हल्द्वानी कर्मभूमि, लोहाघाट से भी राजनीतिक जुड़ाव; छात्र राजनीति से व्यापारिक संगठनों और उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक लंबा सफर, भाजपा में अनुभवी चेहरे के रूप में अपनी दावेदारी कर रहे कुंवर।
संपादकीय विश्लेषण | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
रुद्रपुर। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी में टिकट के दावेदार अपनी राजनीतिक सक्रियता और संगठनात्मक अनुभव के आधार पर दावेदारी पेश कर रहे हैं। इसी बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता, दर्जा राज्य मंत्री एवं उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष हुकुम सिंह कुंवर ने हल्द्वानी के साथ-साथ लोहाघाट विधानसभा सीट से भी अपनी दावेदारी पेश कर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू कर दी है। कुंवर को उम्मीद है कि पांच बार टिकट के लिए आवेदन करने के बाद इस बार पार्टी उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने का अवसर देगी।
हुकुम सिंह कुंवर का कहना है कि वह हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र से दो बार और लोहाघाट विधानसभा क्षेत्र से एक बार चुनाव लड़ चुके हैं। उन्होंने वर्ष 2002, 2007, 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा से टिकट के लिए आवेदन किया, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उन्हें अवसर नहीं दिया। अब 2027 के चुनाव में उन्होंने हल्द्वानी और लोहाघाट दोनों सीटों पर अपनी दावेदारी रखी है।
कुंवर की राजनीतिक यात्रा को केवल विधानसभा टिकट की दावेदारी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन में कदम रखने वाले कुंवर का हल्द्वानी में लंबा राजनीतिक और सामाजिक अनुभव रहा है। हल्द्वानी उनकी कर्मभूमि रही है। यहां उन्होंने छात्र राजनीति से लेकर व्यापारिक संगठनों और सामाजिक गतिविधियों तक अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है। देवभूमि उद्योग व्यापार मंडल के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में व्यापारियों की समस्याओं को उठाने और उनके हितों की आवाज बुलंद करने में भी उनकी भूमिका रही है।
उनकी राजनीतिक पहचान केवल व्यापारिक संगठनों तक सीमित नहीं रही। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में सक्रिय भागीदारी ने उन्हें एक अलग पहचान दी। राज्य निर्माण के संघर्ष में उन्होंने अनेक आंदोलनकारियों के साथ मिलकर अलग राज्य की मांग को लेकर संघर्ष किया। स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी, काशी सिंह ऐरी, स्वर्गीय विपिन चंद्र त्रिपाठी सहित आंदोलन के कई प्रमुख चेहरों की विचारधारा और संघर्ष से जुड़ी राजनीतिक पृष्ठभूमि में कुंवर का अपना स्थान रहा है।
राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष और दर्जा राज्य मंत्री की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनका राजनीतिक दायरा प्रदेशव्यापी हुआ है। राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण, पेंशन, सरकारी सेवाओं में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण और अन्य लंबित मांगों को लेकर परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण है। कुंवर के सामने इन मांगों को शासन स्तर पर प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने की चुनौती भी है।
हल्द्वानी में उनकी पुरानी राजनीतिक और सामाजिक पकड़ को उनकी दावेदारी का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। वर्षों तक व्यापारिक संगठनों, छात्र राजनीति और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहने के कारण उनका स्थानीय स्तर पर परिचय रहा है। दूसरी ओर लोहाघाट और चम्पावत क्षेत्र में भी राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष के रूप में उनका संपर्क बढ़ा है। ऐसे में दोनों सीटों से दावेदारी उनके राजनीतिक विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए भी महत्वपूर्ण होगा। पार्टी के सामने सरकार के कामकाज के साथ-साथ संगठनात्मक मजबूती, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और क्षेत्रीय समीकरणों को संतुलित करने की चुनौती रहेगी। ऐसे में पुराने संगठनात्मक अनुभव वाले नेताओं की भूमिका पर भी चर्चा होना स्वाभाविक है।
हुकुम सिंह कुंवर की दावेदारी में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह लंबे समय से पार्टी से जुड़े रहे हैं और कई चुनावों में टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अब सवाल यह है कि भाजपा नेतृत्व उनके राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक योगदान, राज्य आंदोलन में भूमिका और क्षेत्रीय संपर्क को टिकट चयन के दौरान कितना महत्व देता है।
हल्द्वानी में यातायात, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं, व्यापारिक समस्याएं और शहरी विकास प्रमुख मुद्दे हैं। वहीं लोहाघाट में रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, पर्यटन और सड़क संपर्क जैसे विषय जनता की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इन मुद्दों पर प्रभावी कार्ययोजना प्रस्तुत करना किसी भी दावेदार के लिए आवश्यक होगा।
क्या भाजपा इस बार हुकुम सिंह कुंवर को देगी अवसर?
हुकुम सिंह कुंवर की राजनीतिक यात्रा हल्द्वानी की छात्र राजनीति से शुरू होकर व्यापारिक संगठन, उत्तराखंड राज्य आंदोलन, भाजपा संगठन और राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष पद तक पहुंची है। यह लंबा सार्वजनिक सफर उनकी राजनीतिक पहचान का आधार है। पांच बार टिकट के लिए आवेदन करने के बाद 2027 में हल्द्वानी और लोहाघाट दोनों सीटों से दावा पेश करना उनके राजनीतिक संकल्प को दर्शाता है।
भाजपा यदि 2027 में अपने पुराने संगठनात्मक अनुभव, सामाजिक संपर्क और राज्य आंदोलन से जुड़े चेहरों को चुनावी राजनीति में अवसर देने की रणनीति अपनाती है तो कुंवर की दावेदारी भी पार्टी के विचार-विमर्श का हिस्सा बन सकती है। हालांकि टिकट का अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व को संगठनात्मक और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर करना है।
फिलहाल कुंवर की निगाहें भाजपा के टिकट पर टिकी हैं। हल्द्वानी उनकी कर्मभूमि है और लोहाघाट से भी उनका राजनीतिक जुड़ाव है। अब देखना होगा कि वर्षों की राजनीतिक सक्रियता और पांच चुनावों के इंतजार के बाद 2027 में उनके राजनीतिक सफर को नया चुनावी अवसर मिलता है या नहीं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
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