक पहुंच चुका है।
