किच्छा और सिरौलीकलां के नतीजों ने बढ़ाई भाजपा की चिंता, 2027 से पहले क्या है बदलाव का संकेत


दिनेश शास्त्री श्रमजीवी पत्रकार यूनियन प्रदेश अध्यक्ष| देहरादून
देहरादून। ऊधमसिंह नगर जिले की किच्छा नगर पालिका और उसके निकटवर्ती सिरौलीकलां नगर पंचायत के चुनाव परिणामों ने उत्तराखंड की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। विधानसभा चुनाव 2027 से कुछ ही समय पहले आए इन नतीजों को कांग्रेस जहां अपने पक्ष में बदलती राजनीतिक हवा के संकेत के रूप में देख रही है, वहीं भाजपा के लिए यह परिणाम निश्चित तौर पर आत्ममंथन का अवसर हैं। सवाल यह है कि क्या ये नतीजे महज स्थानीय निकाय चुनाव तक सीमित हैं या फिर विधानसभा चुनाव की बड़ी तस्वीर का छोटा-सा नमूना?
किच्छा में कांग्रेस ने नगर पालिका अध्यक्ष पद पर शानदार जीत दर्ज की। कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने भाजपा के संदीप अरोड़ा को करीब 6,147 मतों के बड़े अंतर से पराजित किया। यह जीत केवल एक नगर पालिका की जीत नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़ की राजनीतिक प्रतिष्ठा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। बेहड़ ने चुनाव में पूरी ताकत झोंकी और कांग्रेस संगठन को एकजुट रखने में सफलता हासिल की।
दूसरी तरफ भाजपा ने भी किच्छा में पूरी ताकत लगाई थी। इसके बावजूद पार्टी अपने समर्थक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक अपेक्षित संख्या में पहुंचाने में सफल नहीं रही। किच्छा में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कम मतदान ने परिणाम को प्रभावित किया और यदि मतदान प्रतिशत सिरौलीकलां जैसा ऊंचा रहता तो परिणाम का अंतर और भी बड़ा हो सकता था।
सिरौलीकलां की तस्वीर भाजपा के लिए अलग तरह की चुनौती पेश करती है। यह नया नगर पंचायत क्षेत्र है और राजनीतिक तौर पर भाजपा को उम्मीद थी कि नगर पंचायत का गठन उसके पक्ष में माहौल तैयार करेगा। मगर अध्यक्ष पद पर कांग्रेस की राशिदा बेगम ने 1,773 मतों के अंतर से जीत दर्ज कर भाजपा समर्थित माने जा रहे निर्दलीय समीकरण को पीछे छोड़ दिया।
यहां भाजपा ने अपना अधिकृत प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था। चुनाव के दौरान निर्दलीय फरहीन जहां को भाजपा के समर्थन की चर्चा जरूर रही। ऐसे में कांग्रेस की जीत को भाजपा के लिए सीधे चुनावी पराजय के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के बदलने के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
इन दोनों नतीजों ने कांग्रेस को उत्साहित किया है। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि जनता ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए संकेत सामने आ गया है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए असली सवाल यह है कि क्या निकाय चुनाव के परिणामों को विधानसभा चुनाव की सीधी पटकथा माना जा सकता है?
ऊधमसिंह नगर की राजनीति में जातीय, सामाजिक और सामुदायिक समीकरणों की अहम भूमिका रही है। किच्छा और सिरौलीकलां में जिस तरह मतदान हुआ, उससे यह संकेत जरूर मिलता है कि कुछ सामाजिक समूहों का मतदान एक दिशा में अधिक केंद्रित रहा। लेकिन कांग्रेस के लिए भी इस जीत को स्थायी जनादेश मान लेना जोखिम भरा हो सकता है।
विशेषकर सोशल मीडिया पर जीत के बाद जिस तरह की राजनीतिक अभिव्यक्तियां सामने आ रही हैं, वे आने वाले चुनाव में ध्रुवीकरण को जन्म दे सकती हैं। तराई की राजनीति में यह तथ्य नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि कांग्रेस किसी वर्ग विशेष के समर्थन को अपना स्थायी वोट बैंक मानकर चलती है तो इससे दूसरे सामाजिक समूहों में राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
भाजपा के लिए भी यह समझना जरूरी होगा कि केवल सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के आधार पर चुनावी समर्थन की उम्मीद हमेशा पूरी नहीं होती। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को लाभ मिला है। इसी तरह केंद्र और राज्य सरकार की अनेक कल्याणकारी योजनाएं समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंची हैं। बावजूद इसके लाभार्थी का मतदान में समर्थन करना कोई राजनीतिक अनिवार्यता नहीं है।
किच्छा में करीब 26 हजार मतदाता और सिरौलीकलां में करीब 10 हजार मतदाता थे। किच्छा में मतदान लगभग 40 प्रतिशत के आसपास रहा, जबकि सिरौलीकलां में मतदान 75 प्रतिशत से अधिक रहा। मतदान प्रतिशत का यह अंतर भी परिणामों को समझने में महत्वपूर्ण है। ऊंचे मतदान वाले सिरौलीकलां में मतदाताओं ने जिस तरह स्पष्ट जनादेश दिया, उसने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दी है।
भाजपा के लिए चिंता केवल दो निकायों की हार नहीं है। चिंता इस बात की है कि यदि शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में पार्टी के पारंपरिक समर्थक मतदाताओं में मतदान के प्रति उत्साह कम हुआ और विपक्ष का वोट अधिक संगठित हुआ तो 2027 में इसका असर विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है।
हालांकि कांग्रेस को भी इन परिणामों से अति उत्साहित होने से बचना होगा। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में 2022 का विधानसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। उस चुनाव से पहले सत्ता विरोधी माहौल की चर्चा थी, लेकिन चुनावी अभियान के दौरान मुद्दों और सामाजिक समीकरणों ने पूरी तस्वीर बदल दी। एक विश्वविद्यालय से जुड़े मुद्दे को लेकर जिस तरह राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ, उसने चुनावी परिणामों पर व्यापक प्रभाव डाला।
इसलिए किच्छा और सिरौलीकलां के परिणामों को भाजपा के लिए खतरे की घंटी जरूर कहा जा सकता है, लेकिन कांग्रेस के लिए इसे 2027 की जीत का प्रमाणपत्र मानना जल्दबाजी होगी।
असल सवाल यही है कि क्या ये नतीजे बदलाव की बयार का संकेत हैं या भाजपा के लिए स्थानीय स्तर की चेतावनी? आने वाले महीनों में दोनों दलों की रणनीति इसका जवाब देगी। भाजपा को अपने संगठन, नाराज कार्यकर्ताओं और कम मतदान की समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा, जबकि कांग्रेस को जीत के बाद सामाजिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी।
राजनीति में कहा जाता है कि हांडी के एक चावल से पूरी हांडी का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन यह भी जरूरी है कि चावल सही जगह से निकाला गया हो। किच्छा और सिरौलीकलां के नतीजे फिलहाल भाजपा के लिए चेतावनी जरूर हैं। अब देखना यह है कि 2027 से पहले पार्टी इस चेतावनी को कितना गंभीरता से लेती है और कांग्रेस अपनी इस स्थानीय जीत को व्यापक जनसमर्थन में कितना बदल पाती है।