उत्तराखंड राज्य आंदोलन की आत्मा पर अगर किसी ने सबसे बड़ा प्रहार किया है, तो वह केवल पहाड़ों की उपेक्षा से नहीं, बल्कि यहां की भाषा, संस्कृति और अस्मिता की अनदेखी से किया है। आज जब Hemvati Nandan Bahuguna Garhwal University में मराठी और उड़िया भाषा पढ़ाने की घोषणा की जाती है, तब सवाल केवल एक नए पाठ्यक्रम का नहीं उठता, बल्कि यह सवाल सीधे-सीधे उत्तराखंड की पहचान, राज्य आंदोलन की मूल भावना और पहाड़ की आत्मा से जुड़ जाता है। दुखद यह है कि जिस विश्वविद्यालय को गढ़वाल और उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनना चाहिए था, वही आज अपनी जड़ों से कटता दिखाई दे रहा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
यह कोई विरोध मराठी या उड़िया भाषा का नहीं है। भारत की हर भाषा सम्मान की अधिकारी है। मराठी और उड़िया दोनों समृद्ध भाषाएं हैं, उनका साहित्य और इतिहास गौरवशाली है। लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों में सबसे पहले प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिए? क्या उस भूमि की अपनी भाषाओं को नहीं, जिसने इस राज्य को जन्म दिया? क्या गढ़वाली, कुमाऊनी, जौनसारी, रंग, भोटिया, थारू और राजी जैसी भाषाएं इस योग्य नहीं कि उन्हें विश्वविद्यालय स्तर पर सम्मान मिले? क्या उत्तराखंड की संतानों को अपनी मातृभाषा सीखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा?
विडंबना देखिए कि विश्वविद्यालय प्रशासन कह रहा है कि गढ़वाली भाषा को “2027-28” से पढ़ाने की कार्ययोजना बनाई जाएगी। यानी अपनी भाषा के लिए योजना बनेगी, लेकिन बाहर की भाषाओं के लिए तत्काल मंजूरी दे दी जाएगी। इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है? यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि उत्तराखंड की भाषाएं आज भी नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता में नहीं हैं। यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी का परिचायक है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक भौगोलिक राज्य बनाने का आंदोलन नहीं था। यह आंदोलन पहाड़ की अस्मिता, संस्कृति, भाषा, रोजगार और पहचान बचाने का आंदोलन था। आंदोलनकारियों ने लाठियां खाईं, गोलियां झेलीं, अपने प्राण न्यौछावर किए ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति के साथ सम्मान से जी सकें। लेकिन आज स्थिति यह है कि उत्तराखंड बनने के दो दशक बाद भी यहां की भाषाएं सरकारी और शैक्षणिक व्यवस्था में हाशिये पर हैं।
सवाल यह भी उठता है कि आखिर विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार किस दिशा में उत्तराखंड को ले जाना चाहते हैं? यदि गढ़वाल विश्वविद्यालय में गढ़वाली और कुमाऊनी को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तो फिर कहां मिलेगी? क्या दिल्ली, मुंबई या कोलकाता के विश्वविद्यालय उत्तराखंड की भाषाओं को बचाएंगे? जिस राज्य के विश्वविद्यालयों में अपनी भाषा के लिए जगह नहीं, वहां सांस्कृतिक संरक्षण की बातें केवल खोखले भाषण बनकर रह जाती हैं।
आज पहाड़ खाली हो रहे हैं। गांव वीरान हो रहे हैं। हजारों गांव ऐसे हैं जहां ताले लटक चुके हैं। युवा रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। खेती चौपट है। स्वास्थ्य सेवाएं दम तोड़ रही हैं। स्कूल बंद हो रहे हैं। पहाड़ की मातृशक्ति पानी, जंगल और जीवन के संकट से जूझ रही है। इन ज्वलंत समस्याओं पर गंभीर शोध, नीति और शिक्षा मॉडल तैयार करने की बजाय विश्वविद्यालयों का ध्यान अपनी जड़ों से दूर होता दिखाई देता है।
विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल डिग्री बांटना नहीं होती। विश्वविद्यालय समाज का वैचारिक नेतृत्व करते हैं। लेकिन यहां तो हाल यह है कि उत्तराखंड की वास्तविक समस्याओं पर कोई ठोस अकादमिक विमर्श ही नहीं दिखाई देता। पलायन पर कितने गंभीर विभागीय शोध हुए? गढ़वाली-कुमाऊनी भाषाओं के डिजिटलीकरण पर क्या काम हुआ? लोकसंगीत, लोककला और लोकसंस्कृति को संरक्षित करने के लिए कितने सेंटर स्थापित किए गए? क्या कभी राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह सोचा कि अगर आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा ही भूल गई तो उत्तराखंड की पहचान क्या बचेगी?
विडंबना यह भी है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा को बढ़ावा देने की बात कही जाती है, लेकिन उत्तराखंड में उसी नीति की आड़ में अपनी भाषाओं की उपेक्षा जारी है। यदि सच में मातृभाषा आधारित शिक्षा को लागू करना है तो सबसे पहले गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। लेकिन यहां उल्टा हो रहा है। ऐसा लगता है मानो उत्तराखंड की भाषाओं को केवल लोकगीतों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित कर देने की साजिश चल रही हो।
यह भी समझना होगा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज की स्मृति होती है। भाषा खत्म होती है तो इतिहास खत्म होता है, लोककथाएं खत्म होती हैं, परंपराएं खत्म होती हैं, और अंततः समाज की आत्मा मर जाती है। आज गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाएं उसी खतरे से जूझ रही हैं। घरों में बच्चे हिंदी और अंग्रेजी तो सीख रहे हैं, लेकिन अपनी मातृभाषा बोलने में संकोच करने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि शिक्षा व्यवस्था ने इन भाषाओं को कभी सम्मानजनक स्थान दिया ही नहीं।
विश्वविद्यालय प्रशासन का यह तर्क कि “गढ़वाली को बाद में शामिल किया जाएगा” केवल औपचारिकता लगता है। यदि नीयत साफ होती तो सबसे पहले गढ़वाली और कुमाऊनी विभागों को मजबूत किया जाता। शोध केंद्र बनाए जाते। स्थायी नियुक्तियां होतीं। पाठ्यक्रम विकसित किए जाते। लेकिन यहां तो स्थिति यह है कि अपनी भाषा के लिए आश्वासन और बाहरी भाषाओं के लिए तत्काल स्वीकृति दी जा रही है।
यह निर्णय उस मानसिकता को भी उजागर करता है जिसमें उत्तराखंड को केवल संसाधनों की भूमि समझा जाता है, संस्कृति की नहीं। यहां की नदियां चाहिए, जंगल चाहिए, जमीन चाहिए, पर्यटन चाहिए, लेकिन यहां की भाषा और समाज की चिंता किसी को नहीं। यही कारण है कि उत्तराखंड का युवा अपनी पहचान खोता जा रहा है।
सबसे बड़ा प्रश्न राज्य सरकार पर भी उठता है। आखिर सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या सरकार यह भूल चुकी है कि उत्तराखंड राज्य किन संघर्षों से बना था? आंदोलनकारियों ने क्या इसलिए बलिदान दिया था कि यहां की भाषाएं ही हाशिये पर चली जाएं? सरकार यदि वास्तव में राज्य आंदोलन की भावना का सम्मान करती है तो उसे तुरंत गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं को विश्वविद्यालयों में अनिवार्य और प्राथमिक स्तर पर लागू करना चाहिए।
सिर्फ विश्वविद्यालय ही नहीं, पूरे शिक्षा तंत्र में सुधार की जरूरत है। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक मातृभाषा आधारित शिक्षा लागू होनी चाहिए। लोकभाषाओं में शोध को बढ़ावा मिलना चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं को स्थान मिलना चाहिए। सरकारी नौकरियों में स्थानीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य होना चाहिए। तभी उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बच पाएगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज भी जागे। यदि लोग अपनी भाषा छोड़ देंगे तो कोई सरकार उसे नहीं बचा सकती। माता-पिता को घर में बच्चों से गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी में संवाद करना होगा। सामाजिक संगठनों को भाषा संरक्षण के लिए अभियान चलाने होंगे। विश्वविद्यालयों पर दबाव बनाना होगा कि वे उत्तराखंड की भाषाओं को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक शैक्षणिक दर्जा दें।
यह केवल भाषा का मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। जिस दिन उत्तराखंड की भाषाएं खत्म होंगी, उसी दिन उत्तराखंड केवल नक्शे पर बचा रह जाएगा, आत्मा से नहीं। इसलिए आज जरूरत है जोरदार आवाज उठाने की। जरूरत है यह पूछने की कि आखिर अपने ही घर में अपनी भाषा को सम्मान क्यों नहीं मिल रहा? जरूरत है उन लोगों को आईना दिखाने की जो उत्तराखंड की मूल भावना को नजरअंदाज कर रहे हैं।
गढ़वाल विश्वविद्यालय को यह समझना होगा कि वह केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षक भी है। यदि वही अपनी जिम्मेदारी भूल जाएगा तो आने वाली पीढ़ियां उसे कभी माफ नहीं करेंगी। विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार को तत्काल अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। वरना इतिहास यह लिखेगा कि उत्तराखंड बनने के बाद सबसे ज्यादा नुकसान यदि किसी चीज का हुआ, तो वह था यहां की भाषा, संस्कृति और अस्मिता का।
