उत्तराखंड — अगस्त 2025: कक्षा नौ के एक छात्र पर शिक्षक को गोली मारने का आरोप लगा। रिपोर्ट के अनुसार, छात्र ने टिफिन में छिपाकर हथियार स्कूल पहुंचाया था। शिक्षक को कंधे में गोली लगी और वह बच गए। पुलिस ने बताया कि कक्षा में अनुशासन को लेकर हुई नाराजगी घटना की वजह मानी जा रही थी। यह मामला स्कूलों में हथियारों की पहुंच और गुस्से पर नियंत्रण की गंभीर चुनौती सामने लाता है। ।
चंदौली, उत्तर प्रदेश — जून 2026: एक स्कूल में कक्षा दस के छात्र की चाकू से हमला किए जाने के बाद मौत हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपी छात्र भी 16 वर्ष का था। शुरुआती जानकारी में आपसी विवाद की बात सामने आई। यह घटना बताती है कि स्कूल परिसर भी तभी सुरक्षित रह सकते हैं, जब विवादों की समय रहते पहचान और रोकथाम हो। ।
एटा, उत्तर प्रदेश — मई 2025: पुलिस के अनुसार, 11 वर्षीय बच्चे की हत्या के मामले में 12 वर्ष के दो बच्चों को हिरासत में लिया गया था। शुरुआती रिपोर्ट में कथित ब्लैकमेल को विवाद की वजह बताया गया। इतनी कम उम्र में सामने आया यह मामला बाल व्यवहार, पारिवारिक निगरानी और समय रहते मदद मिलने की आवश्यकता पर सवाल खड़े करता है। ।
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश — मार्च 2025: 16 वर्षीय छात्र के अपहरण और हत्या के मामले में पुलिस ने चार नाबालिगों को गिरफ्तार किया था। रिपोर्ट के मुताबिक, कथित विवाद पैसों से जुड़ा था। यह मामला दिखाता है कि आर्थिक लेन-देन और आपसी संबंधों में पैदा हुआ तनाव भी गंभीर अपराध का रूप ले सकता है। ।
नोएडा, उत्तर प्रदेश — अगस्त 2026: 13 वर्षीय बच्चे की हत्या के मामले में 15 वर्षीय किशोर को हिरासत में लिए जाने के बाद दो अन्य नाबालिगों को भी पकड़े जाने की खबर सामने आई। रिपोर्ट में कथित आर्थिक विवाद का उल्लेख किया गया। यह मामला इस बात की पड़ताल की जरूरत बताता है कि बच्चों के बीच विवाद किस तरह हिंसक रूप ले सकते हैं और क्या शुरुआती स्तर पर किसी को हस्तक्षेप करने का अवसर मिला था। ।
इन घटनाओं का उल्लेख किसी पूरे किशोर वर्ग को अपराधी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को समझने के लिए है जिनमें बच्चों से गंभीर अपराध हो रहे हैं। हर मामले के तथ्य और कानूनी स्थिति अलग हैं।
पांचवां सवाल: जिम्मेदारी किसकी है—परिवार, स्कूल, पुलिस या सरकार?
किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक आक्रामकता, धमकी देने की प्रवृत्ति, हथियारों के प्रति आकर्षण, संदिग्ध संगत या लगातार हिंसक विवाद दिखाई दें तो उसे केवल शरारत कहकर टालना खतरनाक हो सकता है। अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा। स्कूलों को शिकायतों के लिए भरोसेमंद व्यवस्था बनानी होगी। शिक्षकों को अपमानित करने या सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित करने के बजाय अनुशासन और संवेदनशील परामर्श के बीच संतुलन रखना होगा।
पुलिस को स्कूलों के आसपास हथियारों की अवैध उपलब्धता, धमकी और किशोरों को अपराध में इस्तेमाल करने वाले लोगों पर निगरानी बढ़ानी चाहिए। स्थानीय प्रशासन, बाल संरक्षण इकाइयों, मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक संगठनों को मिलकर ऐसे बच्चों तक पहुंचना चाहिए जो हिंसा की ओर बढ़ रहे हों।
सरकार को स्कूलों में नियमित काउंसलिंग, साइबर सुरक्षा शिक्षा, नशे से बचाव और विवाद समाधान की प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। खेल, सांस्कृतिक गतिविधियां और सकारात्मक सामुदायिक सहभागिता भी बच्चों को रचनात्मक दिशा देने में मदद कर सकती हैं।
कानून में सुधार जरूरी, लेकिन न्याय के साथ
किशोर न्याय अधिनियम का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बच्चों का पुनर्वास और समाज में उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना भी है। गंभीर अपराधों में पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए और अपराध की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। साथ ही, आरोपी किशोर के अधिकारों, उसकी परिस्थितियों और सुधार की संभावनाओं को भी कानून के अनुरूप परखा जाना चाहिए।
यह धारणा सही नहीं है कि जघन्य अपराध करने वाले हर नाबालिग को अधिकतम तीन वर्ष का ही दंड मिल सकता है। 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोर पर जघन्य अपराध का आरोप होने पर कानून की धारा 15 के तहत प्रारंभिक आकलन और धारा 18 व 19 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया लागू हो सकती है। कुछ मामलों में बाल न्यायालय वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने का निर्णय ले सकता है। यह निर्णय स्वतः नहीं होता; कानून में निर्धारित आकलन और न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक है। ।
कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ यह भी जरूरी है कि हथियारों की आपूर्ति करने वाले, बच्चों को उकसाने वाले और उनके जरिए अपराध कराने वाले वयस्कों को बच निकलने का अवसर न मिले। दंड की निश्चितता, समय पर जांच और अपराध की रोकथाम केवल सजा की कठोरता से अधिक व्यापक विषय हैं।
संपादकीय निष्कर्ष: बचपन को अपराध की प्रयोगशाला मत बनने दीजिए
चंडीगढ़ की गोलीबारी हो, दिल्ली की चाकूबाजी हो या उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में सामने आए किशोर अपराध के मामले—हर घटना एक परिवार को उजाड़ती है, एक भविष्य को छीनती है और समाज की सुरक्षा पर सवाल उठाती है।
नाबालिगों को कानून की कमजोर कड़ी मानकर छोड़ देना भी गलत है और हर किशोर को जन्मजात अपराधी समझ लेना भी। हमें यह पहचानना होगा कि कौन-सा बच्चा गलत संगत, दबाव या उपेक्षा का शिकार है, कौन जानबूझकर हिंसा का रास्ता चुन रहा है और कौन किसी बड़े अपराधी के इशारे पर काम कर रहा है।
बच्चों को अपराध से बचाना समाज की जिम्मेदारी है, लेकिन अपराध के पीड़ितों को न्याय दिलाना भी उतना ही जरूरी है। केवल संवेदना जताने से बदलाव नहीं आएगा। परिवार को समय देना होगा, स्कूल को सतर्क होना होगा, पुलिस को निष्पक्ष जांच करनी होगी और सरकार को रोकथाम तथा पुनर्वास की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
आज सवाल यह नहीं कि अगली घटना किस शहर में होगी। असली सवाल यह है कि क्या हम अगली घटना होने से पहले किसी बच्चे को हिंसा के रास्ते से वापस ला पाएंगे?
अगर किताब उठाने की उम्र में कोई बच्चा हथियार उठा रहा है, तो यह सिर्फ उस बच्चे की विफलता नहीं, हमारे सामाजिक तंत्र के लिए भी चेतावनी है। अब समय है कि समाज जागे, कानून प्रभावी बने और बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
अवतार सिंह बिष्ट | संपादक
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
चौथा सवाल: क्या उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में सामने आए मामले खतरे की घंटी हैं?उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में सामने आई कुछ घटनाएं बताती हैं कि किशोरों के बीच हिंसा को हल्के में नहीं लिया जा सकता
