पीएम आवास की पक्की छत के दावे पर बड़ा सवाल: रुद्रपुर में किसके सिर पहुंचा सरकारी आशियाना?

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पीएम आवास की पक्की छत के दावे पर बड़ा सवाल: रुद्रपुर में किसके सिर पहुंचा सरकारी आशियाना?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | विशेष रिपोर्ट
उत्तराखंड सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के तहत दिसंबर तक 15 हजार से अधिक परिवारों को पक्की छत देने का दावा कर रही है। सरकार के अनुसार प्रदेश में 18 परियोजनाओं के तहत 15,496 आवासीय इकाइयों का निर्माण किया जा रहा है, जिनमें करीब 84 प्रतिशत आवास पूरे हो चुके हैं और 1,271 लाभार्थियों को चाबियां भी सौंपी जा चुकी हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार इसे गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सपने को पूरा करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि बता रही है।
सरकार के आंकड़े अपनी जगह हैं, लेकिन रुद्रपुर और ऊधमसिंह नगर से उठ रहे सवाल इस पूरी तस्वीर का दूसरा पहलू सामने रखते हैं। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री आवास योजना का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है? क्या पात्रता की कसौटी पर स्थानीय गरीब परिवारों की प्राथमिकता सुनिश्चित हुई? क्या दशकों से रुद्रपुर और आसपास रह रहे परिवारों की शिकायतों का निष्पक्ष समाधान हुआ? और सबसे बड़ा सवाल—क्या लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक कर उसकी स्वतंत्र जांच कराई जा सकती है?
रुद्रपुर के धर्मपुर-फौजी मटकोटा क्षेत्र में पीएम आवास के आवंटन को लेकर अप्रैल 2025 में स्थानीय लोगों ने अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। इस मामले में शिकायत विधायक शिव अरोरा तक पहुंची थी। इसके बाद आवंटन की जांच की मांग उठी।
मामला इतना गंभीर था कि मटकोटा में 29 आवासों के आवंटन में कथित अनियमितताओं की शिकायत पर जिलाधिकारी ने अपर जिलाधिकारी के नेतृत्व में जांच समिति गठित की थी। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि कुछ आवंटियों की पात्रता और उनके बाहरी होने को लेकर सवाल उठाए गए थे। जिलाधिकारी की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि किसी अपात्र व्यक्ति को आवास आवंटित नहीं होना चाहिए।
यहीं से सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।
अगर एक तरफ सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना को गरीबों के सम्मान और सुरक्षा की योजना बता रही है, तो दूसरी तरफ आवंटन को लेकर स्थानीय स्तर पर शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? यदि जांच की जरूरत पड़ी, तो जांच का परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? कितने आवंटन पात्र पाए गए और कितने मामलों में आपत्तियां सही साबित हुईं—इसका पूरा विवरण जनता के सामने क्यों नहीं रखा जाता?
40-50 साल से रह रहे परिवारों का सवाल
रुद्रपुर में ऐसे परिवार बड़ी संख्या में हैं जो कई दशकों से यहां रह रहे हैं। कुछ परिवारों का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा रुद्रपुर में गुजार दिया, फिर भी उन्हें प्रधानमंत्री आवास का लाभ नहीं मिला। ऐसे परिवार पूछ रहे हैं कि यदि वे वर्षों से इसी शहर में रहते हैं, आर्थिक रूप से कमजोर हैं और योजना की पात्रता पूरी करते हैं, तो उनके नाम लाभार्थी सूची में क्यों नहीं आए?
यह सवाल किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ खड़ा करने का विषय नहीं है। प्रधानमंत्री आवास योजना का मूल आधार पात्रता, पारदर्शिता और जरूरत होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति पात्र है तो उसे लाभ मिलना चाहिए, चाहे वह किसी भी समुदाय या क्षेत्र से आता हो। उसी तरह यदि कोई अपात्र है तो उसके स्थान पर किसी स्थानीय पात्र गरीब का हक प्रभावित नहीं होना चाहिए।
इसलिए असली बहस “कौन किस प्रदेश से आया” से ज्यादा “कौन पात्र था और किस आधार पर उसका चयन हुआ” पर होनी चाहिए।
60 प्रतिशत बाहरी लोगों का दावा—क्या है सरकारी रिकॉर्ड?
रुद्रपुर में यह आरोप भी राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में उठता रहा है कि पीएम आवासों में बड़ी संख्या में बाहरी लोगों को जगह मिली है। कुछ लोगों की ओर से 60 प्रतिशत से अधिक लाभार्थियों के बाहरी होने जैसे दावे भी किए जाते हैं।
लेकिन यहां सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
यदि यह दावा गलत है तो सरकार को लाभार्थियों की पूरी सूची, स्थायी निवास/पात्रता संबंधी मानकों और चयन प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर भ्रम दूर करना चाहिए। यदि शिकायतों में दम है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
सवाल आंकड़े का है और जवाब भी आंकड़ों से ही आना चाहिए।
किस वार्ड से कितने लाभार्थी?
कितने परिवार उत्तराखंड के स्थायी निवासी हैं?
कितने परिवार वर्षों से रुद्रपुर में निवास कर रहे हैं?
कितने लाभार्थियों के पास पहले से पक्का मकान था?
कितने आवेदनों को खारिज किया गया?
कितने आवंटनों पर शिकायत आई?
कितनी शिकायतों की जांच हुई?
और कितने मामलों में आवंटन रद्द किया गया?
इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होने से ही सरकार की पारदर्शिता पर भरोसा मजबूत होगा।
राजनीतिक रिश्तों और भाई-भतीजावाद का आरोप भी जांच के घेरे में
सबसे गंभीर आरोप उन चर्चाओं को लेकर हैं जिनमें राजनीतिक प्रभाव, रिश्तेदारी और आर्थिक ताकत के आधार पर आवास आवंटित किए जाने की बातें कही जाती हैं। ऐसे आरोपों को प्रमाण के बिना तथ्य मानना उचित नहीं होगा, मगर इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराना सरकार की जिम्मेदारी अवश्य बनती है।
यदि किसी राजनीतिक दल के नेता, पदाधिकारी, उनके रिश्तेदार या प्रभावशाली लोग लाभार्थी सूची में हैं तो सरकार को यह बताना चाहिए कि उनका चयन किस पात्रता के आधार पर हुआ। यदि वे पात्र हैं तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन यदि पात्रता से समझौता हुआ है तो राजनीतिक पहचान किसी के लिए सुरक्षा कवच नहीं बननी चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां धामी सरकार की “पारदर्शी और ईमानदार व्यवस्था” की वास्तविक परीक्षा होती है।
विधायक ने खुद उठाए थे सवाल
रुद्रपुर के विधायक शिव अरोरा का नाम भी इस विवाद में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थानीय शिकायतों के बाद उन्होंने अधिकारियों से मामले की जांच कराने को कहा था। उपलब्ध रिपोर्टों में ग्रामीणों द्वारा विधायक को ज्ञापन दिए जाने और आवास आवंटन की जांच की मांग का उल्लेख है।
जब सत्ता पक्ष का स्थानीय जनप्रतिनिधि ही किसी योजना के आवंटन पर जांच की जरूरत महसूस करता है, तो सरकार को इसे विपक्षी राजनीति कहकर टालने के बजाय मामले को पूरी तरह सार्वजनिक जांच के दायरे में लाना चाहिए।
1,872 आवास तैयार, मगर असली सवाल आवंटन का
रुद्रपुर में 1,872 प्रधानमंत्री आवासों की परियोजना पूरी होने और जल्द लाभार्थियों को आवंटित किए जाने की जानकारी सामने आ चुकी है। जून 2026 में अधिकारियों ने परियोजना का निरीक्षण कर आवासों के शीघ्र आवंटन की तैयारियों के निर्देश भी दिए थे।
यानी अब असली परीक्षा निर्माण की नहीं, आवंटन की है।
ईंट, सीमेंट और छत बनाना सरकार की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन सही पात्र परिवार तक चाबी पहुंचाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।
यदि रुद्रपुर के 1,872 परिवारों को आवास मिलने जा रहा है तो लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक क्यों न की जाए? आपत्ति दर्ज कराने के लिए समय क्यों न दिया जाए? स्वतंत्र सत्यापन क्यों न कराया जाए? और प्रत्येक लाभार्थी की पात्रता का आधार सार्वजनिक क्यों न हो?
मुख्यमंत्री की ₹75 हजार हिस्सेदारी की घोषणा पर भी सवाल
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य सरकार की हिस्सेदारी ₹50 हजार से बढ़ाकर ₹75 हजार करने की बात कही है। यह गरीब परिवारों के लिए राहत का कदम है। मगर जैसे-जैसे सरकारी हिस्सेदारी बढ़ेगी, वैसे-वैसे पारदर्शिता की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी।
जनता यह जानना चाहेगी कि अतिरिक्त धन किस मद में जाएगा, किस परिवार को कितना लाभ मिलेगा और निर्माण तथा आवंटन की निगरानी कौन करेगा।
प्रधानमंत्री आवास योजना केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त जिम्मेदारी वाली महत्वपूर्ण योजना है। केंद्र के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उत्तराखंड के लिए पीएमएवाई-यू से संबंधित स्वीकृतियां और केंद्रीय सहायता दर्ज हैं।
इसलिए यह केवल उत्तराखंड सरकार का राजनीतिक प्रचार विषय नहीं होना चाहिए। यह सार्वजनिक धन और गरीब परिवारों के अधिकार से जुड़ा मामला है।
सरकार के सामने पांच सीधे सवाल
पहला— रुद्रपुर में पीएम आवास के सभी लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक कब होगी?
दूसरा— मटकोटा के 29 कथित विवादित आवंटनों की जांच का अंतिम परिणाम क्या रहा?
तीसरा— क्या किसी अपात्र व्यक्ति का आवंटन निरस्त हुआ? यदि हुआ तो कितने?
चौथा— दशकों से रुद्रपुर में रह रहे पात्र गरीब परिवारों को आवास देने के लिए कोई विशेष सत्यापन या पुनरीक्षण किया जाएगा?
पांचवां— क्या सरकार किसी स्वतंत्र एजेंसी से पूरे रुद्रपुर पीएम आवास आवंटन का सामाजिक और वित्तीय ऑडिट कराने को तैयार है?
इन सवालों के जवाब सामने आ गए तो विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है।
गरीब की छत राजनीति का विषय नहीं, अधिकार का विषय है
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य किसी पार्टी, जाति, धर्म या क्षेत्र को लाभ देना नहीं, बल्कि पात्र परिवार को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना है। इसलिए इस योजना को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर पारदर्शिता की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
रुद्रपुर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में आवास केवल चार दीवारों का सवाल नहीं है। यह जमीन, पहचान, रोजगार, सामाजिक संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा विषय है।
सरकार यदि दिसंबर तक 15 हजार से अधिक परिवारों को पक्की छत देने जा रही है तो यह स्वागत योग्य उपलब्धि होगी। मगर उसके साथ एक और घोषणा की जरूरत है—
“हर आवास पात्र को, हर पात्र का सत्यापन के बाद और हर आवंटन जनता की निगरानी में।”
तभी मुख्यमंत्री की गरीबों को सम्मानजनक आवास देने की घोषणा जमीन पर वास्तविक न्याय में बदल पाएगी।
रुद्रपुर के लोगों को मकान से ज्यादा अब भरोसे की चाबी चाहिए। और इस चाबी का ताला सिर्फ पारदर्शी जांच, सार्वजनिक लाभार्थी सूची और निष्पक्ष आवंटन से ही खुलेगा।


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