जसपुर से हल्द्वानी तक हरदा का कारवां: ‘उठो दगड़ियो, मुछाल जलाओ’ के संदेश के साथ कांग्रेस की सियासी जमीन पर लौटने की दस्तकजसपुर से हल्द्वानी तक हरदा का कारवां: ‘उठो दगड़ियो, मुछाल जलाओ’ के संदेश के साथ कांग्रेस की सियासी जमीन पर लौटने की दस्तक


रुद्रपुर/हल्द्वानी। उत्तराखंड की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का “धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा” अभियान अब महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रह गया है। जसपुर से शुरू होकर काशीपुर, रामनगर, कालाढूंगी और हल्द्वानी तक पहुंचे इस कारवां ने कांग्रेस के भीतर और प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हरीश रावत की राजनीतिक सक्रियता, जनस्वीकार्यता और संगठन के पुराने नेटवर्क को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यात्रा के दौरान जगह-जगह उमड़ी भीड़, कार्यकर्ताओं का उत्साह, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वागत और देर रात तक लोगों का इंतजार इस बात का संकेत देता है कि हरीश रावत अभी भी उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में एक प्रभावशाली और व्यापक स्वीकार्यता रखने वाले चेहरों में शामिल हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


द्वारिकेश चीनी मिल के गेस्ट हाउस में विश्राम के दौरान हरीश रावत ने जिस पुराने सर्वोदयी गीत—“उठो दगड़ियो, मुछाल जलाओ”—को याद किया, उसने उनकी मौजूदा राजनीतिक यात्रा को एक प्रतीकात्मक अर्थ भी दे दिया। रावत के शब्दों में मशाल अंधकार को चीरती है और रोशनी तथा विश्वास पैदा करती है। बेरोजगारी, नशे, अपराध, महिलाओं के खिलाफ बढ़ती घटनाओं और सामाजिक असहिष्णुता जैसे मुद्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज की परिस्थितियां समाज और राजनीति दोनों के सामने चुनौती खड़ी कर रही हैं।
यही वजह है कि “धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा” को रावत केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि जनता के बीच लौटने और संवाद स्थापित करने के अभियान के तौर पर पेश कर रहे हैं।
बीमारी से उबरने के बाद राजनीतिक मैदान में वापसी
हरीश रावत ने यात्रा के दौरान अपने स्वास्थ्य को लेकर भी खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि मेदांता के चिकित्सकों की सलाह के अनुसार उन्हें अभी लगभग डेढ़ महीने आराम करना था। उनके मुताबिक, स्वास्थ्य पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ था, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें घर में बैठे रहने की अनुमति नहीं दी।
रावत ने कहा कि ईडी और भाजपा की ओर से पैदा हुई चुनौती ने उन्हें सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना था कि यदि वे अत्यधिक रुग्ण अवस्था में भी होते, तब भी इस तरह की राजनीतिक “ललकार” के बाद चुप बैठना उनके लिए संभव नहीं होता।
उन्होंने अपने स्वास्थ्य लाभ में उत्तराखंड की जनता की सद्भावनाओं और देवी-देवताओं के आशीर्वाद को भी महत्वपूर्ण बताया। रावत के अनुसार, बीमारी के दौरान उत्तराखंड के हजारों लोग दिल्ली और गुरुग्राम तक उनसे मिलने पहुंचे। कई लोगों ने इलाज और घर के खर्च के लिए आर्थिक मदद भी की।
यही अनुभव अब उनके “धन्यवाद” अभियान का आधार बना है। रावत का कहना है कि जिस जनता ने बीमारी के समय उनका साथ दिया, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना उनका दायित्व है।
‘मैं अकेला नहीं हूं’—ईडी और सीबीआई को लेकर रावत का संदेश
यात्रा के दौरान हरीश रावत ने ईडी और सीबीआई की कार्रवाई को लेकर भी अपनी बात बेहद स्पष्ट शब्दों में रखी। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों से जूझने के लिए वह अकेले नहीं हैं और उत्तराखंड की जनता उनके साथ खड़ी है।
रावत ने चंदन जीना के घर ईडी की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए अपने पुराने सहयोगी का बचाव किया। उन्होंने कहा कि चंदन जीना लंबे समय से उनके साथ जुड़े रहे हैं और उनके प्रति निष्ठा से काम करते रहे हैं।
रावत ने जांच एजेंसियों को चुनौती देते हुए अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल की भी जांच कराने की बात कही। उन्होंने कहा कि यदि उनके कार्यकाल में कोई गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने अपने तीन वर्ष के मुख्यमंत्री कार्यकाल से जुड़ी फाइलों और निर्णयों की जांच के लिए आयोग गठित करने की मांग तक कर दी।
उनका कहना था कि उनका सार्वजनिक जीवन खुली किताब है और यदि किसी को संदेह है तो उनके पूरे कार्यकाल की जांच कराई जानी चाहिए।
भर्ती और नियुक्तियों पर भी रखा अपना पक्ष
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल के दौरान हुई सरकारी भर्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके तीन वर्ष के कार्यकाल में 42 हजार से अधिक अभ्यर्थियों को सरकारी नौकरी मिली और लगभग 18 हजार पदों के लिए भर्ती का अध्याचन जारी किया गया था।
उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने अधीनस्थ सेवा चयन आयोग, शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और मेडिकल भर्ती बोर्ड जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं को मजबूत करने का प्रयास किया। लोक सेवा आयोग के माध्यम से भी भर्तियां कराई गईं।
हालांकि, रावत ने यह भी स्वीकार किया कि अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर उनसे चूक हुई थी। उन्होंने कहा कि नियुक्त व्यक्ति पद की गरिमा के अनुरूप कार्य नहीं कर सके। रावत ने दावा किया कि उनकी सरकार ने ही इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की थी और परीक्षा संबंधी कार्रवाई के लिए भी कदम उठाए गए थे।
उन्होंने इस चूक के लिए पहले भी माफी मांगने और दोबारा क्षमा मांगने की बात कही।
चंदन जीना प्रकरण पर ‘फुसफुसाहट की राजनीति’ का आरोप
चंदन जीना के घर ईडी की कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं पर भी रावत ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग यह प्रचार कर रहे हैं कि कार्रवाई में मिला धन उनका है। रावत ने इस तरह की चर्चाओं को निराधार बताते हुए कहा कि चंदन जीना वर्षों से उनके साथ काम करते रहे हैं और उनकी अपनी आय तथा मेहनत का भी सम्मान होना चाहिए।
रावत ने अपने आयकर भुगतान का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने इस बार भी पांच लाख रुपये से अधिक आयकर जमा किया है।
उन्होंने कहा कि राजनीति में लंबे समय तक बड़े पदों पर रहने के बावजूद उन्होंने राजनीतिक पद या सरकारी काम दिलाने के बदले किसी से “सर्विस चार्ज” के रूप में पैसा नहीं लिया। उनका दावा है कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में पैसा कमाने के बजाय लोगों का विश्वास और संबंध कमाए।
‘लोग कमाए, पैसा नहीं’—रावत का भावनात्मक संदेश
हरीश रावत के भाषण का सबसे भावनात्मक हिस्सा वह रहा, जिसमें उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन और जनता से संबंधों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा—“हमने लोग कमाए, हमने पैसा नहीं कमाया।”
यह लाइन अब उनकी यात्रा के राजनीतिक संदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।
रावत ने उत्तराखंड की जनता से अपील की कि जिस तरह उन्होंने बीमारी के दौरान उनका साथ दिया, उसी तरह अब उनके खिलाफ चलाए जा रहे कथित दुष्प्रचार का भी जवाब दें।
उन्होंने कहा कि उनका सार्वजनिक जीवन लगभग छह दशक के सामाजिक और राजनीतिक अनुभव से जुड़ा है और आज जिस तरह उनके ऊपर आरोप लगाए जा रहे हैं, उससे वह आहत हैं।
रावत ने यहां तक कहा कि यदि जनता उनकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगी तो उत्तराखंड के देवी-देवता उनकी रक्षा करेंगे।
जसपुर से शुरू हुआ कारवां, रास्ते में जुड़ता गया जनसमर्थन
“धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा” की शुरुआत जसपुर के हीरा गार्डन से हुई। यहां पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह, चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष, विधायक आदेश चौहान, पूर्व सांसद, पूर्व विधायक और बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता मौजूद रहे।
जसपुर में रावत का फूल-मालाओं से स्वागत हुआ। सुभाष चौक पहुंचकर उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।
इसके बाद कारवां काशीपुर की ओर बढ़ा। रास्ते में स्थानीय लोगों, किसानों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया। काशीपुर के गन्ना समिति गेस्ट हाउस में भी कार्यकर्ताओं और क्षेत्रवासियों ने गर्मजोशी से उनका अभिनंदन किया।
इसके बाद यात्रा रामनगर की ओर बढ़ी, जहां रावत के पहुंचने पर समर्थकों की बड़ी संख्या दिखाई दी। रामनगर के बाद कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र, चकलुवा और लामाचौड़ तक कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी ने यात्रा को लगातार गति दी।
रात देर तक लोग सड़क किनारे खड़े होकर रावत के काफिले का इंतजार करते दिखाई दिए। रावत ने इस स्नेह को अपनी राजनीतिक ताकत बताया।
सैकड़ों वाहनों का काफिला और सोशल मीडिया पर चर्चा
जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा के दौरान रावत के साथ वाहनों का लंबा काफिला चलता दिखाई दिया। उनके समर्थकों ने दावा किया कि सैकड़ों गाड़ियां यात्रा के साथ आगे बढ़ रही थीं।
सोशल मीडिया पर भी यात्रा को लेकर सक्रियता देखने को मिली। “कुमाऊं में हरदा” जैसे हैशटैग ट्रेंड होने की बात समर्थकों की ओर से सामने आई।
राजनीतिक दृष्टि से इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि कांग्रेस लंबे समय से उत्तराखंड में संगठनात्मक एकजुटता और नेतृत्व के सवालों से जूझती रही है। ऐसे समय में रावत का सीधे जनता के बीच जाना पार्टी के लिए एक अलग राजनीतिक ऊर्जा पैदा करता दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस की सर्वमान्यता का चेहरा?
उत्तराखंड कांग्रेस में हरीश रावत की भूमिका को लेकर लंबे समय से राजनीतिक बहस चलती रही है। पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़ों और नेताओं के बीच मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं। लेकिन रावत की राजनीतिक यात्रा का एक पहलू यह भी है कि वह कांग्रेस के लगभग हर वर्ग से संवाद स्थापित करने की क्षमता रखते हैं।
उनकी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनका जनसंपर्क माना जाता है। पहाड़ से लेकर मैदान तक और कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक उनका राजनीतिक नेटवर्क दशकों पुराना है।
यही कारण है कि मौजूदा यात्रा में उनके साथ अलग-अलग पीढ़ियों के कांग्रेस नेता दिखाई दे रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं से लेकर युवा विधायकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं तक की मौजूदगी यह संदेश देती है कि रावत अभी भी कांग्रेस की राजनीति में ऐसा चेहरा हैं, जिसे व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता हासिल है।
हल्द्वानी में स्वराज आश्रम पहुंचने पर युवा विधायक सुमित हृदयेश और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने छोलिया नृत्य तथा ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया। यात्रा का समापन स्वराज आश्रम में आयोजित सभा से हुआ।
2027 के लिए राजनीतिक संदेश साफ
इस पूरी यात्रा में हरीश रावत ने एक बात लगातार दोहराई—2027 में कांग्रेस को वापस लाना है।
उनके भाषणों में “जनसंवाद”, “उत्तराखंड का हक”, “जनता का विश्वास” और “बदलाव” जैसे शब्द लगातार दिखाई दिए।
रावत की रणनीति को देखा जाए तो यह यात्रा केवल धन्यवाद देने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए वह कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, जनता से सीधा संवाद स्थापित करने और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक माहौल तैयार करने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं।
उनका संदेश साफ है कि बीमारी, उम्र या जांच एजेंसियों से जुड़े राजनीतिक दबाव उन्हें सक्रिय राजनीति से पीछे नहीं हटाएंगे।
‘उठो दगड़ियो, मुछाल जलाओ’—क्या यह 2027 का राजनीतिक संकेत है?
द्वारिकेश चीनी मिल के गेस्ट हाउस में रात को याद किया गया सर्वोदयी गीत इस यात्रा का सबसे प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश बनकर सामने आया है।
“उठो दगड़ियो, मुछाल जलाओ”—अर्थात उठो साथियों, मशाल जलाओ।
उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन, नशा, अपराध, महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। रावत इन्हीं मुद्दों को अपने पुराने आंदोलनकारी तेवर और जनसंवाद की राजनीति से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
उनकी राजनीतिक भाषा में अब “मशाल” केवल एक गीत की पंक्ति नहीं है। यह उस राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक है, जिसे वह 2027 की लड़ाई के लिए जरूरी मानते हैं।
कांग्रेस के लिए रावत की यात्रा क्यों महत्वपूर्ण?
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। भाजपा जहां संगठन और सरकार के स्तर पर चुनावी रणनीति को मजबूत करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और प्रभावी चुनावी नेतृत्व का सवाल है।
ऐसे दौर में हरीश रावत की जनसंवाद यात्रा कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल एक यात्रा 2027 का चुनावी समीकरण बदल देगी। मगर यह जरूर कहा जा सकता है कि जसपुर से हल्द्वानी तक का यह सफर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करने में सफल रहा है।
हरीश रावत की राजनीतिक शैली का आधार हमेशा जनता से सीधा संवाद, स्थानीय मुद्दों की पकड़ और भावनात्मक जुड़ाव रहा है। इस यात्रा में भी वही शैली दिखाई दी।
अब सवाल 2027 का
उत्तराखंड की राजनीति में हरदा का यह नया अभियान कई सवाल छोड़ गया है।
क्या कांग्रेस हरीश रावत की जनस्वीकार्यता को संगठन की सामूहिक ताकत में बदल पाएगी?
क्या पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच मौजूद मतभेद खत्म होकर एक साझा चुनावी रणनीति बन पाएगी?
क्या जसपुर से हल्द्वानी तक दिखाई दिया जनसमर्थन 2027 के मतदान केंद्रों तक पहुंच पाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या कांग्रेस हरीश रावत के जनसंवाद को सत्ता परिवर्तन की राजनीतिक लहर में बदल पाएगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे।
फिलहाल इतना जरूर है कि बीमारी से उबरने के बाद हरीश रावत फिर सड़क पर हैं। उनके साथ कांग्रेस का पुराना कारवां है, युवा कार्यकर्ताओं का उत्साह है और जनता से संवाद की वही पुरानी शैली है।
द्वारिकेश चीनी मिल के गेस्ट हाउस में रात के सन्नाटे में याद किया गया गीत अब राजनीतिक गलियारों में भी सुनाई दे रहा है—
“उठो दगड़ियो, मुछाल जलाओ।”
उत्तराखंड की राजनीति में यह मशाल कितनी दूर तक रोशनी करती है, इसका फैसला जनता करेगी। मगर 2027 की लड़ाई से पहले हरीश रावत ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि वह अभी राजनीतिक मैदान छोड़ने के मूड में नहीं हैं।
जसपुर से हल्द्वानी तक चला कारवां अब उत्तराखंड की सियासत में एक सवाल छोड़ गया है—क्या हरदा की मशाल कांग्रेस के लिए 2027 की राह रोशन करेगी?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | विशेष राजनीतिक कवरेज अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर