रुद्रपुर (उधम सिंह नगर): उत्तराखंड का प्रवेश द्वार और प्रमुख औद्योगिक गढ़ कहा जाने वाला उधम सिंह नगर जिला इन दिनों एक बेहद संवेदनशील और डरावनी कानून-व्यवस्था की चुनौती से जूझ रहा है। जिले में लगातार मिल रहे अज्ञात शवों ने स्थानीय पुलिस की रात्रि गश्त, खुफिया तंत्र और अंतराज्यीय सीमाओं की सुरक्षा पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जिले भर में साल भर के भीतर कुल 65 अज्ञात शव बरामद किए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस इनमें से महज 21 शवों की ही पहचान (शिनाख्त) कर पाई, जबकि 44 शवों को अंततः ‘लावारिस’ घोषित करना पड़ा।
डंपिंग ग्राउंड’ बनती सीमाएं: आखिर क्यों मिल रहीं इतनी लाशें?
सूत्रों और पुलिस जांच के विश्लेषण से पता चलता है कि उधम सिंह नगर की भौगोलिक स्थिति अपराधियों के लिए सबसे मुफीद साबित हो रही है। जिले की एक लंबी और खुली सीमा उत्तर प्रदेश के रामपुर, मुरादाबाद, पीलीभीत और बिजनौर जिलों से सटीक ढंग से जुड़ी हुई है।
अपराधी पड़ोसी राज्य यूपी में हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देते हैं और फिर शव को किसी वाहन या ट्रक में डालकर उत्तराखंड की सीमा (विशेषकर काशीपुर और रुद्रपुर) के सुनसान इलाकों, राष्ट्रीय राजमार्गों या नदियों के किनारे फेंक कर रफूचक्कर हो जाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि उत्तराखंड पुलिस को मृतक की पहचान करने में महीनों लग जाएं और तब तक हत्या के सारे सबूत मिट चुके हों। इसके अलावा सिडकुल (SIDCUL) में रहने वाली बड़ी प्रवासी आबादी, सड़क हादसे और नदियों में बहकर आने वाले शव भी इस आंकड़े को बढ़ा रहे हैं।
पोस्टमार्टम से खुलता है राज, पर शिनाख्त पर अटकती है सुई
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, बरामद किए गए अधिकांश शवों का जब पोस्टमार्टम कराया जाता है, तो मौत की असली वजह (जैसे गला घोंटना, जहर देना, गोली मारना या सड़क दुर्घटना) साफ हो जाती है। लेकिन असली पेच मृतक की पहचान पर आकर फंसता है। स्थानीय स्तर पर कोई रिकॉर्ड न होने और बाहरी राज्यों से शव लाए जाने के कारण स्थानीय पुलिस असहाय नजर आती है।
72 घंटे की मजबूरी और लावारिसों का अंतिम संस्कार
नियमानुसार, पुलिस अज्ञात शव मिलने के बाद उसे शिनाख्त के लिए अधिकतम 72 घंटे (3 दिन) तक मोर्चरी (शवगृह) में रखती है। इस दौरान सोशल मीडिया, अखबारों और पड़ोसी जिलों के थानों में मृतक का हुलिया और तस्वीरें भेजी जाती हैं।
हालांकि, जिला अस्पताल की मोर्चरी में आधुनिक डीप-फ्रीजर्स और संसाधनों की भारी कमी के कारण शवों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना नामुमकिन होता है। गर्मी के मौसम में 48 घंटे के भीतर ही शव सड़ने लगते हैं। नतीजतन, कोई दावेदार न आने पर पुलिस को कानूनी कागजी कार्रवाई पूरी कर लाश को ‘लावारिस’ घोषित करना पड़ता है। इसके बाद स्थानीय नगर पालिका या सामाजिक संस्थाओं की मदद से लावारिस मानकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। हालांकि, भविष्य में किसी कानूनी दावे के लिए मृतक के डीएनए (DNA) सैंपल और कपड़े सुरक्षित रख लिए जाते हैं।
सुरक्षा व्यवस्था पर उठते तीखे सवाल:
इस डरावने ट्रेंड ने स्थानीय जनता और सुरक्षा विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है:
- कहाँ है बॉर्डर चेकिंग? यूपी-उत्तराखंड बॉर्डर पर लगे सीसीटीवी कैमरे और पुलिस पिकेट्स क्या सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं? अपराधी शव लेकर राज्य में कैसे घुस रहे हैं?
- रात्रि गश्त फेल? राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) और अंदरूनी सुनसान रास्तों पर पुलिस की मोबाइल वैन और चेकिंग का क्या असर है?
- इंटेलिजेंस नेटवर्क सुस्त? स्थानीय खुफिया एजेंसियां संदिग्ध गाड़ियों और बाहरी तत्वों की आवाजाही को ट्रैक करने में क्यों नाकाम साबित हो रही हैं?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब तक बॉर्डर पर हाई-टेक सुरक्षा, पुख्ता सीसीटीवी सर्विलांस और यूपी पुलिस के साथ बेहतर समन्वय (Coordination) नहीं बनाया जाता, तब तक उधम सिंह नगर को अपराधियों द्वारा ‘शव ठिकाने लगाने की सुरक्षित जगह’ के रूप में इस्तेमाल करने से रोकना नामुमकिन होगा।
