संपादकीय
— अवतार सिंह बिष्ट
संपादक, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक त्रासदी ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को झकझोर दिया है। सैकड़ों लोगों की मौत, हजारों लोगों के लापता होने और बाढ़-भूस्खलन से तबाही की तस्वीरें केवल नेपाल की त्रासदी की कहानी नहीं कहतीं, ये पूरे हिमालय के भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी हैं। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हम हिमालय के साथ किस प्रकार का विकास कर रहे हैं और उसकी कीमत कौन चुका रहा है?
हिमालय केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है। यह करोड़ों लोगों के जीवन, नदियों, जंगलों, जैव विविधता और जल सुरक्षा का आधार है। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए तो जल, जंगल और जमीन जीवन की मूल अवधारणा हैं। दुर्भाग्य से विकास की दौड़ में यही मूल अवधारणाएं हाशिये पर जाती दिखाई दे रही हैं।
उत्तराखंड में सड़कें चाहिए, अस्पताल चाहिए, स्कूल चाहिए, रोजगार चाहिए, आधुनिक सुविधाएं चाहिए। पहाड़ के लोगों ने कभी विकास का विरोध नहीं किया। सवाल विकास की दिशा, उसकी प्राथमिकता और उसके लाभार्थियों का है।
आज पहाड़ का आम नागरिक पूछ रहा है—यह विकास किसके लिए है?
क्या पहाड़ के गांवों से पलायन रोकने के लिए यह विकास हो रहा है? क्या बंद पड़े स्कूलों को जीवंत करने के लिए यह विकास हो रहा है? क्या पहाड़ के युवाओं को रोजगार देने के लिए यह विकास हो रहा है? क्या गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत करने के लिए यह विकास हो रहा है? क्या किसानों और स्थानीय उत्पादों को बाजार देने के लिए यह विकास हो रहा है?
या फिर पहाड़ को पर्यटकों के लिए आसान बनाने, बड़े कारोबारी निवेश के लिए जमीन उपलब्ध कराने और बाहरी लोगों के लिए नए अवसर पैदा करने की दिशा में विकास को मोड़ा जा रहा है?
उत्तराखंड के मूल निवासी के मन में यह सवाल लगातार गहरा रहा है कि जिस जमीन, जंगल और पानी ने पीढ़ियों से पहाड़ को जीवित रखा, उस पर निर्णय लेने का अधिकार आखिर किसके हित में इस्तेमाल हो रहा है?
सड़क चाहिए, पहाड़ का विनाश नहीं
चारधाम यात्रा हो या सीमावर्ती क्षेत्रों की कनेक्टिविटी, सड़क और आधारभूत ढांचा जरूरी है। मगर पहाड़ को मैदान की तरह काटकर विकास करने की सोच हिमालय की प्रकृति से मेल नहीं खाती। चौड़ी सड़कों के लिए पहाड़ों की कटाई, सुरंगों का लगातार निर्माण, विस्फोटों से चट्टानों को तोड़ना और बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां हिमालय की प्राकृतिक स्थिरता पर सवाल खड़े करती हैं।
नेपाल की त्रासदी हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि प्राकृतिक आपदाओं का संबंध केवल बारिश और जलवायु परिवर्तन से जोड़कर हम अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं क्या?
जब पहाड़ की प्राकृतिक जलधाराएं प्रभावित होती हैं, जंगलों का क्षेत्र घटता है, ढलानों पर भारी निर्माण होता है और नदियों के प्रवाह क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां बढ़ती हैं, तब आपदा का खतरा भी बढ़ता है।
उत्तराखंड को ऐसी विकास नीति चाहिए जो पहाड़ की भौगोलिक वास्तविकता को समझे।
जल, जंगल, जमीन कहां गए?
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना में जल, जंगल और जमीन का प्रश्न प्रमुख था। राज्य आंदोलनकारियों ने एक ऐसे उत्तराखंड का सपना देखा था जहां स्थानीय लोगों को सम्मान, रोजगार और संसाधनों पर अधिकार मिले।
आज स्थायी राजधानी का सवाल राजनीतिक घोषणाओं में उलझा हुआ दिखाई देता है। पहाड़ों की शिक्षा व्यवस्था गंभीर चुनौतियों से गुजर रही है। गांवों से पलायन जारी है। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में शिकायतें बनी हुई हैं। युवाओं के रोजगार का सवाल जस का तस खड़ा है।
ऐसे में विशाल परियोजनाओं, पर्यटन कॉरिडोर, हाईवे और बड़े निर्माण कार्यों को ही विकास का पर्याय बना देना उत्तराखंड की मूल अवधारणा के साथ न्याय करता है क्या?
सरकारों को यह जवाब जनता के सामने रखना चाहिए।
पहाड़ किसके लिए सजाया जा रहा है?
आज देहरादून से लेकर पहाड़ के दूरस्थ इलाकों तक जमीन की कीमतों में बदलाव, बड़े होटलों और रिसॉर्ट्स का विस्तार तथा पर्यटन आधारित निर्माण तेजी से बढ़ रहा है। इससे रोजगार के कुछ अवसर पैदा होते हैं, राजस्व आता है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। मगर इसके साथ स्थानीय समाज के हितों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
पहाड़ का विकास ऐसा हो जिसमें स्थानीय युवा मालिक बने, केवल मजदूर नहीं।
स्थानीय किसान अपनी जमीन बचा सके। स्थानीय उद्यमी पर्यटन का लाभ उठा सके। गांवों में होमस्टे और स्थानीय उत्पादों को बाजार मिले। पहाड़ी महिलाओं के श्रम को आर्थिक पहचान मिले। युवाओं को अपने गांव में सम्मानजनक रोजगार मिले।
अगर पर्यटन बढ़ता जाए और स्थानीय युवा रोजगार के लिए मैदानों और महानगरों की ओर जाते रहें तो हमें अपने विकास मॉडल की समीक्षा करनी ही होगी।
यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि क्या उत्तराखंड का विकास उत्तराखंड के लोगों के लिए हो रहा है या मुख्य रूप से पर्यटकों और बाहर से आने वाले निवेशकों की सुविधा के लिए?
जनता की चिंता किसी प्रदेश, शहर या समुदाय विशेष के लोगों के खिलाफ नहीं है। सवाल हर उस नीति से है जिसमें स्थानीय हित पीछे छूटते दिखाई दें। चाहे निवेशक दिल्ली से आए, हरियाणा से, गुजरात से या देश के किसी अन्य हिस्से से—उत्तराखंड में उसका स्वागत हो सकता है, मगर उत्तराखंड के संसाधनों पर पहला नैतिक दावा यहां के स्थानीय समाज के हितों का होना चाहिए।
हिमालय को रियल एस्टेट मत समझिए
हिमालय कोई रियल एस्टेट प्रोजेक्ट नहीं है। यहां की जमीन को केवल प्लॉट, होटल, रिसॉर्ट और कॉरिडोर के नजरिए से देखने की सोच भविष्य के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है।
सरकार को विकास परियोजनाओं के साथ कैरिंग कैपेसिटी का वैज्ञानिक अध्ययन अनिवार्य करना चाहिए। कितने पर्यटक किसी क्षेत्र में सुरक्षित रूप से पहुंच सकते हैं? कितने वाहन वहां की सड़कों पर चल सकते हैं? कितना निर्माण पहाड़ सह सकता है? कितने होटल और रिसॉर्ट स्थानीय जल स्रोतों पर दबाव डाले बिना चल सकते हैं?
इन सवालों के जवाब के बिना विकास की रफ्तार बढ़ाना हिमालय के साथ जोखिम का खेल हो सकता है।
आपदा प्रबंधन से आगे बढ़ना होगा
हर आपदा के बाद राहत-बचाव, मुआवजा और समीक्षा बैठकों का दौर शुरू होता है। अब समय आपदा के बाद की व्यवस्था से आगे जाकर आपदा से पहले की तैयारी पर ध्यान देने का है।
ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी, भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का मानचित्रण, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र की सुरक्षा, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, स्थानीय आपदा स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और संवेदनशील निर्माण क्षेत्रों की नियमित निगरानी जरूरी है।
साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन करने वाली किसी परियोजना को राजनीतिक या आर्थिक प्रभाव के आधार पर संरक्षण की गुंजाइश न मिले।
उत्तराखंड को अपना विकास मॉडल खुद तय करना होगा
उत्तराखंड को ऐसा विकास चाहिए जिसमें सड़क भी हो और पहाड़ भी बचे। बिजली भी हो और नदियां भी सुरक्षित रहें। पर्यटन भी बढ़े और गांव भी आबाद रहें। उद्योग आएं और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले। निवेश हो और जमीन-जंगल-पानी पर स्थानीय समाज के हित सुरक्षित रहें।
नेपाल की त्रासदी हिमालय के लिए एक चेतावनी है। इसे केवल एक पड़ोसी देश की प्राकृतिक आपदा मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर भूल होगी।
उत्तराखंड के नीति-निर्माताओं को अब तय करना होगा कि राज्य की प्राथमिकता क्या है—बड़े प्रोजेक्ट या मजबूत गांव? पर्यटक सुविधा या स्थानीय जीवन? जमीन की बढ़ती कीमत या खेती की सुरक्षा? चमकते कॉरिडोर या पलायन से खाली होते गांव?
उत्तराखंड के लोगों को विकास चाहिए, मगर ऐसा विकास चाहिए जो पहाड़ को बचाए, पहाड़ के लोगों को बचाए और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल, जंगल और जमीन सुरक्षित रखे।
पहाड़ की जनता का सवाल सीधा है—
“हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें हमारा भविष्य सुरक्षित हो। हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें हमारी जमीन सुरक्षित हो। हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें हमारे बच्चे अपने गांव में रहकर अपना भविष्य बना सकें। आखिर पहाड़ में हो रहा यह विकास किसके लिए है?”
नेपाल की त्रासदी का सबसे बड़ा सबक यही है—
प्रकृति की चेतावनी को अनसुना करके बनाई गई विकास की इमारत कितनी भी ऊंची हो, उसकी नींव कमजोर हो सकती है।
