हीरा देवी: पहाड़ की मिट्टी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय रेड कारपेट तक, लेकिन दिल में आज भी अपनी भैंस और पहाड़ की जिंदगीसंपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर



सिनेमा की दुनिया में जब किसी फिल्म की नायिका की बात होती है तो आमतौर पर हमारे सामने खूबसूरत चेहरे, चमक-दमक, महंगे परिधान, आलीशान गाड़ियां और बड़े-बड़े फिल्मी सितारों की तस्वीर उभरती है। लेकिन उत्तराखंड के एक छोटे से गांव की 65 वर्ष से अधिक उम्र की महिला हीरा देवी ने इस पूरी परिभाषा को बदलकर रख दिया है। विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ में नायिका बनने वाली हीरा देवी की कहानी केवल एक फिल्म अभिनेत्री की कहानी नहीं है, यह पहाड़ की उस महिला का जीवन संघर्ष है, जिसने पूरी जिंदगी परिवार, खेत, जंगल और पशुओं की सेवा में गुजार दी, लेकिन एक दिन उसकी सादगी ने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा की दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
यह कहानी जितनी खूबसूरत है, उतनी ही भावुक करने वाली भी है। इसमें पहाड़ का संघर्ष है, महिलाओं का त्याग है, ग्रामीण जीवन की सच्चाई है और उस मिट्टी से जुड़ाव है, जिसे आधुनिकता की दौड़ में हम लगातार पीछे छोड़ते जा रहे हैं।
उत्तराखंड के बेरीनाग से लगभग दस किलोमीटर दूर स्थित छोटे से गांव गढ़तिर की रहने वाली हीरा देवी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन कैमरे के सामने खड़ी होकर वह फिल्म की मुख्य नायिका बनेंगी। उनके लिए सिनेमा की दुनिया किसी दूसरे ग्रह जैसी थी। न कैमरे की समझ, न अभिनय का अनुभव और न ही फिल्मी दुनिया से कोई परिचय। उनका संसार तो सुबह जंगल जाकर पशुओं के लिए घास काटने, घर का काम करने और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने तक सीमित था।
दो बेटों और एक बेटी का विवाह कर अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां पूरी कर चुकीं हीरा देवी पति के निधन के बाद गांव में अकेली जिंदगी बिता रही थीं। उनके जीवन में एक पालतू भैंस ही सबसे बड़ा सहारा थी। संयोग देखिए कि जिस समय फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी ने उन्हें अपनी फिल्म में अभिनय करने का प्रस्ताव दिया, उसी समय उनकी भैंस ने एक बच्चे को जन्म दिया था। ऐसे में हीरा देवी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं था कि उन्हें फिल्म में कौन-सा किरदार निभाना है, बल्कि यह था कि उनकी अनुपस्थिति में भैंस और उसके बच्चे की देखभाल कौन करेगा?
यही अंतर है पहाड़ की वास्तविक जिंदगी और महानगरों की चकाचौंध के बीच। शहरों में जहां लोग करियर, पैसा और प्रसिद्धि के लिए भागते हैं, वहीं पहाड़ की एक महिला के लिए उसके पशु भी परिवार के सदस्य होते हैं। उसके लिए भैंस केवल दूध देने वाला जानवर नहीं, बल्कि जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों और भावनाओं से जुड़ा हिस्सा होती है।
फिल्म में काम करने का प्रस्ताव मिलने के बाद हीरा देवी के मन में दूसरी चिंता गांव और समाज को लेकर भी थी। लोग क्या कहेंगे? आसपास के लोग क्या सोचेंगे? कुछ परिचितों ने उन्हें सावधान भी किया कि फिल्म बनाने वालों का कोई भरोसा नहीं होता। कहीं ऐसा न हो कि उनकी जिंदगी को गलत तरीके से कैमरे में उतार दिया जाए। ग्रामीण समाज में आज भी महिलाओं के लिए इस तरह के निर्णय लेना आसान नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने परिस्थितियों को समझते हुए फिल्म में काम करने का फैसला किया।
इसके बाद शुरू हुआ एक ऐसा अनुभव, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। सुबह साढ़े छह बजे से लेकर रात आठ बजे तक शूटिंग चलती थी। उनका घर शूटिंग स्थल से लगभग छह किलोमीटर दूर था। फिल्म की टीम उन्हें सम्मानपूर्वक लाती और वापस घर छोड़ती थी। अभिनय सिखाने के लिए प्रशिक्षक की व्यवस्था की गई थी। एक सामान्य ग्रामीण महिला को फिल्म की नायिका के रूप में तैयार करने के लिए पूरी टीम मेहनत कर रही थी।
लेकिन इस कहानी का सबसे मार्मिक प्रसंग वह है, जो हीरा देवी के व्यक्तित्व और पहाड़ की महिलाओं की मानसिकता को सबसे अच्छी तरह समझाता है।
एक दृश्य में उन्हें घास का गठ्ठर उठाकर नायक के साथ जाते हुए दिखाया जाना था। फिल्म की टीम ने उनके आने से पहले ही घास का एक गठ्ठर मंगवा लिया था। हीरा देवी की नजर जैसे ही उस गठ्ठर पर पड़ी, उनके चेहरे पर चमक आ गई। शूटिंग शुरू हुई, लेकिन उनका ध्यान बार-बार उस घास की ओर जा रहा था। निर्देशक विनोद कापड़ी भी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर दृश्य में वह सहज अभिनय क्यों नहीं कर पा रही हैं।
आखिरकार हीरा देवी ने शूटिंग रुकवाई और विनोद कापड़ी से सीधा सवाल किया कि इस घास का क्या होगा? जब उन्हें बताया गया कि शूटिंग के बाद घास फेंक दी जाएगी तो उनके मन में पीड़ा हुई। उन्होंने कहा कि इसे फेंकने के बजाय उन्हें दे दिया जाए, ताकि वह अपनी भैंस के लिए घर ले जा सकें।
जरा सोचिए, जिस महिला के सामने फिल्मी दुनिया का नया अवसर था, जिसके अभिनय को कैमरे में कैद किया जा रहा था, जिसके आसपास फिल्म निर्माण की पूरी टीम मौजूद थी, उसकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि घास व्यर्थ न जाए। विनोद कापड़ी ने उनकी भावना को समझा और एक अतिरिक्त गठ्ठर की व्यवस्था करवाई। उस दिन जब हीरा देवी घर लौटीं तो उनकी जीप में दो गठ्ठर घास भी रखे हुए थे।
यह प्रसंग केवल एक फिल्म का पर्दे के पीछे का किस्सा नहीं है। यह पहाड़ की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण जीवन और महिलाओं के श्रम की वास्तविक तस्वीर है। पहाड़ की महिलाएं रोज सुबह जंगलों में जाती हैं। सिर पर घास और लकड़ी के भारी गठ्ठर उठाती हैं। रास्तों में जंगली जानवरों का खतरा रहता है। बारिश, ठंड और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच भी उनकी दिनचर्या नहीं रुकती। उनके श्रम का कोई बड़ा आर्थिक मूल्यांकन नहीं होता, लेकिन उन्हीं के परिश्रम से पहाड़ के घरों की व्यवस्था चलती है।
आज जब हम महिला सशक्तीकरण की बातें करते हैं, तब हीरा देवी जैसी महिलाओं की जिंदगी को समझना बेहद जरूरी है। सशक्तीकरण का अर्थ केवल बड़े पदों पर पहुंचना या मंचों पर सम्मानित होना नहीं है। अपने निर्णय लेने का अधिकार, अपनी मेहनत का सम्मान और अपनी पहचान के साथ जीना भी महिला सशक्तीकरण है।
नवंबर 2024 में फिल्म ‘पायर’ का अंतरराष्ट्रीय प्रीमियर एस्टोनिया की राजधानी टालिन में आयोजित ब्लैक नाइट्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ। जिस महिला ने कभी बड़े पर्दे की कल्पना नहीं की थी, वह अंतरराष्ट्रीय रेड कारपेट तक पहुंच गई। लेकिन वहां भी उनके मन में अपनी भैंस की चिंता बनी रही। विनोद कापड़ी के अनुसार, उनके मन में यही सवाल था कि उनके गांव में भैंस ठीक होगी या नहीं, उसे चारा मिला होगा या नहीं।
यही है पहाड़ की असली पहचान। प्रसिद्धि मिलने के बाद भी अपनी जड़ों को नहीं भूलना। अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचकर भी अपने गांव, अपने पशु और अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों से भावनात्मक रिश्ता बनाए रखना।
मेरे विचार से हीरा देवी की कहानी उत्तराखंड के नीति-निर्माताओं और समाज के लिए भी एक संदेश है। राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन पहाड़ की महिलाओं की कठिनाइयां आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की समस्याएं अब भी मौजूद हैं। जिस महिला के श्रम से पहाड़ का जीवन चलता है, उसी महिला के जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए हमारी योजनाएं कितनी प्रभावी हैं, यह बड़ा सवाल है।
हीरा देवी को फिल्म में अवसर देकर विनोद कापड़ी ने यह साबित किया कि प्रतिभा उम्र, शिक्षा और संसाधनों की मोहताज नहीं होती। जरूरत केवल उसे पहचानने और सम्मान देने की है।
हीरा देवी किसी फिल्म की नायिका भर नहीं हैं। वह उत्तराखंड की उस संघर्षशील महिला का चेहरा हैं, जो दुनिया की सबसे बड़ी पहचान मिलने के बाद भी अपनी भैंस के लिए घास की चिंता करना नहीं भूलती। यही सादगी उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती है और यही पहाड़ की आत्मा है।
अवतार सिंह बिष्ट
संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर

स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी, काशी सिंह ऐरी, स्वर्गीय विपिन चंद्र त्रिपाठी जैसे अनगिनत आंदोलनकारियों के साथ मुझे भी उत्तराखंड राज्य आंदोलन में संघर्ष करने का सौभाग्य मिला। ऊधम सिंह नगर को उत्तराखंड में शामिल कराने की रणनीति बनाकर आंदोलन किया और मेरे नाम पर इस मांग को लेकर पहली और एकमात्र एफआईआर दर्ज हुई।
9 नवंबर 2000 को राज्य बना, लेकिन सवाल आज भी वही हैं। पलायन, बेरोजगारी, पहाड़ की महिलाओं का कठिन जीवन और मूलभूत सुविधाओं का अभाव। फिल्म ‘पायर’ ने पर्दे पर वही पीड़ा दिखा दी, जिसे हम आंदोलन के दिनों से महसूस करते आए हैं। राज्य केवल नक्शे पर सीमाएं बदलने के लिए नहीं बना था, बल्कि पहाड़ के अंतिम व्यक्ति के जीवन में खुशहाली लाने के लिए बना था। यही उत्तराखंड राज्य आंदोलन का मूल उद्देश्य था।