जिला अस्पताल से सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज तक पहुंची बच्ची, इलाज के दौरान तोड़ा दम; सवाल—क्या उत्तराखंड के अस्पताल केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
रुद्रपुर। एक मासूम बच्ची, जिसने अभी दुनिया में ठीक से आंखें भी नहीं खोली थीं, जिंदगी की जंग हार गई। सिंह कॉलोनी स्थित चर्च के पास एक कार के नीचे कपड़े में लिपटी मिली नवजात बच्ची को स्थानीय लोगों ने देखा तो पुलिस को सूचना दी। बच्ची को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। इसके बाद उसे रुद्रपुर के जिला अस्पताल से हल्द्वानी स्थित डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय रेफर किया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद सोमवार 19 अक्टूबर को बच्ची की मौत हो गई।
इस घटना ने एक बार फिर उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि आखिर प्रदेश में मरीजों को समय पर बेहतर उपचार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों के उपचार के लिए पर्याप्त संसाधन और विशेषज्ञ सुविधाएं उपलब्ध हैं? क्या मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेज देना ही स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी पूरी करने का तरीका बन गया है?
बच्ची मिलने और मौत के बीच करीब दो दिन का अंतर
जानकारी के अनुसार, 17 अक्टूबर की शाम रुद्रपुर की सिंह कॉलोनी स्थित चर्च के पास एक कार के नीचे कपड़े में लिपटी दो से तीन दिन की नवजात बच्ची मिली थी। बच्ची के बाएं हाथ में कैन्युला लगा हुआ था और नाभि पर क्लिप लगी थी। स्थानीय लोगों की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और बच्ची को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया।
बच्ची की हालत को देखते हुए उसे हल्द्वानी के सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय रेफर किया गया। उपचार के दौरान उसकी हालत बिगड़ती गई और 19 अक्टूबर को उसने दम तोड़ दिया। इस प्रकार बच्ची के मिलने और मृत्यु के बीच लगभग दो दिन का अंतर रहा। हालांकि, बच्ची मिलने के ठीक कितने घंटे बाद उसकी मौत हुई, इसकी पुष्टि अस्पताल के भर्ती और मृत्यु संबंधी समय-रिकॉर्ड से ही हो सकती है।
उपचार के दौरान बच्ची को पीलिया होने की जानकारी भी सामने आई। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि अस्पताल पहुंचने के समय उसकी चिकित्सकीय स्थिति क्या थी, उसे कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं और उसे बचाने के लिए क्या-क्या उपचार किए गए।
रुद्रपुर से हल्द्वानी तक का सफर, फिर भी नहीं बची जिंदगी
उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि गंभीर मरीजों को समय पर समुचित उपचार क्यों नहीं मिल पाता। रुद्रपुर के जिला अस्पताल से हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल तक पहुंची इस मासूम को बचाया नहीं जा सका। अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि बच्ची की हालत कितनी गंभीर थी, उसे किस स्तर के उपचार की जरूरत थी और क्या संबंधित अस्पतालों में नवजात के उपचार के लिए जरूरी विशेषज्ञ सुविधाएं उपलब्ध थीं।
यदि किसी अस्पताल में आवश्यक सुविधाएं नहीं थीं, तो क्या उच्च चिकित्सा संस्थान में रेफर करने पर विचार किया गया? क्या ऋषिकेश एम्स जैसे उच्च संस्थान में उपचार की जरूरत थी? इन सवालों का जवाब बिना चिकित्सकीय रिकॉर्ड और विशेषज्ञ जांच के नहीं दिया जा सकता, लेकिन स्वास्थ्य विभाग को इस पूरे घटनाक्रम की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
उत्तराखंड के अस्पताल आखिर कब बनेंगे बेहतर उपचार के केंद्र?
प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को विशेषज्ञ उपचार के लिए दूर जाना पड़ता है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में भी गंभीर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजे जाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
रेफर करना अपने आप में गलत नहीं है। जब किसी मरीज को उच्च स्तर की चिकित्सा की आवश्यकता हो, तो उसे बेहतर संस्थान तक पहुंचाना जरूरी होता है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब मरीज और उसके परिजन अस्पतालों के चक्कर काटते रह जाते हैं और समय पर उपचार मिलने की उम्मीद कमजोर पड़ने लगती है।
रुद्रपुर की इस घटना ने फिर पूछा है कि क्या जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में नवजातों के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था है? क्या आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं जरूरत के अनुरूप उपलब्ध हैं? क्या गंभीर मरीजों को रेफर करते समय सुरक्षित परिवहन और आवश्यक उपचार सुनिश्चित किया जाता है?
यदि अस्पतालों में संसाधनों की कमी है, तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी सरकार की है। केवल भवन, मशीनों और घोषणाओं से स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होती। असली कसौटी यह है कि संकट के समय मरीज को कितना प्रभावी उपचार मिल पाता है।
गर्भवती महिलाओं और नवजातों के मामले में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं
गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान समय पर विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध कराना और नवजातों को जन्म के बाद आवश्यक चिकित्सा देना स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है। प्रदेश में गर्भवती महिलाओं को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजे जाने और उपचार में देरी की शिकायतों की भी गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए।
हर घटना के कारण अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी मौत के लिए बिना जांच चिकित्सकों को दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन यदि किसी मामले में उपचार में देरी, संसाधनों की कमी या चिकित्सकीय लापरवाही सामने आती है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सरकार से सवाल: मासूम की मौत की जांच कब होगी?
इस मामले में स्वास्थ्य विभाग और संबंधित अस्पतालों को स्पष्ट करना चाहिए कि बच्ची को किस समय अस्पताल लाया गया, उसकी स्थिति क्या थी, उसे कब रेफर किया गया, हल्द्वानी में कौन-कौन से उपचार किए गए और मृत्यु का प्रमाणित चिकित्सकीय कारण क्या रहा।
यह भी जांच का विषय है कि बच्ची को चर्च के पास छोड़ने से पहले उसका उपचार कहां हुआ था और उसके हाथ में कैन्युला तथा नाभि पर क्लिप किस परिस्थिति में लगी थी। पुलिस बच्ची को वहां छोड़ने के मामले में तीन लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, जिनमें उसकी मां भी शामिल बताई गई है। इस मामले में कानूनी प्रक्रिया और चिकित्सकीय जांच के निष्कर्ष सामने आना जरूरी है।
स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही केवल डॉक्टरों तक सीमित नहीं हो सकती। अस्पतालों में संसाधन, विशेषज्ञों की उपलब्धता, आपातकालीन प्रबंधन और रेफरल व्यवस्था सुनिश्चित करना भी सरकार और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है।
मासूम बच्ची को भावभीनी श्रद्धांजलि
जिस बच्ची को जीवन की शुरुआत में ही संरक्षण और उपचार की जरूरत थी, वह दुनिया में कुछ ही दिनों का सफर तय कर सकी। उसकी मौत हृदय को व्यथित करती है। वह अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती थी, न अपने लिए सहायता मांग सकती थी। उसकी जिंदगी बचाने के लिए हर संभव प्रयास होना चाहिए था।
मासूम बच्ची को भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
यह घटना केवल एक परिवार या एक अस्पताल का मामला बनकर नहीं रहनी चाहिए। इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, उपचार से संबंधित तथ्य सार्वजनिक किए जाने चाहिए और प्रदेश के अस्पतालों में नवजातों तथा गंभीर मरीजों के उपचार की व्यवस्थाओं की समीक्षा होनी चाहिए।
मासूम अब लौटकर नहीं आएगी, लेकिन उसकी मौत से उठे सवालों को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए। उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को रेफरल के भरोसे नहीं, बेहतर उपचार, जवाबदेही और संवेदनशीलता के आधार पर परखा जाना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी बच्चे या गर्भवती महिला को समय पर चिकित्सा सुविधा न मिलने की आशंका के बीच जिंदगी की जंग न लड़नी पड़े।
अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
तीन अस्पतालों के चक्कर, फिर भी नहीं बची मासूम की जान! रुद्रपुर में नवजात की मौत ने उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल
