कांग्रेस के सामने टिकट का सवाल, पुराने धुरंधर पर दांव लगाने से बदल सकता है सितारगंज का चुनावी समीकरण
रुद्रपुर। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही ऊधम सिंह नगर की सितारगंज विधानसभा सीट पर राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज होने लगा है। सामान्य श्रेणी की इस सीट पर मौजूदा[15/09, 6:56 pm] हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स: सितारगंज विधानसभा सीट (उधम सिंह नगर जिला) उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में से एक बेहद चर्चित और महत्वपूर्ण सामान्य श्रेणी की सीट है। वर्तमान में यहाँ से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सौरभ बहुगुणा विधायक हैं, जो लगातार दो बार (2017 और 2022) से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। [1])उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सितारगंज सीट पर राजनीतिक सरगर्मियां और चुनावी अपडेट काफी तेज हो गए हैं:
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
पिछला चुनावी समीकरण (2022 चुनाव परिणाम)2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच था: [1]विजेता: सौरभ बहुगुणा (भारतीय जनता पार्टी)
तीसरा स्थान: अजय जायसवाल (आम आदमी पार्टी – AAAP), जिन्हें 10,135 वोट मिले थे।
चौथा स्थान: नारायण पाल (बहुजन समाज पार्टी – BSP), जिन्होंने 9,258 वोट हासिल किए थे।
[1] (वर्तमान राजनीतिक सरगर्मियां और अपडेटचुनाव की तैयारी: आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों (भाजपा, कांग्रेस, आप और बसपा) ने इस निर्वाचन क्षेत्र में अपनी सांगठनिक गतिविधियों को तेज कर दिया है। नए मतदाताओं को जोड़ने और जातीय समीकरणों को साधने की रणनीतियों पर काम शुरू हो चुका है।
नेताओं के बीच जुबानी जंग: क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। पूर्व विधायक नारायण पाल जैसे विपक्षी नेता जहां क्षेत्र की जनसमस्याओं को लेकर सरकार को घेर रहे हैं, वहीं वर्तमान विधायक सौरभ बहुगुणा के समर्थक सड़क, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में किए गए विकास कार्यों का हवाला दे रहे हैं।
मुख्य चुनावी मुद्दे: इस सीट पर स्थानीय मुद्दे हमेशा हावी रहते हैं। आने वाले चुनाव में भी विकास कार्य, रोजगार, कानून व्यवस्था, किसानों से जुड़े मुद्दे और विभिन्न जातियों के समीकरण यहाँ की राजनीति और हार-जीत का मुख्य फैक्टर तय करेंगे।
विजेता (नंबर 1): सौरव बहुगुणा (BJP) – 43,354 वोटनिकटतम प्रतिद्वंदी (नंबर 2): नवतेज पाल सिंह (कांग्रेस) – 32,416 वोट [1] भाजपा के सौरव बहुगुणा ने नवतेज पाल सिंह को 10,938 वोटों के अंतर से हराया था।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स: वरिष्ठ नेता नारायण पाल इस सीट से लगातार दो बार (2002 और 2007) विधायक चुने गए थे। दोनों ही बार उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर चुनाव जीता था। उनके विधायक बनने और दोनों चुनावों का पूरा विवरण इस प्रकार है
प्रथम विधानसभा चुनाव (साल 2002)उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जब 2002 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ, तो नारायण पाल ने इतिहास रचा था।
मुकाबला: उनका मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रत्याशी बीना आर्य से था।
परिणाम: नारायण पाल ने भारी मतों से जीत हासिल की। उन्हें कुल वैध मतों के करीब 61 प्रतिशत वोट मिले थे, जो कि एक एकतरफा और ऐतिहासिक जीत थी। [1] (https://hindi.news18.com/news/uttarakhand/udham-singh-nagar-uttarakhand-assembly-elections-2022-sitarganj-assembly-seat-profile-cविशेष उपलब्धि: इस जीत के बाद नारायण पाल को उत्तराखंड विधानसभा में बसपा विधानमंडल दल का नेता बनाया गया था।द्वितीय विधानसभा चुनाव (साल 2007)नारायण पाल ने साल 2007 के चुनावों में भी अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा।
[1] पार्टी: बहुजन समाज पार्टी (BSP)वोटों का विवरण: नारायण पाल को कुल 31,745 वोट मिले थे।निकटतम प्रतिद्वंदी: दूसरे स्थान पर कांग्रेस (INC) के प्रत्याशी कांता प्रसाद सागर रहे, जिन्हें 23,308 वोट मिले।जीत का अंतर: नारायण पाल ने कांग्रेस प्रत्याशी को 8,437 वोटों के अंतर से मात दी थी।विशेष पद: लगातार दूसरी बार विधायक बनने के बाद वे उत्तराखंड विधानसभा में आश्वासन समिति के अध्यक्ष भी चुने गए।बाद का राजनीतिक सफरइसके बाद साल 2012 के चुनाव में भाजपा के किरण चंद मंडल ने उन्हें हरा दिया था। नारायण पाल समय-समय पर कांग्रेस और बसपा में आते-जाते रहे हैं। साल 2022 का चुनाव उन्होंने फिर से बसपा के टिकट पर लड़ा था जिसमें वे चौथे स्थान पर रहे, और वर्ष 2026 में उन्होंने एक बार फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन थाम लिया है। [1] (कभी इस करवट तो कभी उसे करवट फिर वैसे भी कांग्रेस पार्टी को उन्हें आरक्षित सीट से चुनाव लड़ना चाहिए जब सितारगंज सामान्य सीट है। सामान्य व्यक्ति को ही चुनाव लड़ना चाहिए हम बात कर रहे हैं बलवंत सिंह बोहरा जिन्होंने 80 के दशक से लगातार कांग्रेस पार्टी को समर्पित जीवन जिया है सत्ता के गलियारे में 80 से 90 के दशक में उनकी तूती बोलती थी हल्द्वानी क्षेत्र से लेकर नैनीताल तक चोर गलियां सितारगंज अपनी दमदार उपस्थिति बनाए रखी यशपाल आर्य से लेकर हरीश रावत नारायण दत्त तिवारी, लगभग सभी सीट से नेताओं के साथ में काम किया है कांग्रेस के पदाधिकारी भी रहे एक लंबा अनुभव सितारगंज में लगभग 22 से 23000 पर्वतीय वोट जो कि भारतीय जनता पार्टी को जाता है, बलवंत सिंह बोहरा को टिकट देने का मतलब है स्थानीय और बाहरी कुमाऊं और गढ़वाल ऐसे कई राजनीतिक गांव खेले जा सकते हैं और सितारगंज की सीट आसानी से कांग्रेस जीत सकती है इसके लिए उसे अपने पुराने धुरंधर राजनीतिज्ञ बलवंत सिंह बोहरा पर गांव खेलना चाहिए गांव खेलना ही नहीं उधम सिंह नगर के अंदर पूरा उधम सिंह नगर एक तरफ जीत की ओर अग्रसर हो सकता है वैसे भी बलवंत सिंह बोहरा सक्रिय रूप से सितारगंज विधानसभा क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं की हल्द्वानी में भी उन्होंने कोशिश की थी 80 90 के दशक में टिकट के लिए सत्ता के शिकार तक अपनी पहुंच बनाई कई बार ऐसा हुआ की टिकट दूसरे के पास चला गया एक लंबा अनुभव स्थानीय लोगों से मेल मिला आप पार्वती समाज और सामान्य श्रेणी क्योंकि अब बसपा का वह जन आधार तो है नहीं जो पहले होता था अब उत्तराखंड के अंदर दो राष्ट्रीय पार्टियों हैं कांग्रेस और बीजेपी सौरभ बहुगुणा का भी अपना ठीक-ठाक हिसाब किताब है लोगों के अंदर लोकप्रिय भी है इसके लिए अगर सौरभ बहुगुणा को टक्कर देनी है तो विकल्प के रूप में बलवंत सिंह बोहरा नया इतिहास लिख सकते हैं और सौरभ बहुगुणा को गढ़वाल की तरफ बोरा बिस्तर लपेटकर यही एकमात्र व्यक्ति है जो उन्हें कुमाऊं से गढ़वाल की यात्रा कर सकता है खबर बनाएं राजनीतिक मिशन 2027 सितारगंज विधानसभा सौरभ बहुगुणा बनाम बलवंत सिंह बोहरा चुनौती केवल प्रत्याशी घोषित करने की नहीं, बल्कि ऐसा चेहरा मैदान में उतारने की है जो बहुगुणा की राजनीतिक पकड़ को चुनौती दे सके।
इसी बीच कांग्रेस के पुराने और अनुभवी नेता बलवंत सिंह बोहरा का नाम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनता दिखाई दे रहा है। यदि कांग्रेस सितारगंज में बोहरा को अपना उम्मीदवार बनाती है तो मुकाबला केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा, बल्कि इसे पुराने राजनीतिक अनुभव बनाम स्थापित युवा नेतृत्व की लड़ाई के रूप में भी देखा जा सकता है।
सौरभ बहुगुणा की मजबूत राजनीतिक स्थिति
सौरभ बहुगुणा ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में सितारगंज से जीत दर्ज की। 2022 में उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी नवतेज पाल सिंह को 10,938 मतों के अंतर से पराजित किया था। बहुगुणा को 43,354 जबकि नवतेज पाल सिंह को 32,416 वोट मिले।
इसलिए 2027 में भाजपा के सामने अपनी सीट बचाने की चुनौती जरूर होगी, लेकिन कांग्रेस के सामने उससे बड़ी चुनौती ऐसा उम्मीदवार चुनने की होगी जो मौजूदा विधायक के व्यक्तिगत प्रभाव, संगठन और चुनावी मशीनरी के सामने प्रभावी मुकाबला खड़ा कर सके।
क्या बलवंत सिंह बोहरा हो सकते हैं कांग्रेस का विकल्प?
बलवंत सिंह बोहरा को लेकर कांग्रेस के भीतर चर्चा का आधार उनका लंबा राजनीतिक अनुभव बताया जा रहा है। समर्थकों का दावा है कि उन्होंने 1980 और 1990 के दशक से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और कुमाऊं क्षेत्र में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ काम किया।
उनका राजनीतिक संपर्क हल्द्वानी, नैनीताल से लेकर ऊधम सिंह नगर तक रहा है। यही वजह है कि सितारगंज में उनकी संभावित उम्मीदवारी को केवल एक विधानसभा सीट का टिकट नहीं, बल्कि पूरे जिले में कांग्रेस के पुराने राजनीतिक नेटवर्क को सक्रिय करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
बोहरा के समर्थकों का मानना है कि उनका सबसे बड़ा राजनीतिक आधार उनका लंबा अनुभव, स्थानीय लोगों से संपर्क और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संवाद की क्षमता हो सकती है।
पर्वतीय मतदाताओं पर नजर
सितारगंज के चुनावी समीकरण में पर्वतीय मूल के मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। बोहरा के समर्थकों का दावा है कि विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में पर्वतीय मतदाता हैं और इनमें भाजपा का परंपरागत प्रभाव रहा है।
ऐसे में कांग्रेस यदि किसी ऐसे चेहरे को मैदान में उतारती है जो पर्वतीय और मैदानी दोनों समाजों के बीच संवाद स्थापित कर सके तो चुनावी समीकरण बदलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
यहीं से बलवंत सिंह बोहरा की संभावित उम्मीदवारी को लेकर कांग्रेस समर्थकों का तर्क मजबूत होता है।
नारायण पाल का राजनीतिक सफर भी चर्चा में
सितारगंज की राजनीति में नारायण पाल का नाम भी लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। वे 2002 और 2007 में बसपा के टिकट पर लगातार दो बार विधायक चुने गए। 2002 में उनकी जीत बेहद बड़ी रही और बाद में उन्हें विधानसभा में बसपा विधायक दल का नेता भी बनाया गया।
2007 में भी उन्होंने जीत दर्ज की। हालांकि 2012 में भाजपा के किरण चंद मंडल ने उन्हें पराजित कर दिया। 2022 में नारायण पाल ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और चौथे स्थान पर रहे।
यही राजनीतिक पृष्ठभूमि यह सवाल खड़ा करती है कि 2027 में कांग्रेस किस चेहरे को प्राथमिकता देती है और किस सामाजिक एवं राजनीतिक समीकरण के साथ चुनाव मैदान में उतरती है।
सामान्य सीट पर सामान्य चेहरे की बहस
सितारगंज सामान्य श्रेणी की सीट है। ऐसे में कांग्रेस के भीतर संभावित उम्मीदवारों को लेकर यह राजनीतिक तर्क भी सामने आ रहा है कि पार्टी को ऐसे चेहरे पर दांव लगाना चाहिए जिसकी स्वीकार्यता व्यापक सामाजिक दायरे में हो।
बलवंत सिंह बोहरा के समर्थक इसी बिंदु को उनकी ताकत बताते हैं। उनका कहना है कि बोहरा को टिकट मिलने पर कांग्रेस पुराने संगठनात्मक संपर्कों, पर्वतीय मतदाताओं और स्थानीय सामाजिक समीकरणों को एक मंच पर ला सकती है।
हालांकि यह अभी राजनीतिक विश्लेषण और संभावनाओं का विषय है। कांग्रेस ने 2027 के लिए सितारगंज से किसी उम्मीदवार के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
सौरभ बनाम बोहरा—क्या बन सकता है बड़ा मुकाबला?
यदि 2027 में भाजपा सौरभ बहुगुणा को और कांग्रेस बलवंत सिंह बोहरा को मैदान में उतारती है तो सितारगंज का चुनाव दिलचस्प राजनीतिक मुकाबले में बदल सकता है।
एक ओर सौरभ बहुगुणा के पास लगातार दो चुनाव जीतने का रिकॉर्ड, भाजपा का मजबूत संगठन और अपना व्यक्तिगत जनाधार है। दूसरी ओर बलवंत सिंह बोहरा के पास दशकों का राजनीतिक अनुभव, कांग्रेस के पुराने नेटवर्क और विभिन्न सामाजिक समूहों से संपर्क का दावा है।
यानी मुकाबला एक तरफ स्थापित राजनीतिक प्रभाव और दूसरी तरफ लंबे राजनीतिक अनुभव के बीच दिखाई दे सकता है।
कांग्रेस के लिए सितारगंज क्यों महत्वपूर्ण?
ऊधम सिंह नगर की राजनीति में सितारगंज का महत्व केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं है। यहां का चुनावी परिणाम जिले की व्यापक राजनीतिक दिशा को प्रभावित कर सकता है।
यदि कांग्रेस किसी मजबूत चेहरे के साथ सितारगंज में भाजपा को कड़ी चुनौती देती है तो इसका असर आसपास की सीटों पर भी पड़ सकता है। बोहरा समर्थक तो यहां तक मानते हैं कि मजबूत उम्मीदवार के जरिए कांग्रेस पूरे ऊधम सिंह नगर में अपना चुनावी अभियान नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा सकती है।
लेकिन चुनावी राजनीति में केवल उम्मीदवार का नाम पर्याप्त नहीं होता। संगठन, बूथ प्रबंधन, स्थानीय मुद्दे, सामाजिक समीकरण, प्रत्याशी की स्वीकार्यता और चुनाव के समय की राजनीतिक परिस्थितियां भी परिणाम तय करती हैं।
2027 की पटकथा अभी बाकी
सितारगंज में 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात बिछने लगी है। भाजपा के सामने अपनी लगातार जीत का सिलसिला बनाए रखने की चुनौती होगी तो कांग्रेस के सामने ऐसा प्रत्याशी चुनने की चुनौती होगी जो मुकाबले को एकतरफा न रहने दे।
अगर कांग्रेस ने बलवंत सिंह बोहरा जैसे पुराने और अनुभवी चेहरे पर दांव लगाया तो सितारगंज में चुनावी मुकाबला निश्चित रूप से रोचक हो सकता है। वहीं सौरभ बहुगुणा के सामने यह साबित करने की चुनौती होगी कि उनका व्यक्तिगत जनाधार और भाजपा का संगठन तीसरी बार भी सीट को सुरक्षित रख सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या कांग्रेस सितारगंज में पुराने राजनीतिक धुरंधर बलवंत सिंह बोहरा पर दांव खेलेगी, या किसी नए चेहरे को मैदान में उतारेगी?
राजनीतिक मिशन 2027 में सितारगंज की अगली कहानी इसी फैसले से लिखी जा सकती है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | राजनीतिक विश्लेषण
