फॉर्म-6 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से घिरा चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का मोर्चा; तीन दशक पुराना भाजपा-बीजेडी रिश्ता भी दरका


नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर राजनीतिक तथा संवैधानिक सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर सोमवार, 5 अक्टूबर को ऐसी टिप्पणी की, जिसने चुनाव आयोग के 26 सितंबर के उस दावे पर सवाल खड़े कर दिए जिसमें आयोग ने कहा था कि एसआईआर के लिए फॉर्म-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। दूसरी ओर 6 अक्टूबर को इसी मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने दिल्ली में संसद भवन से निर्वाचन भवन तक मार्च निकालकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड


इस पूरे घटनाक्रम में एक और राजनीतिक मोड़ तब आया जब ओडिशा में लंबे समय तक भाजपा की सहयोगी रही बीजू जनता दल यानी बीजेडी भी विपक्षी सांसदों के मार्च में शामिल हो गई। इससे राष्ट्रीय राजनीति में यह सवाल उठने लगा है कि क्या नवीन पटनायक की पार्टी भाजपा से अपनी करीब तीन दशक पुरानी राजनीतिक निकटता से निर्णायक दूरी की ओर बढ़ रही है?
फॉर्म-6 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से बढ़ी हलचल
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष एसआईआर और चुनाव आयोग से संबंधित दो याचिकाओं पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान फॉर्म-6 में किए गए बदलाव का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया।
फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। एसआईआर के दौरान इसके प्रारूप में बदलाव करते हुए नए मतदाताओं से यह जानकारी मांगी गई कि उनका या उनके माता-पिता का नाम पिछली एसआईआर के बाद तैयार मतदाता सूची में था या नहीं।
सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि इस तरह का बदलाव सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर नहीं किया था। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद वह यह देखना चाहती है कि आखिर फॉर्म में यह बदलाव किसने किया।
यही टिप्पणी चुनाव आयोग के 26 सितंबर के प्रेस नोट से अलग दिखाई देती है। आयोग ने अपने बयान में कहा था कि एसआईआर के लिए फॉर्म-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। अब अदालत की टिप्पणी के बाद इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की व्याख्या किस आधार पर की थी।
चुनाव आयोग के भीतर फैसलों पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद एसआईआर से जुड़े कई फैसले एकतरफा लिए।
बिहार के सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयं को व्हिसलब्लोअर बताने वाले राकेश कुमार सिंह ने अपनी याचिका में चुनाव आयोग के अंदरूनी रिकॉर्ड अदालत के सामने प्रस्तुत करने की मांग की है। इसमें बैठकों की कार्यवाही और आईटी लॉग जैसे दस्तावेज शामिल हैं।
याचिका का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग को प्रभावी रूप से एक सदस्यीय प्राधिकरण की तरह संचालित किया। याचिका में यह भी मांग की गई है कि यदि एसआईआर और उससे जुड़े फैसलों के लिए आवश्यक कानूनी अधिकार नहीं पाया जाता है तो पूरी प्रक्रिया तथा उसके तहत की गई कार्रवाई को रद्द घोषित किया जाए।
दूसरी याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर की गई है। इसमें ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित रूप से लिए गए एकतरफा फैसलों को असंवैधानिक और गैरकानूनी घोषित करने की मांग की गई है। साथ ही एसआईआर से पहले के मूल फॉर्म-6 को बहाल करने और कथित तौर पर गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के नाम फिर जोड़ने की मांग भी की गई है।
याचिका में देशभर की मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की न्यायिक जांच की मांग भी की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कार्रवाई से किया इनकार
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अंतरिम आदेश की मांग करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने तथा तीसरे चुनाव आयुक्त की नियुक्ति तक आयोग को अन्य दो आयुक्तों के साथ संचालित करने की मांग की।
हालांकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने तत्काल ऐसा कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया।
सीजेआई ने कहा कि अदालत केवल अखबारों में प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकती। अदालत को प्रमाणित जानकारी चाहिए। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अभी स्वतः सही मानकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता और संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
अदालत ने चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। अब आयोग तथा संबंधित अधिकारी इन आरोपों पर अपना जवाब देंगे।
दिल्ली में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के अगले ही दिन 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक विरोध सड़क पर उतर आया। विपक्षी दलों के सांसदों ने संसद भवन से निर्वाचन भवन तक मार्च निकाला। पुलिस ने मार्च को बीच में रोक दिया।
इसके बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। करीब नौ घंटे तक दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं और बाद में पुलिस ने राहुल गांधी को हिरासत में ले लिया।
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता से जुड़े गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है।
हालांकि सरकार और चुनाव आयोग की ओर से लगाए गए आरोपों का अंतिम कानूनी निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी तत्काल किसी आरोप को प्रमाणित नहीं माना है। इसलिए आने वाले दिनों में अदालत में पेश होने वाले रिकॉर्ड और चुनाव आयोग के जवाब इस विवाद की दिशा तय करेंगे।
विपक्ष के साथ खड़ी हुई बीजेडी, बदली राजनीति का संकेत?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू ओडिशा की बीजू जनता दल का विपक्षी मार्च में शामिल होना रहा। नवीन पटनायक ने अपनी पार्टी के राज्यसभा सांसद मनस मंगराज और सुलता देव को विपक्षी सांसदों के मार्च में भेजा।
बीजेडी ने स्पष्ट किया है कि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी है। पार्टी का कहना है कि वह एक जिम्मेदार विपक्षी दल के रूप में चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दे पर प्रदर्शन में शामिल हुई है।
फिर भी राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा और बीजेडी के बीच संबंध करीब तीन दशक पुराने रहे हैं।
1997 से शुरू हुई दोस्ती
बीजेडी की स्थापना 1997 में नवीन पटनायक ने अपने पिता और ओडिशा के दिग्गज नेता बीजू पटनायक की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए की थी। इसके बाद पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया।
1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने मिलकर लड़े। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में बीजेडी भी शामिल रही। ओडिशा में भी भाजपा और बीजेडी गठबंधन ने 2000 के विधानसभा चुनाव में सफलता हासिल की और नवीन पटनायक पहली बार मुख्यमंत्री बने।
करीब एक दशक तक दोनों दलों की राजनीतिक साझेदारी मजबूत रही। लेकिन 2009 में सीट बंटवारे को लेकर मतभेद के बाद गठबंधन टूट गया। इसके बाद नवीन पटनायक ने भाजपा और कांग्रेस दोनों से समान दूरी बनाए रखने की रणनीति अपनाई।
केंद्र की राजनीति में हालांकि बीजेडी कई मौकों पर भाजपा सरकार के महत्वपूर्ण मुद्दों पर समर्थन देती रही। यही वजह थी कि औपचारिक गठबंधन खत्म होने के बाद भी दोनों दलों के बीच राजनीतिक संवाद और समीकरण बने रहे।
2024 के बाद बदल गया समीकरण
2024 का विधानसभा चुनाव ओडिशा की राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने नवीन पटनायक के करीब 24 साल लंबे शासन को समाप्त कर दिया और राज्य में अपनी सरकार बनाई। लोकसभा चुनाव में भी बीजेडी को भारी झटका लगा और पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी।
इसके बाद भाजपा और बीजेडी के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ती दिखाई दी। बीजेडी ने केंद्र की नीतियों पर सवाल उठाने शुरू किए और कई मुद्दों पर विपक्षी दलों के साथ कदम मिलाया।
चुनाव आयोग को लेकर भी बीजेडी पहले से सवाल उठाती रही है। पार्टी ने 2024 के चुनाव के दौरान मतदान और मतगणना से जुड़े आंकड़ों में अंतर सहित कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा था।
अब जब एसआईआर और चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष ने बड़ा मोर्चा खोला है, तो बीजेडी का उसमें शामिल होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
क्या कांग्रेस के करीब जाएगी बीजेडी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नवीन पटनायक अब कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के करीब जाएंगे?
फिलहाल इसका सीधा जवाब देना जल्दबाजी होगा। बीजेडी ने खुद साफ किया है कि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है। नवीन पटनायक की राजनीति की खासियत भी लंबे समय तक यही रही है कि उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखी।
लेकिन ओडिशा में भाजपा के सत्ता में आने के बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब भाजपा बीजेडी की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुकी है। ऐसे में नवीन पटनायक के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों के साथ मुद्दा आधारित सहयोग राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है।
चुनाव आयोग से ओडिशा तक बदलते समीकरण
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट फॉर्म-6 में बदलाव के रिकॉर्ड की पड़ताल करना चाहता है, दूसरी तरफ विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक सवाल उठा रहा है। इसी बीच बीजेडी का विपक्षी मार्च में शामिल होना यह संकेत दे रहा है कि भारतीय राजनीति में पुराने समीकरण फिर से लिखे जा रहे हैं।
फिलहाल अदालत ने चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही नहीं माना है और आयोग को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। इसलिए कानूनी तस्वीर अभी साफ होना बाकी है। लेकिन राजनीतिक तस्वीर जरूर बदलती दिखाई दे रही है।
एक तरफ फॉर्म-6 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर बहस तेज कर दी है, दूसरी तरफ ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का सड़क पर उतरना और भाजपा की पुरानी सहयोगी बीजेडी का उसके साथ खड़ा होना राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरणों की दस्तक माना जा रहा है। सवाल अब सिर्फ मतदाता सूची का नहीं, चुनावी संस्थाओं पर भरोसे और बदलते राजनीतिक गठबंधनों का भी बन गया है।