उत्तराखंड/हरिद्वार। उत्तराखंड में गुटखा और तंबाकू उत्पादों की बिक्री के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई शुरू हो गई है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर ऑपरेशन प्रहार के तहत 16 अक्टूबर को हरिद्वार कोतवाली नगर पुलिस ने खड़खड़ी, भूपतवाला और भीमगोड़ा क्षेत्रों में दुकानों पर छापेमारी की। पुलिस ने कोटपा अधिनियम के तहत चालान की कार्रवाई करते हुए दुकानदारों को प्रतिबंधित तंबाकू उत्पादों की बिक्री नहीं करने की सख्त चेतावनी दी। पुलिस ने अभियान को लगातार जारी रखने की बात भी कही है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
नशे के खिलाफ कार्रवाई निश्चित रूप से जरूरी है। युवाओं और बच्चों को नशे से बचाना सरकार, प्रशासन और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। लेकिन इस कार्रवाई के बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या उत्तराखंड में नशे के खिलाफ अभियान केवल छोटी दुकानों तक सीमित रहेगा, या उन बड़े कारोबारियों, थोक विक्रेताओं, आपूर्तिकर्ताओं और नशे के संगठित नेटवर्क तक भी पहुंचेगा, जहां से इस कारोबार को ताकत मिलती है?
छोटी दुकानों पर कार्रवाई, बड़े कारोबारियों पर कब?
गुटखा बेचने वाली दुकानों पर चालान करना कानून के दायरे में आने वाली कार्रवाई हो सकती है। लेकिन यदि प्रतिबंधित उत्पाद बाजार में लगातार उपलब्ध हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि उनकी आपूर्ति कहां से हो रही है? उन्हें थोक में कौन पहुंचा रहा है? किन गोदामों में उनका भंडारण हो रहा है? और यदि प्रतिबंध के बावजूद इनकी बिक्री जारी है, तो जिम्मेदार आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ कितनी कार्रवाई हुई है?
यदि पुलिस केवल दुकानों पर छापेमारी करके छोटे दुकानदारों का चालान करती रहेगी, तो क्या नशे के कारोबार की जड़ें कमजोर हो पाएंगी?
सरकार और पुलिस को चाहिए कि वे कानून के अनुसार केवल खुदरा विक्रेताओं तक सीमित न रहें, बल्कि जांच के जरिए आपूर्ति शृंखला, थोक विक्रेताओं और संबंधित कंपनियों तक भी पहुंचें। दोषी पाए जाने वालों पर समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का उद्देश्य केवल चालान काटना नहीं, प्रतिबंधित कारोबार को प्रभावी ढंग से रोकना भी होना चाहिए।
शराब की दुकानों और मोहल्लों में नशे पर सरकार से सवाल
उत्तराखंड में शराब की बिक्री और उसके सामाजिक प्रभाव को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। आवासीय क्षेत्रों के आसपास शराब की दुकानों की उपलब्धता, स्थानीय स्तर पर अवैध शराब की बिक्री और युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति चिंता के विषय हैं।
ऐसे में सरकार से सीधा सवाल है कि यदि गुटखे की बिक्री रोकने के लिए अभियान चलाया जा सकता है, तो शराब की दुकानों के नियमों का पालन सुनिश्चित करने और अवैध शराब के कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई के लिए भी इसी तरह की सख्ती क्यों नहीं दिखाई देती?
जहां भी नियमों के विरुद्ध शराब की बिक्री हो रही है, जहां अवैध रूप से कच्ची शराब बनाई या बेची जा रही है, वहां आबकारी विभाग और पुलिस को संयुक्त अभियान चलाना चाहिए। आवासीय इलाकों में दुकानों की स्थिति, निर्धारित नियमों और स्थानीय लोगों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
यह भी जरूरी है कि वैध शराब बिक्री और अवैध शराब कारोबार के बीच अंतर स्पष्ट रखा जाए। सवाल किसी एक कारोबार को चुनकर निशाना बनाने का नहीं, बल्कि हर प्रकार के नशे से होने वाले नुकसान को रोकने का है।
मेडिकल स्टोर से नशे की दवाओं तक, कार्रवाई का दायरा कितना व्यापक?
नशे की समस्या केवल गुटखे तक सीमित नहीं है। प्रतिबंधित या अवैध रूप से बेची जाने वाली नशीली दवाएं, इंजेक्शन और गोलियां भी गंभीर चिंता का विषय हैं। यदि कोई मेडिकल स्टोर नियमों के विरुद्ध ऐसी दवाओं की बिक्री करता है, तो औषधि नियंत्रण विभाग और पुलिस को साक्ष्यों के आधार पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेलने वाले संगठित नेटवर्क की पहचान करना भी जरूरी है। इसके लिए केवल सड़क पर अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। संदिग्ध आपूर्ति शृंखलाओं, अवैध बिक्री के ठिकानों और आर्थिक लेन-देन की जांच भी आवश्यक है।
यदि किसी नशा तस्कर को किसी प्रभावशाली व्यक्ति, नेता या अधिकारी का संरक्षण मिलने के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हालांकि, किसी व्यक्ति पर संरक्षण देने का आरोप बिना प्रमाण सिद्ध तथ्य की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए। कानून की कसौटी सभी के लिए समान होनी चाहिए।
क्या नशे के खिलाफ कार्रवाई गरीबों तक ही सीमित रहेगी?
यही इस पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। क्या पुलिस की कार्रवाई का प्रभाव केवल उन छोटे दुकानदारों पर दिखाई देगा, जिनकी दुकान से परिवार का भरण-पोषण होता है? या फिर उन लोगों पर भी कार्रवाई होगी, जो बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित उत्पादों की आपूर्ति करते हैं और जिनके खिलाफ जांच के लिए अधिक संसाधनों और साहस की जरूरत होती है?
गरीब दुकानदार को कानून तोड़ने की छूट नहीं मिलनी चाहिए, लेकिन बड़े कारोबारी को उसके प्रभाव, धन या कथित राजनीतिक पहुंच के कारण कोई रियायत भी नहीं मिलनी चाहिए। कानून का निष्पक्ष पालन ही जनता का भरोसा मजबूत करता है।
यदि किसी उत्पाद पर प्रतिबंध है, तो उसकी बिक्री रोकने के लिए खुदरा स्तर से लेकर उत्पादन, भंडारण और वितरण तक पूरी व्यवस्था की जांच होनी चाहिए। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो और निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।
उत्तराखंड की युवा पीढ़ी को नशे से कौन बचाएगा?
आज सबसे बड़ी चिंता प्रदेश की युवा पीढ़ी का भविष्य है। नशे की लत परिवारों को आर्थिक और सामाजिक संकट में डालती है, शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं को प्रभावित करती है तथा कई बार अपराध की ओर भी धकेल सकती है। इसलिए नशे के खिलाफ अभियान किसी एक विभाग की औपचारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि व्यापक जनहित का विषय है।
सरकार को पुलिस, आबकारी विभाग, औषधि नियंत्रण विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना चाहिए। अवैध शराब, नशीली दवाओं और प्रतिबंधित तंबाकू उत्पादों की आपूर्ति पर निगरानी बढ़ाई जाए। नशे की लत से जूझ रहे युवाओं के लिए उपचार, परामर्श और पुनर्वास की सुविधाएं भी मजबूत की जाएं।
सरकार जवाब दे: कार्रवाई छोटी दुकानों तक या पूरे नेटवर्क तक?
हरिद्वार पुलिस की कार्रवाई को नशे के खिलाफ एक कदम माना जा सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि आगे जांच कहां तक पहुंचती है और अवैध कारोबार पर कितना प्रभाव पड़ता है।
उत्तराखंड सरकार और पुलिस प्रशासन से पांच सीधे सवाल हैं—
प्रतिबंधित गुटखा और तंबाकू उत्पाद दुकानों तक पहुंचाने वाले थोक विक्रेताओं और आपूर्तिकर्ताओं की जांच कब होगी?
अवैध कच्ची शराब की बिक्री और नशीली दवाओं के कारोबार पर कितनी प्रभावी कार्रवाई की जा रही है?
नियमों के विरुद्ध नशीली दवाएं बेचने वाले मेडिकल स्टोरों के खिलाफ कार्रवाई की निगरानी कौन कर रहा है?
यदि किसी अवैध कारोबारी को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण मिलने की शिकायत आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित होगी?
नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के परिणाम जनता के सामने सार्वजनिक रूप से कब रखे जाएंगे?
संपादकीय निष्कर्ष: नशे के खिलाफ अभियान का स्वागत होना चाहिए, लेकिन अभियान की कसौटी केवल छापेमारी और चालान की संख्या नहीं हो सकती। असली कसौटी यह है कि नशे की आपूर्ति कितनी रुकी, अवैध कारोबारियों पर कितनी कार्रवाई हुई और कितने युवाओं को नशे की गिरफ्त में जाने से बचाया गया।
उत्तराखंड सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि उसका लक्ष्य केवल छोटी दुकानों पर कार्रवाई करके अभियान की तस्वीर पेश करना है या नशे के कारोबार की जड़ों तक पहुंचकर युवा पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित करना।
जनता को दिखने वाली कार्रवाई से अधिक जरूरी है ऐसी कार्रवाई, जिसका असर नशे के पूरे नेटवर्क पर दिखाई दे। कानून गरीब और अमीर, छोटे दुकानदार और बड़े कारोबारी—सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। तभी नशामुक्त उत्तराखंड का संकल्प धरातल पर उतर सकेगा।
— अवतार सिंह बिष्ट हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
