प्रथम गुरुपूर्णिमा महोत्सव में गूंजा गुरु महिमा का संदेश, ‘साहित्यिक सचेतना’ ने सनातन साहित्य के संरक्षण का लिया संकल्प

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प्रथम गुरुपूर्णिमा महोत्सव में गूंजा गुरु महिमा का संदेश, ‘साहित्यिक सचेतना’ ने सनातन साहित्य के संरक्षण का लिया संकल्प
गुरुग्राम, 29 जुलाई। भारतीय सनातन साहित्य को साहित्य की मुख्यधारा में प्रतिष्ठित करने तथा उसे जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से स्थापित विश्व के प्रथम सनातन साहित्यिक मंच “साहित्यिक सचेतना” द्वारा प्रथम गुरुपूर्णिमा महोत्सव का भव्य एवं आध्यात्मिक आयोजन गढ़वाल सभा स्थित श्री बद्रीकेदारनाथ मंदिर, रवि नगर, गुरुग्राम में श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, साहित्यकार, समाजसेवी एवं सनातन संस्कृति के अनुयायी शामिल हुए। पूरे कार्यक्रम के दौरान गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों की महिमा का व्यापक संदेश दिया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गुरु पूजन, हवन एवं अतिथि सत्कार के साथ हुआ। मंदिर परिसर आध्यात्मिक वातावरण से सराबोर दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ वैदिक अनुष्ठानों में भाग लिया। इसके पश्चात गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित सतवाणी, आध्यात्मिक प्रवचन एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें गुरु की महिमा और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तृत विचार रखे गए।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं साहित्यिक सचेतना के संस्थापक तथा मार्गदर्शक पूज्य गुरुदेव श्री नरेंद्र रावत ‘नरेन’ ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु ही वह शक्ति हैं जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु केवल शिक्षा देने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के सच्चे मार्गदर्शक होते हैं, जो आत्मबोध से ब्रह्मबोध तक की यात्रा का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
उन्होंने गुरुपूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह दिन महर्षि वेदव्यास के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन, महाभारत और अनेक पुराणों की रचना कर भारतीय ज्ञान परंपरा को अमर बनाया। इसी कारण उन्हें महागुरु और विश्वगुरु की संज्ञा दी जाती है। उन्होंने चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चार वर्ण व्यवस्था, चार आश्रम, तीन ऋण तथा भारतीय संस्कारों की महत्ता को सरल एवं तार्किक शैली में समझाते हुए उपस्थित जनसमूह से सनातन संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के अभियान में सहभागी बनने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में आध्यात्मिक प्रवचनों के साथ-साथ साहित्यिक प्रस्तुतियों ने भी सभी का मन मोह लिया। 50 से अधिक श्रद्धालुओं ने सतवाणी का अमृतरस ग्रहण किया, जबकि 20 से अधिक साहित्यकारों और श्रद्धालुओं ने गुरु महिमा पर आधारित अपनी रचनाओं, कविताओं और विचारों के माध्यम से गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। उनकी प्रस्तुतियों ने उपस्थित लोगों को आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत कर दिया।
काव्य गोष्ठी में आदरणीया प्रीति डिमरी ‘प्रीत’, उर्मिला जी, देवेंद्र राघव जी, किरण कांडपाल जी, आकाश जी, रामसिंह भंडारी जी, बृजेंद्र रावत जी, अनूप नौटियाल जी, दिनेश रावत जी, देवेंद्र रौतेला जी, मोहनसिंह रावत जी, मनीषा त्यागी जी तथा योगेश गहतोड़ी जी सहित अनेक साहित्यकारों ने गुरु महिमा, भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्र चेतना पर आधारित अपनी प्रभावशाली रचनाओं का पाठ किया। उनकी भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया और श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम में मदन सिंह ठाकुर, सोवन नयाल, चंदन बिष्ट, सुमंत नेगी, प्रदीप नेगी, भवान सिंह बिष्ट, सुरेश चंद्र काला, करन सिंह बिष्ट, कैलाश जीना, कुबेर जमनाल, पूरन सिंह बिष्ट, संजय किश्वान, अनिल मिश्रा, सतीश चंद तथा पंडित सुमित शास्त्री सहित 50 से अधिक गणमान्य व्यक्तियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। सभी ने भारतीय संस्कृति और गुरु परंपरा के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजनों को समय की आवश्यकता बताया।
कार्यक्रम का संचालन साहित्यिक सचेतना एवं स्वास्तिक मासिक पत्रिका की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सम्पादिका प्रीति डिमरी ‘प्रीत’ ने अत्यंत प्रभावशाली और गरिमामयी शैली में किया। उन्होंने मंच संचालन के दौरान गुरुपूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व, भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा और समाज में साहित्यकारों की भूमिका पर भी अपने विचार व्यक्त किए। उनकी सशक्त प्रस्तुति ने पूरे कार्यक्रम को अनुशासित, रोचक और प्रेरणादायक बनाए रखा।
आयोजन की सफलता में मुख्य यजमान देवेंद्र राघव, मुख्य व्यवस्थापक रामसिंह भंडारी एवं मोहनसिंह रावत सहित संस्था के पदाधिकारियों, साहित्यकारों, स्वयंसेवकों और सहयोगियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सभी ने सामूहिक रूप से व्यवस्थाओं का संचालन कर कार्यक्रम को सफल बनाया। आयोजन में उपस्थित लोगों ने व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए संस्था के प्रयासों की प्रशंसा की।
महोत्सव के समापन पर भव्य महाप्रसाद (भंडारे) का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 500 से अधिक श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। श्रद्धालुओं ने इसे केवल भोजन नहीं, बल्कि गुरु कृपा और आध्यात्मिक प्रसाद के रूप में स्वीकार किया। पूरे आयोजन में सेवा, समर्पण और सामाजिक एकता की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
इस अवसर पर उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने महर्षि वेदव्यास को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए भारतीय सनातन संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और मानवीय मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन का सामूहिक संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति और सनातन साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
साहित्यिक सचेतना के पदाधिकारियों ने घोषणा की कि यह प्रथम गुरुपूर्णिमा महोत्सव संस्था की आध्यात्मिक एवं साहित्यिक यात्रा का ऐतिहासिक प्रारंभ है। भविष्य में देशभर में सनातन साहित्य, भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, राष्ट्र चेतना और मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए नियमित रूप से जनजागरण कार्यक्रम, साहित्यिक गोष्ठियां, संगोष्ठियां और सांस्कृतिक आयोजन किए जाएंगे, ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सके।
आध्यात्मिक आस्था, साहित्यिक चेतना और भारतीय संस्कृति के समन्वय से संपन्न यह आयोजन गुरुपूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धा, ज्ञान और संस्कार का प्रेरणादायी संदेश देकर संपन्न हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं और साहित्यकारों ने इसे एक ऐतिहासिक पहल बताते हुए विश्वास व्यक्त किया कि “साहित्यिक सचेतना” भविष्य में भी भारतीय सनातन साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


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