पुतला जलाने वालों से रुद्रपुर पूछ रहा है—मनुस्मृति से मुक्ति कब?पुतला जलाने वालों से रुद्रपुर पूछ रहा है—मनुस्मृति से मुक्ति कब?शुद्धिकरण पर राजनीति, फेसबुक पर बयानबाजी और पुतला दहन के बीच दबा असली सवाल—दलित, पिछड़े और मूल निवासियों के अधिकारों का क्या होगा?हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | संपादकीय

Spread the love

गली-गली में शोर है, राहुल गांधी चोर है—तो सत्ता में कौन है?
रुद्रपुर में भाजपा जनप्रतिनिधि नारा लगा रहे हैं—“गली-गली में शोर है, राहुल गांधी चोर है।” सवाल सीधा है: केंद्र में सत्ता भाजपा की, उत्तराखंड में सत्ता भाजपा की, रुद्रपुर में विधायक और महापौर भाजपा के—फिर राहुल गांधी चोर कैसे हो गए? सत्ता की जिम्मेदारी विपक्ष की नहीं, सरकार की होती है। रुद्रपुर की नजूल भूमि, बड़े परिसरों, मॉल और गरीबों की उजड़ती रोजी-रोटी पर सवाल जनता पूछ रही है। यदि व्यवस्था में भ्रष्टाचार या अन्याय है तो जिम्मेदारी सत्ता में बैठे लोगों की बनती है। गली-गली में शोर से सच नहीं बदलता—जनता पूछ रही है, सत्ता आपकी है तो जवाब भी आपका होना चाहिए।



रुद्रपुर की राजनीति में आजकल एक अजीब दृश्य दिखाई दे रहा है। एक तरफ कांग्रेस सामाजिक सम्मान और कथित जातिगत भेदभाव का सवाल उठा रही है, दूसरी तरफ भाजपा के विधायक, महापौर और संगठन के नेता कांग्रेस के विरोध में सड़कों पर उतरकर राहुल गांधी का पुतला जला रहे हैं। फेसबुक पर पोस्टों की बाढ़ है। कोई कांग्रेस को विभाजनकारी बता रहा है, कोई झूठा प्रचार करने वाली पार्टी बता रहा है और कोई सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ा रहा है।
लेकिन रुद्रपुर की जनता इस राजनीतिक शोर के बीच एक सीधा सवाल पूछ रही है—
जिस व्यक्ति ने अपनी पीड़ा देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाओं में से एक राज्यसभा में रखी, उसकी पीड़ा का जवाब पुतला जलाकर दिया जाएगा या उस पीड़ा पर गंभीर सामाजिक बहस होगी?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


यही सवाल आज रुद्रपुर की राजनीति के केंद्र में होना चाहिए।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान से जुड़े कथित शुद्धिकरण प्रकरण को लेकर अपनी पीड़ा सार्वजनिक की। किसी व्यक्ति को अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार है। उस पीड़ा को सुना जाए, तथ्य सामने रखे जाएं और यदि कोई अपराध या भेदभाव हुआ है तो कानून अपना काम करे—यही लोकतांत्रिक रास्ता है।
मगर रुद्रपुर में जो राजनीतिक तस्वीर सामने आई, उसमें मुद्दे का जवाब मुद्दे से देने के स्थान पर राहुल गांधी का पुतला दहन केंद्र में दिखाई दिया।
सवाल यह है कि पुतला राहुल गांधी का जल रहा था या उस सवाल को जलाने की कोशिश हो रही थी जिसे दलित समाज वर्षों से उठाता आया है?
फेसबुक पोस्ट बनाम जमीन की हकीकत
रुद्रपुर के विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा की फेसबुक पोस्टों में कांग्रेस पर आरोप लगाए गए। भाजपा ने अपने प्रदर्शन को कांग्रेस की कथित जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बताया।
भाजपा नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में देश और प्रदेश विकास की नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है।
यह राजनीतिक दावा अपनी जगह है।
मगर लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना भी जनता का अधिकार है।
रुद्रपुर में विकास हुआ है तो यह भी पूछा जाएगा कि उस विकास का लाभ किसे मिला?
बड़े मॉल बने। बड़ी कॉलोनियां बनीं। जमीनों का मूल्य बढ़ा। शहर का विस्तार हुआ। सड़कें चौड़ी हुईं।
लेकिन जिस गरीब ने इस शहर की गलियों में ठेला लगाया, जिसने दुकान खड़ी की, जिसने मजदूरी की, जिसने पीढ़ियों तक इस शहर को अपनी मेहनत दी—उसके हिस्से में क्या आया?
यही वह सवाल है जिससे सोशल मीडिया की राजनीति अक्सर बच निकलती है।
मनुस्मृति का सवाल आखिर इतना असहज क्यों है?
जब भी जाति व्यवस्था की ऐतिहासिक जड़ों पर चर्चा होती है, मनुस्मृति का नाम सामने आता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था की कठोर आलोचना की थी और सामाजिक समानता के लिए संघर्ष किया।
आज किसी राजनीतिक दल को सीधे मनुस्मृति समर्थक या दलित विरोधी घोषित कर देना गंभीर आरोप है और इसके लिए ठोस राजनीतिक प्रमाण आवश्यक हैं।
लेकिन एक राजनीतिक प्रश्न पूछने में कोई हर्ज नहीं—
क्या आज के भारत में जाति आधारित किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार किया जा सकता है?
उत्तर स्पष्ट होना चाहिए—किसी भी परिस्थिति में सामाजिक अपमान स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
इसलिए जब कोई दलित व्यक्ति शुद्धिकरण जैसी घटना को अपने सम्मान के खिलाफ मानता है, तो उसकी पीड़ा को राजनीतिक नारे में बदलने के बजाय समाज को उसके भीतर छिपे प्रश्न को समझना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है।
लोकतंत्र का असली अर्थ है—जिसकी आवाज कमजोर है, उसकी आवाज सत्ता तक पहुंचे।
रुद्रपुर की बसावट किसने की?
आज रुद्रपुर के चमकते बाजारों और ऊंची इमारतों को देखकर शायद नई पीढ़ी भूल जाए कि इस शहर की सामाजिक और आर्थिक नींव किन लोगों की मेहनत से बनी।
रुद्रपुर की पुरानी बसावट, जिसे रामपुरा के नाम से भी जाना जाता रहा, मेहनतकश और वंचित समाजों की मेहनत से विकसित हुई। दलित, पिछड़े, आदिवासी, श्रमिक, किसान और छोटे व्यापारी इस शहर की आर्थिक धुरी रहे हैं।
आज उसी शहर में मूल निवासी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है।
यह विरोधाभास है।
जिसने शहर बसाया, वही शहर में अपने अधिकार के लिए लाइन में खड़ा है।
जिसने पीढ़ियों तक दुकान चलाई, उसकी दुकान अतिक्रमण के नाम पर हट जाती है।
जिसने ठेला लगाकर बच्चों को पढ़ाया, उसकी रोजी पर बुलडोजर पहुंच जाता है।
और जब वह अपने अधिकार की बात करता है तो उसकी आवाज राजनीति के शोर में दब जाती है।
बुलडोजर का न्याय सबके लिए समान होना चाहिए
रुद्रपुर में अतिक्रमण हटाने और सरकारी भूमि से कब्जे हटाने की कार्रवाई को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है तो कानून अपना काम करे।
लेकिन कानून की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह सबके लिए समान दिखाई दे।
गरीब की दुकान टूटे और बड़े कारोबारी का निर्माण सुरक्षित दिखाई दे, तो सवाल उठेंगे।
छोटे दुकानदार को हटाया जाए और उसे पुनर्वास के लिए वर्षों इंतजार करना पड़े, तो सवाल उठेंगे।
एक व्यक्ति को वैकल्पिक दुकान मिले और दूसरा व्यक्ति सड़क पर आ जाए, तो सवाल उठेंगे।
ये सवाल किसी एक जाति के खिलाफ नहीं हैं।
ये सवाल समान कानून और समान अवसर के पक्ष में हैं।
देसी समाज का सवाल सिर्फ वोट का सवाल मत बनाइए
रुद्रपुर और ऊधम सिंह नगर में देसी समाज, दलित समाज, पिछड़े वर्ग, आदिवासी समुदाय और मेहनतकश तबके के सामने रोजगार और सम्मान के प्रश्न लंबे समय से मौजूद हैं।
रुद्रपुर से किच्छा, सितारगंज, गदरपुर और खटीमा तक छोटे कारोबारियों और गरीब परिवारों की समस्याएं अलग-अलग रूप में दिखाई देती हैं।
राजनीतिक दल चुनाव के समय इनके घर पहुंचते हैं।
वोट मांगते हैं।
सामाजिक न्याय की बातें करते हैं।
फिर सत्ता आने के बाद वही नागरिक अपनी छोटी-सी दुकान बचाने के लिए अधिकारियों के चक्कर काटता है।
क्या यही सामाजिक न्याय है?
भाजपा से पांच सीधे सवाल
भाजपा नेता कांग्रेस से सवाल पूछ रहे हैं। अब जनता भाजपा से भी सवाल पूछ सकती है—
पहला— रुद्रपुर के गरीब और छोटे कारोबारियों के पुनर्वास की स्पष्ट नीति क्या है?
दूसरा— नजूल भूमि के मामलों में पारदर्शिता और समानता कैसे सुनिश्चित होगी?
तीसरा— दलित और पिछड़े युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार और आर्थिक अवसरों की ठोस योजना क्या है?
चौथा— बुलडोजर कार्रवाई में छोटे और बड़े प्रतिष्ठानों के लिए समान मानदंड कैसे लागू होंगे?
पांचवां— यदि भाजपा सामाजिक समरसता की सबसे बड़ी पक्षधर है तो जातिगत अपमान की शिकायतों पर उसका संस्थागत जवाब क्या है?
इन सवालों का उत्तर फेसबुक पोस्ट से नहीं मिलेगा।
इनका उत्तर नीति से मिलेगा।
कांग्रेस भी दूध की धुली हुई नहीं
यह संपादकीय कांग्रेस को भी क्लीन चिट नहीं देता।
कांग्रेस यदि दलित सम्मान की बात करती है तो उसे रुद्रपुर के दलित, पिछड़े और गरीब समाज के लिए अपना स्पष्ट रोडमैप सामने रखना चाहिए।
सिर्फ भाजपा विरोध पर्याप्त नहीं है।
जनता पूछेगी—
आप सत्ता में आए तो क्या बदलेंगे?
किसकी दुकान बचाएंगे?
किसे रोजगार देंगे?
किसकी जमीन का समाधान करेंगे?
किसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व देंगे?
किसके घर तक विकास पहुंचाएंगे?
यदि इन सवालों का जवाब कांग्रेस के पास भी केवल भाषण है, तो उसे भी जनता के सवालों का सामना करना होगा।
रुद्रपुर में असली चुनाव जाति बनाम जाति का नहीं होना चाहिए
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
ब्राह्मण समाज के प्रत्येक व्यक्ति को ब्राह्मणवाद का प्रतीक मानना गलत होगा।
इसी तरह दलित समाज के प्रत्येक व्यक्ति को केवल वोट बैंक मानना भी गलत होगा।
सवाल व्यक्ति की जाति का नहीं, व्यवस्था के व्यवहार का है।
यदि व्यवस्था किसी गरीब को अवसर से वंचित करती है तो उसका विरोध होना चाहिए।
यदि किसी दलित को जातिगत अपमान झेलना पड़ता है तो उसका विरोध होना चाहिए।
यदि किसी पिछड़े व्यक्ति की दुकान बिना उचित प्रक्रिया के हटती है तो उसका विरोध होना चाहिए।
यदि किसी मूल निवासी को अपने ही शहर में अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है तो उसका विरोध होना चाहिए।
और यदि किसी बड़े प्रभावशाली व्यक्ति को कानून से अलग सुविधा मिलती है तो उसका भी विरोध होना चाहिए।
मतदाता अब सिर्फ फेसबुक पोस्ट से प्रभावित नहीं होगा
रुद्रपुर की राजनीति में भाजपा के पास संगठन है, कांग्रेस के पास विपक्ष की भूमिका है और जनता के पास सबसे बड़ा हथियार—मत।
आज भाजपा कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है।
कल कांग्रेस भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन करेगी।
आज राहुल गांधी का पुतला जल रहा है।
कल किसी दूसरे नेता का पुतला जलेगा।
फेसबुक पर पोस्ट आती रहेंगी।
वीडियो वायरल होते रहेंगे।
मगर गरीब की दुकान वहीं रहेगी या टूटेगी?
युवा को रोजगार मिलेगा या वह पलायन करेगा?
दलित को सम्मान मिलेगा या उसे फिर किसी मंच पर अपनी पीड़ा बतानी पड़ेगी?
मूल निवासी अपने शहर में सम्मान से रहेगा या अधिकारों के लिए दर-दर भटकेगा?
यही असली राजनीति है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का सवाल
हम किसी जाति के खिलाफ नहीं हैं।
हम किसी धर्म के खिलाफ नहीं हैं।
हम किसी राजनीतिक दल के पक्ष में अंध समर्थन के लिए भी नहीं हैं।
हम सवाल उस मानसिकता से पूछते हैं जिसमें इंसान को उसकी जाति से छोटा-बड़ा समझा जाए।
मनुस्मृति पर बहस हो सकती है। इतिहास पर बहस हो सकती है। विचारधाराओं पर बहस हो सकती है।
लेकिन वर्तमान भारत का संविधान स्पष्ट रूप से समानता, स्वतंत्रता और गरिमा की बात करता है।
इसलिए आज की सबसे बड़ी जरूरत किसी ग्रंथ को जलाना या किसी नेता का पुतला जलाना भर नहीं है।
जरूरत उस मानसिकता को खत्म करने की है जो इंसान को इंसान से छोटा समझती है।
रुद्रपुर के मतदाताओं को भी अब सतर्क होकर सवाल पूछना होगा।
किसने आपके अधिकार की लड़ाई लड़ी?
किसने आपकी दुकान बचाई?
किसने आपके बच्चे को रोजगार दिलाया?
किसने आपकी जमीन का समाधान कराया?
किसने आपके सम्मान के लिए आवाज उठाई?
और किसने केवल चुनाव के समय आपका दरवाजा खटखटाया?
2027 की राजनीति में असली फैसला फेसबुक पोस्ट नहीं, रुद्रपुर की जनता करेगी।
और जनता का फैसला जाति के नाम पर नहीं, अधिकार, सम्मान, रोजगार, न्याय और समान अवसर के नाम पर होना चाहिए।
**क्योंकि लोकतंत्र में पुतला जल सकता है, सवाल नहीं।
नारा दब सकता है, जनता की आवाज नहीं।
और सत्ता बदल सकती है—पर जनता का अधिकार स्थायी होना चाहिए।**
मनुस्मृति वाले शीर्षक को संतुलित करें
आरोपों को अधिक स्पष्ट रूप से सीमित करें
दोहराव घटाकर संपादकीय कसें


Spread the love