Uपीआई (UPI) ने भारत के लोगों के पैसे चुकाने की पूरी आदत ही बदल दी है। अब हाल यह है कि जेब में नकदी हो या न हो, खुले पैसे की चिंता हो या न हो-मोबाइल निकाला, क्यूआर कोड स्कैन किया और सेकेंडों में भुगतान हो गया।

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चाय की छोटी दुकान से लेकर बड़े-बड़े मॉल्स तक, और रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर नामी कारोबारियों तक, यूपीआई आज हर भारतीय के दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है। ऐसे में 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने का फैसला सिर्फ कोई साधारण व्यावसायिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य से जुड़ा एक बहुत बड़ा सवाल है। इसलिए जरूरी है कि इसको लेकर मन में बैठे हर तरह के भ्रम को दूर किया जाए। फिलहाल राहत की बात यह है कि ग्राहक के बैंक खाते से सीधे 0.4 प्रतिशत शुल्क नहीं कटेगा, क्योंकि यह एमडीआर नियम व्यापारी से वसूला जाना है। इसके अलावा 2,000 रुपये तक के सभी पी2एम लेन-देन इस दायरे से पूरी तरह बाहर रहेंगे, और पर्सन-टू-पर्सन (पी2एम) भुगतान हमेशा की तरह राशि की परवाह किए बिना बिल्कुल मुफ्त रहेंगे। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 96 प्रतिशत पी2एम लेन-देन इस नई व्यवस्था से बिल्कुल प्रभावित नहीं होने वाले हैं। वहीं, 75,000 रुपये या उससे अधिक के पात्र लेन-देन पर एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है। सरल शब्दों में कहें तो आज की तारीख में यह सोचना बिल्कुल गलत होगा कि 2,000 रुपये से ज्यादा का यूपीआई पेमेंट करते ही ग्राहक को अपनी जेब से सीधे 0.4 प्रतिशत एक्स्ट्रा चार्ज देना पड़ेगा।

क्या व्यापारी पर लगने वाला शुल्क चुपके से पहुंचेगा आपकी जेब तक?

यहीं से एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा होता है-क्या किसी शुल्क का ग्राहक से सीधे न काटा जाना इस बात की पूरी गारंटी देता है कि उसका आखिरी आर्थिक बोझ घूम-फिरकर आम ग्राहक तक नहीं पहुंचेगा? इसका जवाब बाजार के तौर-तरीकों में छिपा है। अगर किसी व्यापारी से अतिरिक्त शुल्क लिया जाएगा, तो वह जाहिर तौर पर उसे अपने खर्चों में जोड़ेगा। अब कोई दुकानदार अपना मुनाफा घटाकर इस लागत को खुद सहन कर सकता है, तो कोई अपनी वस्तु या सेवा की कीमतों में थोड़ा फेरबदल करके इसे समायोजित कर सकता है, और कुछ व्यापारी ग्राहकों को वापस नकदी (कैश) भुगतान की तरफ भी आकर्षित कर सकते हैं। यूपीआई की असली ताकत सिर्फ इसकी आधुनिक तकनीक नहीं है, बल्कि इसकी असली ताकत इसकी सहजता, रफ्तार और बेहद कम लागत है। यदि किसी नागरिक को पेमेंट करने से ठीक पहले यह सोचना पड़ जाए कि कौन सा माध्यम सस्ता पड़ेगा, किस राशि पर कितना शुल्क लगेगा और व्यापारी उससे कितना अतिरिक्त पैसा मांग बैठेगा, तो यह सीधे तौर पर डिजिटल भुगतान की सरलता और सुगमता पर एक बहुत बड़ा आघात होगा। यहां सरकार के सामने एक व्यावहारिक चुनौती भी मौजूद है। यह बात बिल्कुल सही है कि इतना विशाल भुगतान नेटवर्क मुफ्त में नहीं चलाया जा सकता। लगातार बढ़ते ट्रांजैक्शन के साथ सर्वर्स, नेटवर्क, मजबूत साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने के इंतजाम, तकनीकी रखरखाव और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी-भरकम खर्च आता है। बीते कई सालों से यूपीआई पर शून्य एमडीआर की व्यवस्था के तहत इस पूरी लागत का एक बड़ा हिस्सा देश के बैंक, भुगतान करने वाली कंपनियां और खुद सरकार मिलकर वहन करते आए हैं। इसलिए यूपीआई को आर्थिक रूप से टिकाऊ और मजबूत बनाने के लिए कोई सही मॉडल तलाशना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन केवल ‘टिकाऊपन’ के नाम पर आम जनता की जेब को एक स्थायी कमाई का जरिया बना लेना भी किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

यूपीआई की बढ़ती रफ्तार और बाजार का गणित

इस पूरे मामले में बर्नस्टीन (Bernstein) का अनुमान काफी अहम हो जाता है। उनके आकलन के मुताबिक, यदि यूपीआई के कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू के आधे हिस्से पर 40 बेसिस पॉइंट्स यानी 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगा दिया जाए, तो वित्त वर्ष 2028 तक करीब 22,000 करोड़ रुपये का एक बहुत बड़ा वार्षिक राजस्व पूल तैयार हो सकता है। उनके अनुसार इसमें बैंकों और डिजिटल पेमेंट ऐप्स की हिस्सेदारी भी काफी बड़ी होगी। हालांकि यह कोई आधिकारिक सरकारी राजस्व का अनुमान नहीं है, बल्कि एक बाजार का विश्लेषण मात्र है, लेकिन यह इस बात की ओर साफ इशारा जरूर करता है कि यूपीआई अब महज एक सुविधा नहीं, बल्कि एक विशाल आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र बन चुका है। यूपीआई के आंकड़े इसकी गजब की ताकत बयां करते हैं। साल 2016-17 में जहां कुल यूपीआई लेन-देन महज दो करोड़ के आसपास थे और उनका कुल मूल्य करीब 7,000 करोड़ रुपये था, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 24,162 करोड़ ट्रांजैक्शन और कुल मूल्य लगभग 314 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है। एक दशक के भीतर आई यह रिकॉर्ड छलांग चीख-चीखकर कहती है कि यूपीआई अब भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। जब कोई व्यवस्था इतनी विशाल हो जाए, तो उसके नियमों में किया गया छोटा सा बदलाव भी बहुत बड़ा असर पैदा कर सकता है। संख्या के लिहाज से देखा जाए तो 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान भले ही कुल लेन-देन का एक छोटा हिस्सा हों, लेकिन उनकी कुल वैल्यू बहुत बड़ी होती है। यानी नीति निर्माताओं ने फिलहाल एक ऐसी श्रेणी चुनी है, जहां अपेक्षाकृत कम संख्या में बड़े लेन-देन से पूरे पेमेंट नेटवर्क की लागत का बड़ा हिस्सा निकाला जा सके और रोजमर्रा के छोटे भुगतानों को पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके। यही सही संतुलन बनाकर रखना आज के समय की असली चुनौती है।

छोटे दुकानदारों की चिंता और पारदर्शिता की दरकार

छोटे दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाले लोग यूपीआई के सबसे बड़े और सच्चे लाभार्थी हैं। उनके लिए यह डिजिटल भुगतान एक बेहतरीन सुविधा भी है और अपने कारोबार को तेजी से बढ़ाने का एक शानदार जरिया भी है। यदि डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने की लागत में बढ़ोतरी होती है, तो इसका सीधा असर उनके बेहद कम मुनाफे (मार्जिन) पर पड़ सकता है। यही कारण है कि छोटे व्यापारियों के लिए उपलब्ध कराई गई छूट और सुरक्षा के प्रावधानों का मैदान पर सही से लागू होना बेहद जरूरी है। इसके अलावा दूसरी सबसे बड़ी चिंता पारदर्शिता को लेकर है। यदि एमडीआर लागू किया जा रहा है, तो देश की जनता को यह बिल्कुल साफ-साफ बताया जाना चाहिए कि उससे मिलने वाली रकम का पूरा आर्थिक ढांचा क्या होगा, किस हिस्से से किस पक्ष की लागत पूरी की जाएगी और देश के पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने में इसका वास्तव में कितना इस्तेमाल होगा। जनता की जेब पर किसी भी तरह का आर्थिक बोझ डालने से पहले जनता को पूरा हिसाब मिलना चाहिए। तीसरी और सबसे डराने वाली चिंता भविष्य को लेकर है। आज नियम के तहत सीमा 2,000 रुपये है, आज यह शुल्क सिर्फ व्यापारी को देना है, और आज सभी पी2एम भुगतान पूरी तरह मुफ्त हैं। इन तीनों तथ्यों को स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह भी मानकर चलना होगा कि किसी भी आर्थिक व्यवस्था में शुल्क की यह संरचना हमेशा एक जैसी रहने की कोई गारंटी नहीं होती। भविष्य में अगर कोई बदलाव लाया जाता है, तो उसे एक अलग नीति, खुली सार्वजनिक बहस और स्पष्ट सरकारी फैसले के रूप में देखा जाना चाहिए। मौजूदा व्यवस्था से यह निष्कर्ष निकाल लेना कि अब हर छोटे-बड़े यूपीआई पेमेंट पर भारी-भरकम चार्ज लगना तय है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन इस संभावित आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

डिजिटल भरोसे की कीमत किसी भी मुनाफे से बहुत बड़ी है

डिजिटल भुगतान के प्रति लोगों का भरोसा बड़ी मुश्किल से बनता है और थोड़ी सी लापरवाही से बहुत आसानी से कमजोर भी हो सकता है। देश के आम नागरिकों को यदि यह महसूस होने लगा कि जिस खास सुविधा को अपनाने के लिए उन्हें बरसों तक लगातार प्रोत्साहित किया गया, अब उसी सुविधा के एवज में उन्हें धीरे-धीरे पैसे चुकाने पड़ेंगे, तो यह सवाल केवल कुछ रुपयों या पैसों का नहीं रह जाएगा, बल्कि मूल सवाल यह होगा कि इस ‘डिजिटल भारत’ को चलाने की असली कीमत आखिर कौन चुका रहा है? इसलिए सरकार को एक बहुत ही स्पष्ट और मजबूत लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी। छोटे भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहें, पी2एम ट्रांजैक्शन फ्री बने रहें, छोटे व्यापारियों पर कोई अतिरिक्त मानसिक या आर्थिक बोझ न आए और सबसे बढ़कर यह कि भविष्य में यदि शुल्क के नियमों में कोई बदलाव हो भी, तो वह पूरी तरह पारदर्शी तरीके से हो, न कि धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था के रूप में ढल जाए जहां आम नागरिक को हर डिजिटल भुगतान पर किसी न किसी छिपे हुए शुल्क का सामना करना पड़े। यूपीआई को कमाई या राजस्व का स्रोत बनाने की जल्दबाजी हमारी इस पूरी डिजिटल क्रांति के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकती है। भारत ने नकदी के जमाने से निकलकर डिजिटल भुगतान की तरफ कदम बढ़ाने के लिए अपने नागरिकों को प्रेरित किया था, छोटे-छोटे दुकानदारों के काउंटर पर क्यूआर कोड लगवाए थे। हमारे देश के बैंकों और पेमेंट कंपनियों ने मिलकर डिजिटल भुगतान को आम इंसान के सामान्य जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाया है। अब इस पूरी ऐतिहासिक यात्रा की सबसे बड़ी और अमूल्य पूंजी केवल और केवल जनता का अटूट भरोसा है। उस भरोसे की कीमत बाजार के किसी भी एमडीआर या टैक्स से कहीं ज्यादा कीमती है।

सरकार के सामने आज असली कसौटी यह बिल्कुल नहीं होनी चाहिए कि यूपीआई के जरिए कुल कितने हजार करोड़ रुपये का राजस्व कमाया जा सकता है, बल्कि सच्ची कसौटी यह होनी चाहिए कि यूपीआई को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखते हुए भी आम आदमी के लिए इसे पहले की तरह ही सस्ता, बेहद सरल और पूरी तरह भरोसेमंद कैसे बनाकर रखा जाए। किसी व्यापारी से एमडीआर चार्ज लेना एक अलग बात है, लेकिन उस लागत का धीरे-धीरे घूमकर ग्राहक की जेब तक पहुंच जाना बिल्कुल दूसरी बात है। पहली व्यवस्था एक बेहतर आर्थिक मॉडल हो सकती है, लेकिन दूसरी व्यवस्था हमारी इस शानदार डिजिटल सुविधा पर एक भारी बोझ बन सकती है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यूपीआई पर आम जनता के लिए चार्ज शुरू हो चुका है, लेकिन यह चेतावनी देने का बिल्कुल सही समय जरूर है कि आज व्यापारी के नाम पर दर्ज होने वाला यह शुल्क कल को किसी भी सूरत में आम ग्राहक की जेब तक नहीं पहुंचना चाहिए। यूपीआई की आज तक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह बिल्कुल नहीं है कि उसने देश में अरबों-खरबों रुपये के लेन-देन मुमकिन कर दिखाए, बल्कि इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने पैसों के लेनदेन को आम भारतीय के लिए इतना ज्यादा आसान बना दिया कि धीरे-धीरे नकदी की जरूरत ही खत्म होती चली गई। जब भी यूपीआई की कीमत तय करने की बात आए, तो इस ऐतिहासिक उपलब्धि के महत्व को कभी कम नहीं आंकना चाहिए। डिजिटल भारत को आगे बढ़ने के लिए कमाई का मॉडल जरूर चाहिए, लेकिन ऐसा कोई मॉडल बिल्कुल नहीं चाहिए जो इसकी पूरी डिजिटल रीढ़ को ही महंगा और बोझिल बना दे।

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