उत्तराखंड रुद्रपुर। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की प्रस्तावित ‘यात्रा’ को लेकर पार्टी नेतृत्व की नाराजगी सामने आई है, वहीं भाजपा ने दिनेश आर्य को राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर संगठन, सरकार और सामाजिक समीकरणों को साधने का संकेत दिया है। इसी बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में चंपावत जिले के बनबसा में हुई कैबिनेट बैठक में 24 महत्वपूर्ण फैसलों को मंजूरी देकर सरकार ने युवाओं, पहाड़, रोजगार, भूमि अधिकार और विकास के मुद्दों को चुनावी एजेंडे के केंद्र में ला दिया है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
इन तीनों घटनाक्रमों को एक साथ देखा जाए तो उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां अब स्पष्ट रूप से जमीन पर दिखाई देने लगी हैं। एक तरफ कांग्रेस संगठन को एकजुट रखने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी ओर भाजपा सरकार अपने फैसलों के जरिए चुनाव से पहले जनता के बीच विकास और सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश मजबूत करने में जुटी है।
हरीश रावत की ‘यात्रा’ पर कांग्रेस का ब्रेक
कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव एवं उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को प्रदेश में अपनी ‘यात्रा’ आगे नहीं बढ़ाने की सलाह दी है। एक अक्टूबर को लिखे पत्र में सैलजा ने रावत के कुछ हालिया बयानों पर भी नाराजगी जताई और कहा कि विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पार्टी का एकजुट होकर काम करना जरूरी है।
सैलजा के अनुसार उन्हें जानकारी मिली है कि हरीश रावत प्रदेश में यात्रा निकाल रहे हैं, लेकिन इस संबंध में न तो प्रदेश प्रभारी से चर्चा की गई और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष को इसकी जानकारी दी गई। पार्टी नेतृत्व का तर्क है कि चुनावी समय में किसी भी प्रकार का समानांतर कार्यक्रम संगठन की सामूहिक रणनीति को प्रभावित कर सकता है।
कांग्रेस के भीतर यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हरीश रावत उत्तराखंड की राजनीति में पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रदेश की राजनीति पर गहरा प्रभाव छोड़ा है और चुनावी दौर में उनकी सक्रियता का अपना राजनीतिक महत्व है।
अब सवाल यह है कि क्या रावत पार्टी नेतृत्व के निर्देश के बाद अपनी यात्रा रोकेंगे या फिर इसे किसी नए राजनीतिक स्वरूप में आगे बढ़ाएंगे। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले पार्टी के भीतर नेतृत्व, प्रत्याशी चयन और चुनावी रणनीति को लेकर किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मतभेद विपक्ष को राजनीतिक अवसर दे सकता है।
दिनेश आर्य को राज्यसभा टिकट, धामी की भूमिका पर चर्चा
दूसरी ओर भाजपा ने उत्तराखंड की रिक्त हो रही राज्यसभा सीट के लिए दिनेश आर्य को उम्मीदवार बनाया है। आर्य लंबे समय तक भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं और 2021 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जनसंपर्क अधिकारी के रूप में भी कार्य कर चुके हैं।
इसके अलावा वह भाजपा के नैनीताल जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं तथा अनुसूचित जाति मोर्चे में राष्ट्रीय स्तर पर भी काम कर चुके हैं। वर्तमान में उन्हें उत्तराखंड सरकार में राज्य मंत्री स्तर का दर्जा प्राप्त पद पर होने की जानकारी सामने आई है।
आर्य की उम्मीदवारी के बाद भाजपा के भीतर और बाहर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पसंद को एक बार फिर केंद्रीय नेतृत्व का समर्थन मिला है। हालांकि भाजपा की ओर से आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा गया है कि आर्य का चयन केवल मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत पसंद के आधार पर हुआ है। अंतिम निर्णय केंद्रीय चुनाव समिति ने लिया है।
भाजपा में राज्यसभा उम्मीदवार के चयन को लेकर कई नामों पर चर्चा हुई थी और प्रदेश स्तर से नामों का पैनल केंद्रीय नेतृत्व को भेजे जाने की बात सामने आई थी। इनमें से दिनेश आर्य के नाम पर अंतिम मुहर लगी।
सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण
दिनेश आर्य के चयन का राजनीतिक महत्व केवल उनके संगठनात्मक अनुभव तक सीमित नहीं माना जा रहा है। वह कुमाऊं क्षेत्र से आते हैं और अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित हैं। ऐसे में भाजपा के इस निर्णय को सामाजिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ भाजपा के सामने सरकार के कामकाज के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों को मजबूत रखने की चुनौती है। ऐसे में राज्यसभा उम्मीदवार का चयन भी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
मौजूदा राज्यसभा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है और रिक्त होने वाली सीट के लिए 16 अक्टूबर को मतदान प्रस्तावित है। आर्य की उम्मीदवारी के बाद राज्यसभा चुनाव से ज्यादा चर्चा अब इस बात की हो रही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व को किस तरह राजनीतिक लाभ में बदलती है।
बनबसा कैबिनेट: पहाड़, युवा और रोजगार पर फोकस
इसी राजनीतिक माहौल के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में चंपावत जिले के बनबसा में राज्य गठन के बाद पहली बार जिलास्तर पर कैबिनेट बैठक आयोजित की गई। बैठक में 24 महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई।
सरकार ने इस बैठक के जरिए दूरस्थ और सीमांत क्षेत्रों तक शासन की पहुंच का संदेश देने का प्रयास किया। कैबिनेट के फैसलों में युवाओं के कौशल विकास, रोजगार, सौर ऊर्जा, भूमि अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय शामिल रहे।
सबसे प्रमुख फैसलों में मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा कौशल संवर्धन योजना को मंजूरी देना शामिल है। अगले पांच वर्षों में इस योजना पर करीब 200 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इसके माध्यम से लगभग 1.19 लाख युवाओं को आधुनिक और रोजगारपरक कौशल का प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है।
युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ड्रोन तकनीक, जीआईएस मैपिंग, डिजिटल मार्केटिंग, मशरूम उत्पादन, ईको-टूरिज्म, सोलर पैनल मेंटेनेंस और वर्कप्लेस इंग्लिश जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाएगा। ऑनलाइन, ऑफलाइन और हाइब्रिड माध्यम से प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी।
पहाड़ों में सोलर प्लांट और स्वरोजगार
कैबिनेट ने मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना को भी आगे बढ़ाने का फैसला किया है। पहाड़ी क्षेत्रों की खाली और बंजर जमीन पर सोलर प्लांट लगाने को प्रोत्साहित किया जाएगा।
चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में सौर ऊर्जा के नए अवसर पैदा करने की योजना है। सरकार के अनुसार पहले चरण में 250 मेगावाट का लक्ष्य रखा गया था, जिसके मुकाबले लगभग 210 मेगावाट क्षमता के प्लांट लगाए जा चुके हैं।
यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो इससे पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है।
पट्टेदारों को भूमिधरी अधिकार का फैसला अहम
भूमि अधिकार से जुड़ा फैसला भी कैबिनेट के प्रमुख निर्णयों में रहा। वर्ग-3 और वर्ग-4 की जमीन के पट्टेदारों को भूमिधरी अधिकार देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा कुछ स्थानीय क्षेत्रों में पट्टेदारों और कब्जाधारकों से जुड़े भूमि अधिकारों को लेकर भी निर्णय लिए गए हैं।
यह फैसला लंबे समय से भूमि अधिकार की प्रतीक्षा कर रहे लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि शासनादेश और जमीन पर लागू होने वाली प्रक्रिया कितनी सरल और पारदर्शी रहती है।
स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर भी फैसले
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेजिडेंट, जूनियर रेजिडेंट और डेमोंस्ट्रेटर के वेतन एवं मानदेय के पुनर्निर्धारण को भी मंजूरी दी गई है। सरकार का उद्देश्य मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाना और चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करना है।
इसके अलावा निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना से जुड़े मानकों में संशोधन, पर्वतीय क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालयों के लिए निर्मित क्षेत्र संबंधी मानकों में बदलाव, पंतनगर एयरपोर्ट विस्तार, वन भूमि हस्तांतरण के लिए परियोजना प्रबंधन इकाई, कर्मचारियों की खरीद सीमा तथा पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी जैसे कई फैसले भी लिए गए।
चुनाव से पहले तीन बड़े राजनीतिक संकेत
उत्तराखंड की मौजूदा राजनीति में इन तीन घटनाओं से तीन अलग-अलग संदेश निकलते हैं। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता है। हरीश रावत जैसे वरिष्ठ नेता की सक्रियता को लेकर केंद्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप बताता है कि पार्टी चुनाव से पहले समानांतर राजनीतिक गतिविधियों को लेकर सतर्क है।
भाजपा के लिए दिनेश आर्य की राज्यसभा उम्मीदवारी संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और मुख्यमंत्री धामी के साथ समन्वय का संदेश देती है। वहीं बनबसा कैबिनेट के फैसले सरकार की चुनावी रणनीति में युवा, रोजगार, पहाड़ और भूमि अधिकार जैसे मुद्दों की प्राथमिकता को सामने लाते हैं।
आने वाले महीनों में दोनों प्रमुख दलों के सामने अपनी-अपनी राजनीतिक चुनौतियां हैं। कांग्रेस को अंदरूनी मतभेदों को नियंत्रित कर मजबूत विपक्षी अभियान खड़ा करना होगा, जबकि भाजपा को सरकार के फैसलों को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू कर उनका राजनीतिक लाभ जनता तक पहुंचाना होगा।
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी कुछ दूर है, लेकिन उसकी राजनीतिक पटकथा लिखी जानी शुरू हो गई है। हरीश रावत की यात्रा पर कांग्रेस का नियंत्रण, दिनेश आर्य के जरिए भाजपा का सामाजिक-संगठनात्मक संदेश और बनबसा कैबिनेट के 24 फैसले इस बात के संकेत हैं कि चुनावी मुकाबले की जमीन अब तेजी से तैयार हो रही है।
