हिमालय की ऊंची चोटियों, बर्फीले रास्तों और दुर्गम पहाड़ों के बीच होने वाली नंदा देवी राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकआस्था, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वासों का अद्भुत संगम मानी जाती है। इस यात्रा से जुड़ी अनेक मान्यताओं में सबसे रहस्यमयी परंपरा चौसिंग्या खाड़ू से जुड़ी है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
मान्यता है कि नंदा देवी की डोली जब कठिन और निर्जन हिमालयी रास्तों को पार करते हुए होमकुंड पहुंचती है, तब वहां विधि-विधान के साथ अंतिम हवन-यज्ञ संपन्न किया जाता है। इसके बाद चौसिंग्या खाड़ू की पीठ पर माता नंदा के लिए लाई गई श्रृंगार सामग्री, वस्त्र और अन्य पूजन सामग्री रखी जाती है।
फिर शुरू होती है रहस्यमयी यात्रा
परंपरा के अनुसार यज्ञ के बाद चौसिंग्या खाड़ू को बांधकर नहीं रखा जाता और न ही उसकी बलि दी जाती है। उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है। लोकविश्वास में उसे माता नंदा का शुभदूत माना जाता है।
कहा जाता है कि स्वतंत्र होते ही खाड़ू अपने आप हिमालय की ऊंची और दुर्गम चोटियों की ओर बढ़ने लगता है। उसके आगे बर्फ से ढके रास्ते, खड़ी चट्टानें और अत्यंत कठिन पर्वतीय भूभाग होता है।
सबसे रहस्यमयी बात इसके बाद सामने आती है।
यात्रा में शामिल लोग बताते हैं कि कुछ दूरी तक चौसिंग्या खाड़ू दिखाई देता रहता है। लेकिन जैसे-जैसे वह ऊंचाई की ओर बढ़ता है, एक समय ऐसा आता है जब वह अचानक आंखों से ओझल हो जाता है।
आखिर कहां चला जाता है चौसिंग्या खाड़ू?
यही सवाल वर्षों से लोकविश्वास और जिज्ञासा का विषय बना हुआ है।
नंदा देवी राजजात से जुड़ी लोकमान्यता में माना जाता है कि खाड़ू माता नंदा की सामग्री लेकर उनके मायके से ससुराल और फिर कैलाश की ओर प्रस्थान करता है। उसके बाद उसका दिखाई न देना श्रद्धालुओं के लिए माता नंदा की दिव्य यात्रा का हिस्सा माना जाता है।
हालांकि, खाड़ू वास्तव में किस स्थान पर पहुंचता है और उसके बाद उसके साथ क्या होता है, इसका कोई पुष्ट वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसके संबंध में कही जाने वाली बातें धार्मिक आस्था और स्थानीय लोकपरंपराओं के रूप में ही देखी जानी चाहिए।
हिमालय का रहस्य या आस्था का विश्वास?
चौसिंग्या खाड़ू से जुड़ी यह परंपरा हिमालय की उन लोककथाओं में शामिल है, जहां प्रकृति, धर्म और रहस्य एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए उसका आंखों से ओझल होना माता नंदा की दिव्य यात्रा का संकेत है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से इस घटना के बारे में प्रमाणित निष्कर्ष के लिए प्रत्यक्ष और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होंगे।
इसीलिए चौसिंग्या खाड़ू का यह रहस्य आज भी नंदा देवी राजजात की सबसे चर्चित और आकर्षक लोकमान्यताओं में गिना जाता है।
आस्था कहती है—खाड़ू माता नंदा का संदेश लेकर कैलाश की ओर चला जाता है।
सवाल आज भी वही है—आखिर वह कहां जाता है?
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