रुद्रपुर। पिथौरागढ़ जिले में करीब 400 एचआईवी संक्रमित लोगों के चिह्नित होने की खबर ने उत्तराखंड के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसे अब फाइलों में दबाकर नहीं रखा जा सकता। सवाल केवल पिथौरागढ़ का नहीं है। सवाल यह है कि जब सीमांत जिले में संक्रमण की ऐसी तस्वीर सामने आ रही है तो प्रदेश के मैदानी जिलों—ऊधम सिंह नगर, नैनीताल, हरिद्वार, देहरादून और अन्य जिलों में वास्तविक स्थिति क्या है?
स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार कोरोना काल से पहले पिथौरागढ़ में प्रतिवर्ष करीब 10 से 15 नए एचआईवी संक्रमित सामने आते थे, जबकि अब यह संख्या 25 से अधिक बताई जा रही है। रिपोर्ट में 60 से 75 वर्ष की आयु के 35 संक्रमित बुजुर्गों के चिह्नित होने की बात भी सामने आई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यह आंकड़ा डर पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि जांच और जागरूकता बढ़ाने के लिए चेतावनी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिथौरागढ़ के आंकड़े को पूरे उत्तराखंड की आबादी पर लागू करके 10 प्रतिशत लोगों को एचआईवी संक्रमित मान लेना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। प्रदेश की वास्तविक स्थिति जानने के लिए राज्यस्तरीय आधिकारिक आंकड़े और व्यापक सर्वेक्षण आवश्यक हैं।
लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह खड़ा है—क्या सरकार के पास उत्तराखंड के प्रत्येक जिले की वास्तविक स्थिति का स्पष्ट और अद्यतन आंकड़ा है?
परिषद ने स्पा सेंटरों को लेकर पहले भी उठाई थी आवाज
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद का कहना है कि प्रदेश में स्पा सेंटरों की आड़ में होने वाली संदिग्ध गतिविधियों को लेकर परिषद लंबे समय से आवाज उठाती रही है।
परिषद के अनुसार ऊधम सिंह नगर में ऐसे सेंटरों की संख्या बढ़ने और कुछ स्थानों पर अनैतिक गतिविधियों की शिकायतों के बाद परिषद ने प्रशासन और पुलिस के सामने यह मुद्दा उठाया था। तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार से सीधे वार्ता कर भी इस विषय को रखा गया था।
परिषद का कहना है कि उस समय ऊधम सिंह नगर में पुलिस कार्रवाई के बाद कई संदिग्ध स्पा सेंटर बंद हुए।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल छापेमारी और कुछ दिनों की कार्रवाई से समस्या खत्म हो जाती है?
यदि किसी व्यवसाय के लाइसेंस की आड़ में मानव तस्करी, देह व्यापार या अन्य अवैध गतिविधि चलती है तो उसके खिलाफ स्थायी निगरानी तंत्र होना चाहिए।
दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि हर स्पा सेंटर को अवैध या देह व्यापार का अड्डा मानना गलत होगा। वैध स्पा व्यवसाय और आपराधिक गतिविधि के बीच अंतर करना भी उतना ही जरूरी है।
पिथौरागढ़ की खबर को स्पा सेंटर से सीधे जोड़ना क्यों खतरनाक है?
यहां सबसे बड़ी सावधानी की जरूरत है।
एचआईवी संक्रमण का एकमात्र कारण देह व्यापार या स्पा सेंटर नहीं है। संक्रमण असुरक्षित यौन संपर्क, संक्रमित रक्त, संक्रमित सुई या सिरिंज साझा करने तथा पर्याप्त रूप से निष्फल न किए गए उपकरणों से टैटू या बॉडी पियर्सिंग जैसे कई माध्यमों से हो सकता है।
इसलिए पिथौरागढ़ में सामने आए 400 मामलों को स्पा सेंटरों से जोड़ देना बिना प्रमाण के निष्कर्ष होगा।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि संदिग्ध गतिविधियों वाले प्रतिष्ठानों की जांच न हो।
यदि किसी स्पा सेंटर में अवैध गतिविधि की शिकायत मिलती है तो पुलिस, एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट और प्रशासन को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।
यही सरकार की जिम्मेदारी है।
असली चिंता युवा हैं
पिथौरागढ़ की रिपोर्ट में 20 वर्ष की उम्र के युवाओं के संक्रमित मिलने और कुछ मामलों में नशीली दवाओं के इस्तेमाल तथा संक्रमित सुई से टैटू बनवाने की बात कही गई है।
युवाओं के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण संदेश है।
टैटू बनवाते समय केवल डिजाइन नहीं देखना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि इस्तेमाल होने वाले उपकरण सुरक्षित और उचित तरीके से स्टरलाइज किए गए हैं या नहीं।
इसी तरह नशीली दवाओं के इंजेक्शन के मामले में सुई या सिरिंज साझा करना गंभीर संक्रमण का जोखिम पैदा कर सकता है।
इसलिए सरकार को स्कूल-कॉलेजों में केवल भाषण नहीं, बल्कि व्यावहारिक स्वास्थ्य शिक्षा देनी चाहिए।
विवाह से पहले स्वास्थ्य जांच पर नई बहस जरूरी
उत्तराखंड में अब विवाह-पूर्व स्वास्थ्य जांच को लेकर भी व्यापक जनजागरूकता अभियान की आवश्यकता है।
कई बार पति-पत्नी को विवाह के बाद संक्रमण की जानकारी मिलती है। ऐसी स्थिति पूरे परिवार के लिए मानसिक और सामाजिक संकट पैदा कर सकती है।
इसलिए सरकार को विवाह-पूर्व स्वैच्छिक और गोपनीय स्वास्थ्य जांच तथा काउंसलिंग को प्रोत्साहित करना चाहिए।
एचआईवी जांच को लेकर समाज में आज भी गलत धारणाएं हैं। लोग जांच कराने से डरते हैं कि कहीं समाज उन्हें गलत नजर से न देखे।
यह सोच बदलनी होगी।
जांच कराने वाला व्यक्ति दोषी नहीं है। जांच से बचना समस्या को छिपाना है।
हालांकि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध एचआईवी जांच के लिए बाध्य करना या उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करना समाधान नहीं है। स्वास्थ्य जांच का आधार सहमति, गोपनीयता और चिकित्सकीय परामर्श होना चाहिए।
सरकार बताए—13 जिलों की तस्वीर क्या है?
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद सरकार से पूछती है—
क्या सरकार के पास 13 जिलों का अद्यतन एचआईवी डेटा है?
किस जिले में कितने नए मामले सामने आए?
कितने लोग नियमित उपचार पर हैं?
कितने लोगों की जांच हुई?
युवाओं में संक्रमण की स्थिति क्या है?
प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए जांच और काउंसलिंग की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या सरकार ने उन क्षेत्रों की पहचान की है जहां संक्रमण का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक है?
जब तक इन सवालों के जवाब सार्वजनिक नहीं होते, तब तक केवल अनुमान लगाना समस्या का समाधान नहीं है।
स्पा सेंटरों पर हो पारदर्शी व्यवस्था
परिषद का कहना है कि उत्तराखंड के प्रमुख शहरों में स्पा सेंटरों की नियमित जांच होनी चाहिए।
रुद्रपुर, काशीपुर, हल्द्वानी, हरिद्वार और देहरादून जैसे शहरों में संबंधित विभागों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि—
स्पा सेंटर का लाइसेंस वैध हो।
कर्मचारियों का नियमानुसार सत्यापन हो।
नाबालिगों को काम पर न लगाया जाए।
मानव तस्करी की शिकायत पर तत्काल कार्रवाई हो।
किसी भी अवैध गतिविधि की शिकायत की जांच हो।
शिकायतों पर कार्रवाई का रिकॉर्ड उपलब्ध हो।
स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी नियमों का पालन हो।
यह कार्रवाई किसी व्यवसाय विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि कानून के समान अनुपालन के लिए होनी चाहिए।
चुनाव के समय कार्रवाई, फिर सब शांत?
परिषद का आरोप है कि चुनावी समय में कई बार अवैध गतिविधियों पर प्रशासनिक कार्रवाई दिखाई देती है, लेकिन बाद में वही गतिविधियां दोबारा शुरू होने की शिकायतें सामने आती हैं।
यदि ऐसा कहीं हो रहा है तो यह गंभीर प्रशासनिक सवाल है।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि स्पा सेंटरों की जांच किसी चुनाव, अभियान या विशेष घटना तक सीमित क्यों रहे?
नियमित निरीक्षण पूरे साल क्यों नहीं?
राजस्व प्राप्त होना अपनी जगह है, लेकिन कानून का पालन उससे ऊपर है।
यदि कोई प्रतिष्ठान नियमों के अनुसार चल रहा है तो उसे परेशान नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यदि कानून टूट रहा है तो कार्रवाई भी लगातार होनी चाहिए।
“फुट मसाज” से शुरू हुई बहस को भी समझना होगा
उत्तराखंड में स्पा और फुट मसाज को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस पहले भी सामने आती रही है।
लेकिन फुट मसाज अपने आप में कोई अपराध नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी वैध सेवा की आड़ में अवैध गतिविधियां संचालित हों।
इसलिए पूरे स्पा उद्योग को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा।
सरकार का काम व्यवसाय बंद कराना नहीं, कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई करना है।
एचआईवी संक्रमित व्यक्ति अपराधी नहीं
इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष संक्रमित लोगों की गरिमा है।
एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को समाज से अलग करना, उसका नाम सार्वजनिक करना या उसके चरित्र पर सवाल उठाना गलत है।
आज चिकित्सा विज्ञान के कारण एचआईवी के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए प्रभावी उपचार उपलब्ध है। नियमित उपचार से स्वास्थ्य बेहतर रखा जा सकता है और संक्रमण के प्रसार को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
इसलिए जागरूकता का संदेश साफ होना चाहिए—
एचआईवी से लड़ना है, एचआईवी संक्रमित व्यक्ति से नहीं।
परिषद की मांग—सरकार शुरू करे “जागरूक उत्तराखंड अभियान”
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद सरकार से प्रदेशव्यापी जागरूकता अभियान शुरू करने की मांग करती है।
इस अभियान में युवाओं, कॉलेज छात्रों, औद्योगिक श्रमिकों, प्रवासियों, नवविवाहितों और ग्रामीण क्षेत्रों को शामिल किया जाए।
सरकारी अस्पतालों में एचआईवी जांच और काउंसलिंग को सहज, गोपनीय और सुलभ बनाया जाए।
टैटू सेंटरों और अन्य ऐसे प्रतिष्ठानों में भी स्वच्छता तथा सुरक्षित उपकरणों के नियमों की जांच हो जहां रक्त के संपर्क की संभावना रहती है।
स्पा सेंटरों के लिए भी स्पष्ट नियम और नियमित निरीक्षण व्यवस्था लागू हो।
अब डर नहीं, जांच चाहिए
पिथौरागढ़ के करीब 400 मामलों की खबर को सनसनी में बदलने के बजाय इसे चेतावनी के रूप में लेना चाहिए।
पूरे उत्तराखंड को एचआईवी संक्रमित बताना गलत होगा।
किसी स्पा सेंटर को बिना प्रमाण एचआईवी संक्रमण का स्रोत बताना भी गलत होगा।
लेकिन सरकार से सवाल पूछना बिल्कुल जरूरी है।
यदि जांच बढ़ने से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं तो जांच और बढ़नी चाहिए।
यदि युवाओं में जोखिम है तो युवाओं के बीच जागरूकता बढ़नी चाहिए।
यदि कुछ प्रतिष्ठानों में अवैध गतिविधियां पकड़ी जाती हैं तो वहां लगातार निगरानी होनी चाहिए।
यदि विवाह के बाद संक्रमण का पता चलता है तो विवाह-पूर्व स्वैच्छिक जांच और काउंसलिंग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद का संदेश
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद का कहना है कि राज्य केवल सड़क, भवन और राजस्व से नहीं बनता। राज्य की असली पहचान उसके नागरिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान से होती है।
आज पिथौरागढ़ से आया आंकड़ा सरकार के सामने एक अवसर भी है और चुनौती भी।
सरकार 13 जिलों का वास्तविक आंकड़ा सामने लाए।
जनता को सही जानकारी दे।
एचआईवी जांच और उपचार की सुविधा मजबूत करे।
स्पा सेंटरों और अन्य प्रतिष्ठानों में कानून का पालन सुनिश्चित करे।
मानव तस्करी और अवैध देह व्यापार के खिलाफ लगातार कार्रवाई करे।
और सबसे महत्वपूर्ण—
उत्तराखंड के युवाओं को डर नहीं, सही जानकारी दे।
क्योंकि बीमारी को छिपाने से बीमारी खत्म नहीं होती।
जांच, जागरूकता, सुरक्षित व्यवहार और समय पर उपचार—यही एचआईवी के खिलाफ वास्तविक लड़ाई है।
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