कानून के हाथ लंबे हैं! 40 साल पुराने मामले में गिरफ्तारी से उत्तराखंड के नेताओं को सीखगणेश गोदियाल के ‘10 साल बाद कार्रवाई राजनीतिक’ वाले तर्क पर सवाल, हरीश रावत को भी आईना—मामला पुराना होने से जांच खत्म नहीं होती

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रुद्रपुर उत्तराखंड,क़ानून के हाथ लंबे होते हैं। कोई मामला कितना भी पुराना क्यों न हो, यदि कानून की नजर में उसकी जांच और कार्रवाई का आधार मौजूद है तो समय बीत जाने से उसकी गंभीरता समाप्त नहीं होती। मध्य प्रदेश के खंडवा से सामने आया करीब 40 साल पुराना मामला इसी बात का उदाहरण है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


मोघट रोड थाना क्षेत्र में वर्ष 1986 में एक युवती से छेड़छाड़ के आरोप में दर्ज मामले में पुलिस ने करीब चार दशक बाद 64 वर्षीय अशोक कुमार को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार उस समय आरोपी की उम्र करीब 24 वर्ष थी। गिरफ्तारी के बाद उसे अदालत से जमानत मिली, मगर बाद की पेशियों में वह उपस्थित नहीं हुआ। अदालत ने उसके खिलाफ स्थायी वारंट जारी किया और पुलिस उसकी तलाश करती रही।
करीब 40 वर्ष बाद पुलिस को उसके ठिकाने की जानकारी मिली और उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया, जहां से जेल भेज दिया गया।
इस मामले का उत्तराखंड की मौजूदा राजनीतिक बहस से सीधा संबंध भले कानूनी रूप से न हो, मगर राजनीतिक संदेश बहुत स्पष्ट है—मामला पुराना होने से कानून की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।
यही बात कांग्रेस नेता गणेश गोदियाल और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के सामने भी रखी जानी चाहिए।
गोदियाल जी, सवाल कार्रवाई की तारीख का नहीं, जांच के अधिकार का है
हरीश रावत के सहयोगी और पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े कथित प्रकरण में ED की कार्रवाई के बाद कांग्रेस की ओर से कार्रवाई के समय पर सवाल उठाए गए हैं। गणेश गोदियाल ने भी कई वर्ष पुराने मामले में चुनाव के समय कार्रवाई किए जाने को राजनीतिक दृष्टि से प्रेरित बताया है।
गोदियाल जी से सीधा सवाल है—
अगर मामला दस साल पुराना है और जांच एजेंसी के पास जांच आगे बढ़ाने का कानूनी आधार है, तो केवल समय बीत जाने से जांच रोक देने की मांग क्यों हो?
क्या किसी कथित अनियमितता की फाइल पर दस साल की धूल जम जाने के बाद वह हमेशा के लिए बंद हो जानी चाहिए?
मध्य प्रदेश का 40 साल पुराना मामला बताता है कि कानून की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, मगर फाइल की उम्र अपने आप में किसी आरोपी को क्लीन चिट नहीं देती।
यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए—किसी जांच में नाम आना दोष सिद्ध होना नहीं है। अंतिम फैसला जांच, सबूत और अदालत की प्रक्रिया से ही होगा।
मगर जांच शुरू होना भी अपराध सिद्ध होना नहीं है।
हरीश रावत को भी आईना देखने की जरूरत
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने बयान में कहा है कि यदि उनके कार्यकाल में भर्ती प्रक्रिया में कोई चूक हुई है और उससे युवाओं के भविष्य पर असर पड़ा है तो वह जनता से माफी मांगने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके खिलाफ कोई प्रमाण है तो जांच एजेंसियों को दिया जाना चाहिए।
यह बयान अपने आप में जांच की प्रक्रिया को स्वीकार करता है।
फिर सवाल यह है कि यदि जांच एजेंसी अपना काम कर रही है तो उसके राजनीतिक होने का फैसला जांच पूरी होने से पहले कैसे किया जा सकता है?
यदि कार्रवाई गलत है तो दस्तावेजों के आधार पर उसे चुनौती दी जा सकती है।
यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो संबंधित व्यक्ति को राहत मिलेगी।
और यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो कानून अपना काम करेगा।
यही लोकतांत्रिक और कानूनी व्यवस्था है।
‘राजनीतिक कार्रवाई’ कहना आसान, सच सामने लाना कठिन
चुनाव के समय कार्रवाई होने पर सवाल उठाना राजनीतिक अधिकार है। मगर किसी जांच को केवल चुनाव के समय होने के कारण राजनीतिक षड्यंत्र घोषित कर देना जनता के सामने एक अधूरा तर्क है।
सवाल यह होना चाहिए—
क्या जांच में बरामदगी हुई?
क्या उसका स्रोत स्पष्ट है?
क्या उसका भर्ती प्रकरण से कोई संबंध है?
क्या दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य उपलब्ध हैं?
क्या किसी व्यक्ति की भूमिका प्रमाणित होती है?
इन सवालों के जवाब जांच से मिलेंगे।
टेलीविजन की खबर, सोशल मीडिया पोस्ट या राजनीतिक बयान से किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करना उचित नहीं है।
40 साल बाद गिरफ्तारी ने दिया बड़ा संदेश
खंडवा के इस मामले में पुलिस के अनुसार आरोपी ने पूछताछ के दौरान 40 साल पुरानी घटना याद न होने की बात कही। उसका चेहरा और हुलिया भी वर्षों में बदल चुका था। इसके बावजूद पुलिस ने पुराने रिकॉर्ड और मुखबिर की सूचना के आधार पर उसे तलाश लिया।
यह घटना बताती है कि समय जांच एजेंसी के सामने चुनौती जरूर खड़ी करता है, मगर कानून की प्रक्रिया को समाप्त नहीं करता।
आज 40 साल पुराने मामले में पुलिस आरोपी तक पहुंच सकती है तो दस साल पुराने भर्ती विवाद में जांच क्यों नहीं हो सकती?
यही सवाल कांग्रेस के उन नेताओं से पूछा जाना चाहिए जो कार्रवाई की तारीख को जांच की वैधता से जोड़ रहे हैं।
भर्ती घोटाले का दर्द आरोपी से अधिक युवाओं का है
उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर सवाल इसलिए गंभीर हैं क्योंकि यहां लाखों युवाओं का भविष्य सरकारी नौकरियों से जुड़ा है।
एक अभ्यर्थी वर्षों पढ़ता है।
परिवार आर्थिक बोझ उठाता है।
युवा अपनी उम्र का सबसे महत्वपूर्ण समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगाता है।
ऐसे में यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी का संदेह पैदा होता है तो उसकी जांच जरूरी है।
मामला 2016 का है तो भी सवाल वही रहेगा।
क्या हुआ था?
किसने किया था?
किसे लाभ मिला?
पैसे का लेन-देन हुआ या नहीं?
ओएमआर शीट से छेड़छाड़ हुई या नहीं?
इन सवालों का जवाब राजनीति से नहीं, जांच से मिलेगा।
भ्रष्टाचार की फाइल पर एक्सपायरी डेट नहीं होती
राजनीतिक बहस में एक खतरनाक संदेश तब जाता है जब यह कहा जाने लगे कि बहुत पुराना मामला है, इसलिए अब कार्रवाई क्यों?
भ्रष्टाचार की फाइल पर कोई ऐसी एक्सपायरी डेट नहीं होनी चाहिए कि दस साल बीत गए तो सब भूल जाओ।
अगर ऐसा होने लगे तो भ्रष्टाचार करने वाला व्यक्ति केवल समय काटने की रणनीति अपनाएगा।
कुछ वर्ष इंतजार करेगा।
सत्ता बदलेगी।
सरकार बदलेगी।
नेता बदलेंगे।
फाइल पुरानी होगी।
फिर कहा जाएगा—इतने पुराने मामले को अब क्यों खोला जा रहा है?
यह तर्क कानून के शासन के लिए खतरनाक हो सकता है।
आज कांग्रेस, कल बीजेपी—जनता सब देख रही है
उत्तराखंड की राजनीति में दल बदल और राजनीतिक समीकरण कोई नई बात नहीं हैं। आज कोई नेता कांग्रेस में है, कल बीजेपी में दिखाई दे सकता है। आज सत्ता पक्ष में बैठा व्यक्ति कल विपक्ष की भूमिका में हो सकता है।
ऐसे राजनीतिक परिवेश में भ्रष्टाचार का विरोध किसी एक दल का स्थायी अधिकार नहीं होना चाहिए।
गलत काम कांग्रेस के समय हुआ हो तो जांच हो।
गलत काम बीजेपी के समय हुआ हो तो जांच हो।
अधिकारी दोषी हो तो अधिकारी पर कार्रवाई हो।
राजनीतिक व्यक्ति दोषी हो तो राजनीतिक व्यक्ति पर कार्रवाई हो।
बिचौलिया दोषी हो तो उस पर कार्रवाई हो।
कानून की कसौटी व्यक्ति की पार्टी देखकर तय नहीं होनी चाहिए।
गणेश गोदियाल को नसीहत—जांच से डर क्यों?
गणेश गोदियाल वरिष्ठ कांग्रेस नेता हैं। उनसे अपेक्षा है कि वे चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर एक स्पष्ट बात कहें—
यदि कार्रवाई कानून के अनुसार है तो जांच होने दीजिए।
यदि जांच में कुछ नहीं मिलता तो चंदन सिंह जीना को राहत मिलेगी।
यदि किसी स्तर पर गंभीर अनियमितता प्रमाणित होती है तो कानून अपना रास्ता तय करेगा।
यही बात हरीश रावत पर भी लागू होती है।
रावत स्वयं कह चुके हैं कि यदि उनकी कोई चूक प्रमाणित होती है तो वह कानून के अनुसार दंड स्वीकार करने को तैयार हैं।
तो फिर जांच को अपना काम करने दिया जाए।
उत्तराखंड की मूल अवधारणा का सवाल
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का सपना सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था। युवाओं को रोजगार, पारदर्शी प्रशासन, भ्रष्टाचार से मुक्ति और सम्मानजनक भविष्य उसकी मूल आकांक्षाओं में शामिल रहे।
आज यदि भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं है।
यह उस युवा का सवाल है जिसने पहाड़ से मैदान तक आकर परीक्षा दी।
यह उस परिवार का सवाल है जिसने बच्चे की पढ़ाई पर पैसा लगाया।
यह उस अभ्यर्थी का सवाल है जिसने अपनी जिंदगी के कई वर्ष तैयारी में लगाए।
इसलिए भर्ती से जुड़ी किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
देर से सही, कार्रवाई तो हुई
सत्ता पक्ष के समर्थन में उठाया जा रहा सबसे बड़ा तर्क यही है—
देर से सही, कार्रवाई तो हुई।
यदि जांच में तथ्य सामने आते हैं तो कार्रवाई आगे बढ़नी चाहिए। यदि तथ्य आरोपों को खारिज करते हैं तो संबंधित व्यक्ति को सम्मानपूर्वक राहत मिलनी चाहिए।
मगर जांच एजेंसी को काम करने से पहले ही राजनीतिक कार्रवाई की संज्ञा देना व्यवस्था में अविश्वास बढ़ाता है।
40 साल पुराने मामले में गिरफ्तारी का उदाहरण सामने है।
आज उस घटना का संदेश साफ है—
कानून की नजर में फाइल पुरानी हो सकती है, मगर न्याय की जरूरत पुरानी नहीं होती।
और उत्तराखंड में भी यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसकी तह तक जाना जरूरी है।
हरीश रावत हों, गणेश गोदियाल हों, बीजेपी के नेता हों या किसी अन्य दल के नेता—कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
गलत हुआ है तो जेल जाएगा, गलत नहीं हुआ है तो जांच के बाद सम्मान के साथ बाहर आएगा।
यही कानून का राज है।
यही उत्तराखंड के युवाओं के भविष्य के प्रति वास्तविक जवाबदेही है।
HGT लाइव टिप्पणी:
राजनीति अपनी जगह है, जांच अपनी जगह। चुनावी समय कार्रवाई का राजनीतिक अर्थ निकाला जा सकता है, मगर जांच का दरवाजा केवल इसलिए बंद नहीं किया जा सकता कि मामला पुराना है। 40 साल पुराने मामले की गिरफ्तारी आज यही संदेश दे रही है—कानून देर कर सकता है, मगर उसकी पहुंच खत्म नहीं होती।


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