रुद्रपुर। शनिवार को शहर की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों ने सियासी माहौल गर्म कर दिया। एक ओर कांग्रेस के युवा कार्यकर्ता जुलूस की शक्ल में जिलाधिकारी कार्यालय की ओर बढ़े और ज्ञापन देने की मांग की, वहीं दूसरी ओर भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मेट्रोपोलिस क्षेत्र के गेट के पास पुतला दहन कर विरोध प्रदर्शन किया।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प दृश्य भी देखने को मिला। जैसे ही हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का कैमरा कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा, नेताओं और कार्यकर्ताओं में कैमरे के सामने आने की होड़ दिखाई दी। विधायक शिव अरोड़ा, महापौर विकास शर्मा, पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल सहित भाजपा के कई नेता कैमरे में अपनी तस्वीर दर्ज कराने को लेकर सक्रिय दिखाई दिए। हालांकि पत्रकारिता का कैमरा किसी एक राजनीतिक दल के प्रचार का माध्यम बनने के बजाय पूरे घटनाक्रम को देखने और जनता के सवालों को सामने रखने के लिए दूसरी दिशा में घूम गया।
कलेक्ट्रेट की ओर बढ़े कांग्रेस के युवा
कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं ने पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत कलेक्ट्रेट परिसर की ओर जुलूस निकाला। बड़ी संख्या में युवा कार्यकर्ता इसमें शामिल हुए। हाथों में ज्ञापन और नारे लगाते हुए कार्यकर्ता जिलाधिकारी को अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन देने की कोशिश कर रहे थे।
कलेक्ट्रेट परिसर के गेट पर पुलिस ने बैरिकेडिंग कर रास्ता रोक दिया। इसके बाद कुछ समय के लिए कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की जैसी स्थिति भी बनी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना था कि उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से जिलाधिकारी तक पहुंचकर ज्ञापन देने की अनुमति दी जानी चाहिए।
दूसरी ओर भाजपा की ओर से कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व के खिलाफ पुतला दहन किया गया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस और उसके नेताओं के खिलाफ नारेबाजी की।
2027 की राजनीति की आहट
रुद्रपुर की मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा की सक्रियता को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता अनिल चौहान और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल भी स्थानीय राजनीति में अपनी भूमिका बनाए हुए हैं।
ऐसे में विरोध प्रदर्शन केवल तत्काल राजनीतिक मुद्दे तक सीमित है या इसके पीछे आगामी चुनाव की राजनीतिक जमीन तैयार करने की रणनीति भी है, यह आने वाला समय बताएगा।
हल्द्वानी के कार्यक्रम से मनुस्मृति की बहस तक
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के हल्द्वानी कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण को लेकर भी राजनीतिक विवाद सामने आया था। इसी मुद्दे को लेकर रुद्रपुर में भाजपा द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर मनुस्मृति, जातीय व्यवस्था और सामाजिक समानता की बहस को जन्म दिया है। मनुस्मृति में वर्ण आधारित सामाजिक व्यवस्था के कई प्रावधान मिलते हैं, जिनमें शूद्रों को सामाजिक रूप से अधीनस्थ भूमिका में रखा गया है। उदाहरण के तौर पर मनुस्मृति के अध्याय 8 और 10 में शूद्रों की सामाजिक स्थिति और उनके कर्तव्यों से संबंधित प्रावधान मिलते हैं।
आधुनिक भारत का संविधान इसके विपरीत समानता और सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था देता है। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा और अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की बात करता है।
इसी अंतर को लेकर सामाजिक न्याय के पक्षधर संगठन और राजनीतिक दल समय-समय पर मनुस्मृति की आलोचना करते रहे हैं।
रुद्रपुर में बुलडोजर कार्रवाई पर उठते सवाल
मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद की बहस के बीच रुद्रपुर में विकास कार्यों और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सड़क चौड़ीकरण और स्मार्ट सिटी से जुड़े कार्यों के दौरान कई छोटे दुकानदारों के प्रतिष्ठान प्रभावित हुए हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि प्रभावित परिवारों में बड़ी संख्या मेहनतकश और दलित समुदाय से जुड़े लोगों की है।
नंदलाल की दुकान का मामला इसी बहस का भावुक उदाहरण बनकर सामने आया। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार उनकी दुकान से परिवार की आजीविका चलती थी। कार्रवाई के दौरान उनके महापौर के सामने अपनी रोजी-रोटी बचाने की गुहार लगाने की तस्वीर और घटना ने लोगों को भावुक किया।
सवाल यह है कि विकास जरूरी है, सड़क चौड़ी होनी चाहिए और शहर आधुनिक होना चाहिए, लेकिन विकास की कीमत सबसे कमजोर व्यक्ति ही क्यों चुकाए?
भाजपा के सामने दलित समाज का सवाल
रुद्रपुर में भाजपा के कार्यक्रमों में दलित समुदाय के अनेक कार्यकर्ता सक्रिय रूप से दिखाई देते हैं। वर्षों से पार्टी के साथ जुड़े कार्यकर्ता चुनावों में प्रचार करते हैं, झंडा उठाते हैं और पार्टी के पक्ष में नारे लगाते हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जो कार्यकर्ता दशकों तक पार्टी का समर्थन करता रहा, उसके रोजगार और प्रतिष्ठान पर संकट आने के समय उसकी आवाज कितनी मजबूती से उठाई जाती है?
नंदलाल जैसे कार्यकर्ताओं की स्थिति इस सवाल को और गंभीर बनाती है। यदि कोई व्यक्ति दशकों तक राजनीतिक संगठन के साथ खड़ा रहा और जीवन के एक पड़ाव पर उसकी रोजी-रोटी ही संकट में आ गई, तो राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल चुनावी समय तक सीमित कैसे रह सकती है?
विकास बनाम रोजगार
रुद्रपुर में विकास परियोजनाओं को लेकर जनता के बीच कई सवाल हैं। आईएसबीटी से जुड़े निर्माण, आसपास के व्यावसायिक विकास और सरकारी परियोजनाओं की लागत तथा पारदर्शिता को लेकर भी लोगों में चर्चा है।
किस परियोजना पर कितनी राशि खर्च हो रही है, किस एजेंसी को काम मिला है और प्रभावित दुकानदारों के पुनर्वास की क्या व्यवस्था है—इन सवालों के स्पष्ट जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
बिना दस्तावेज के किसी राजनीतिक व्यक्ति की हिस्सेदारी का आरोप लगाना उचित नहीं होगा, लेकिन यदि जनता के मन में सवाल हैं तो सरकार और संबंधित विभागों को पारदर्शिता के साथ उनका जवाब देना चाहिए।
कैमरा नेताओं से ज्यादा जनता की तरफ
आज रुद्रपुर में पुतले जले, नारे लगे और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन हुआ। कैमरे के सामने आने के लिए नेताओं में उत्साह भी दिखाई दिया।
मगर असली तस्वीर उस गरीब दुकानदार की है, जिसके लिए दुकान एक व्यवसाय से अधिक उसका घर चलाने का साधन है।
राजनीति का मूल्यांकन पुतला कितनी ऊंचाई तक जला, इससे नहीं होगा। राजनीति का मूल्यांकन इस बात से होगा कि बुलडोजर के सामने खड़े गरीब के साथ कौन खड़ा हुआ।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स इसी सवाल को आगे भी उठाता रहेगा। रुद्रपुर में विकास, राजनीति, बुलडोजर कार्रवाई, दलित समाज और सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों की पड़ताल का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
