लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि जनता को अपनी बात कहने, समाज के हित में आवाज उठाने और सरकार की नीतियों एवं निर्णयों पर असहमति जताने की स्वतंत्रता होती है। जब नागरिकों को लगता है कि उनकी समस्याओं को अनसुना किया जा रहा है, तब वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के माध्यम से अपनी मांगों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं।

दिल्ली के जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला इसी संदर्भ में सवालों के घेरे में है। यह स्थल करीब साढ़े तीन दशक से लोकतंत्र का जीवंत प्रतीक रहा है, जहां लोग इस उम्मीद के साथ आंदोलन करने पहुंचते थे कि उनकी आवाज सत्ता में बैठे लोगों तक पहुंचेगी।

ऐसे स्थल को अगर बिना किसी ठोस वजह के प्रदर्शन के लिए स्थायी तौर पर अनुपलब्ध कर दिया जाए तथा कुछ ऐसे स्थानों का विकल्प दिया जाए, जो शहर के केंद्र से दूर हों और आम लोगों के लिए सुविधाजनक न हों, तो क्या इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित करने के रूप में नहीं देखा जाएगा! ऐसे में यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए उपलब्ध महत्त्वपूर्ण स्थानों को सीमित करके क्या असहमति की आवाज को नियंत्रित किया जा सकता है?

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने रविवार को एक आदेश जारी कर प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को निर्धारित स्थलों की सूची से हटा दिया है। यानी यहां अब कोई भी नागरिक अपनी असहमति या मांग को लेकर आवाज बुलंद नहीं कर पाएगा। जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शनों की शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में हुई थी। उसके बाद से यह स्थल अन्ना हजारे के अनशन से लेकर नीट पेपर लीक के खिलाफ हाल के आंदोलन तक का गवाह रहा है।

सवाल है कि अब ऐसा क्या हुआ कि शासन-प्रशासन को जंतर-मंतर पर किसी भी तरह के प्रदर्शन पर स्थायी रोक लगानी पड़ी? यह सवाल इसलिए गंभीर है, क्योंकि पुलिस का यह आदेश ऐसे समय में आया है, जब देश की राजधानी में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में प्रदर्शनों का दौर जारी है।

हाल में काकरोच जनता पार्टी की ओर से जंतर-मंतर पर बुलाए गए प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था को बनाए रखने का हवाला देते हुए रेल और मेट्रो सेवाओं पर सीमित पाबंदी के साथ सुरक्षाबलों ने जिस तरह की नाकेबंदी की, उससे यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि क्या सरकार जनता के विरोध को अब खुद के लिए असुविधा के रूप में देख रही है? जंतर-मंतर के विकल्प के तौर पर दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित किया है।

रामलीला मैदान जंतर-मंतर से चार किलोमीटर दूर है, जबकि सीबीडी मैदान करीब बारह किलोमीटर और बुराड़ी मैदान लगभग इक्कीस किलोमीटर दूर है। इन स्थलों पर आए दिन कई कार्यक्रम होते रहते हैं और ऐसे में यहां पर बड़े प्रदर्शन के लिए जगह मिलना आसान नहीं होगा। लोकतंत्र में जनता की असहमति को सरकार के खिलाफ गतिविधि से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। समस्याओं का समाधान प्रदर्शन स्थलों को समाप्त करने या सीमित करने से नहीं, बल्कि संवाद और समन्वय से तलाशा जाना चाहिए। मजबूत लोकतंत्र वही होता है, जहां सत्ता के समर्थन के साथ-साथ उसके विरोध में उठने वाली आवाजों को भी सम्मानपूर्वक सुना जाता है।