संपादकीय | नाबालिगों के हाथों में किताबों की जगह हथियार क्यों? कानून का डर खत्म हो रहा है या समाज की जिम्मेदारी?



चंडीगढ़ से दिल्ली तक खूनी झगड़ों की घटनाएं गंभीर चेतावनी, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश को भी आत्ममंथन की जरूरत
लेखक: अवतार सिंह बिष्ट | संपादक, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
स्कूल जाने की उम्र में जब बच्चे किताबों से दोस्ती करने, भविष्य के सपने बुनने और जीवन में आगे बढ़ने की तैयारी करते हैं, तब उन्हीं हाथों में पिस्तौल और चाकू दिखाई देने लगें तो सवाल केवल अपराध का नहीं, पूरे समाज के भविष्य का हो जाता है। आखिर किशोरावस्था में ऐसी कौन-सी परिस्थितियां पैदा हो रही हैं, जिनमें मामूली विवाद भी जानलेवा दुश्मनी में बदल जाता है? क्या सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी किसी की जान लेने का कारण बन सकती है? क्या नाबालिगों को कानून का भय नहीं रहा, या वे किसी बड़े अपराधी के हाथों इस्तेमाल किए जा रहे हैं?

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


चंडीगढ़ के सेक्टर-22 में नाबालिग छात्र नैतिक की गोलीबारी में मौत और दिल्ली के पीतमपुरा में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान नौवीं कक्षा के छात्र की मौत जैसी घटनाएं समाज को झकझोरने वाली हैं। उपलब्ध शुरुआती जानकारियों के अनुसार, इन मामलों में पुराने विवाद, आपसी रंजिश और सोशल मीडिया पर टिप्पणी जैसे पहलुओं की चर्चा सामने आई है। हालांकि, प्रत्येक मामले में वास्तविक कारण और आरोपियों की भूमिका का निर्धारण पुलिस जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया से ही होना चाहिए।
इन घटनाओं को अलग-अलग शहरों की आपराधिक खबर मानकर भुला देना सबसे बड़ी भूल होगी। यह उस सामाजिक संकट की ओर संकेत करती हैं, जिसमें किशोरों के भीतर विवाद सुलझाने की क्षमता कमजोर पड़ती दिखाई देती है और गुस्से, बदले तथा समूह के दबाव में हिंसा का रास्ता चुन लिया जाता है।
पांच बड़े सवाल, जिनसे बचना अब संभव नहीं
पहला सवाल: क्या नाबालिग अपराधियों को कानून की कमजोरी का फायदा मिलने की धारणा हिंसा को बढ़ावा दे रही है?
समाज में अक्सर यह चर्चा होती है कि नाबालिग होने के कारण अपराधी को बहुत कम सजा मिलती है, इसलिए वह बेखौफ होकर अपराध करता है। इस धारणा की कानूनी वास्तविकता समझना जरूरी है। भारत में किशोर न्याय अधिनियम के तहत सामान्यतः 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे किशोर न्याय व्यवस्था के दायरे में आते हैं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि हर नाबालिग को जघन्य अपराध में अधिकतम तीन वर्ष तक ही रखा जा सकता है।
कानून में गंभीर और जघन्य अपराधों के लिए अलग प्रावधान हैं। 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोर पर जघन्य अपराध का आरोप होने पर किशोर न्याय बोर्ड प्रारंभिक आकलन कर सकता है कि संबंधित किशोर ने अपराध के परिणामों को समझने और उसे अंजाम देने की मानसिक एवं शारीरिक क्षमता रखी थी या नहीं। निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और सक्षम न्यायालय के निर्णय के अधीन कुछ मामलों में वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने का रास्ता भी खुल सकता है। यह अपने आप लागू नहीं होता और न ही दोषसिद्धि से पहले किसी आरोपी को अपराधी मान लेना उचित है।
इसलिए समस्या का समाधान केवल सजा बढ़ाने की मांग में नहीं है। यह भी जांचना होगा कि किशोरों को कानून की जानकारी कितनी है, उन्हें अपराध के परिणाम समझाए जा रहे हैं या नहीं और रोकथाम के लिए परिवार, विद्यालय तथा पुलिस क्या कर रहे हैं।
दूसरा सवाल: क्या सोशल मीडिया की दुनिया बच्चों को वास्तविक जीवन की हिंसा की ओर धकेल रही है?
आज एक कमेंट, वीडियो, फोटो, ऑनलाइन अपमान या समूह में कही गई बात को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाता है। कुछ किशोर डिजिटल दुनिया में अपनी छवि को लेकर इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि सार्वजनिक रूप से जवाब देने, बदला लेने या दोस्तों के सामने ताकत दिखाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि सोशल मीडिया पर सक्रिय हर बच्चा हिंसक हो जाता है। असली चिंता उन परिस्थितियों की है, जहां ऑनलाइन विवाद को रोकने के बजाय साथी उसे उकसाते हैं, धमकी भरे संदेश फैलते हैं और हथियारों के साथ शक्ति प्रदर्शन को बहादुरी समझा जाता है।
माता-पिता को बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर संवेदनशील निगरानी रखनी चाहिए। स्कूलों में साइबर व्यवहार, ऑनलाइन धमकी, डिजिटल प्रतिष्ठा और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर नियमित संवाद होना चाहिए। किसी कमेंट का जवाब गोली या चाकू से देने की मानसिकता को सामान्य मानने से समाज को रोकना होगा।
तीसरा सवाल: क्या नाबालिग किसी बड़े अपराधी के मोहरे बन रहे हैं?
यह पहलू भी जांच के योग्य है कि कहीं किसी किशोर को पुराने विवाद, गैंग जैसी गतिविधियों, हथियारों की उपलब्धता या किसी दूसरे व्यक्ति के स्वार्थ के लिए इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा। कम उम्र, साथियों का दबाव, आर्थिक लालच, डर और अपराधियों से प्रभावित होने जैसी परिस्थितियां किशोरों को जोखिम में डाल सकती हैं।
हालांकि, हर नाबालिग अपराध के पीछे किसी बड़े अपराधी का हाथ होने की धारणा भी सही नहीं है। प्रत्येक मामले में पुलिस को यह पता लगाना चाहिए कि हथियार कहां से आया, योजना किसने बनाई, किसी ने उकसाया या मदद की और अपराध से पहले क्या संवाद हुआ था। यदि किसी वयस्क ने किशोर का इस्तेमाल किया है, तो उसकी भूमिका की भी कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई होनी चाहिए।
किशोर को अपराध से बचाना और उसे अपराध के लिए इस्तेमाल करने वालों तक पहुंचना, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।