देहरादून। उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और स्थानीय जनभावनाओं की रक्षा के संकल्प के साथ हुआ था। राज्य आंदोलन के दौरान हजारों लोगों ने पृथक उत्तराखंड का सपना इस उद्देश्य से देखा था कि प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय जनता का अधिकार सुरक्षित रहे और सरकारी संपत्तियां भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित रहें। पिछले लगभग 26 वर्षों में अनेक ऐसे मामले सामने आए, जिनमें सरकारी भूमि, नजूल भूमि, वन भूमि, ग्राम समाज की भूमि, मंदिरों की संपत्तियों तथा सार्वजनिक परिसंपत्तियों पर संगठित तरीके से कब्जे किए गए। कई स्थानों पर आलीशान होटल, रिसॉर्ट, कॉलोनियां, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े हो गए।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
राज्य के विभिन्न जिलों में समय-समय पर सामने आए मामलों ने यह संकेत दिया कि भू-माफियाओं, प्रभावशाली लोगों और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के गठजोड़ ने सरकारी अभिलेखों तक को प्रभावित किया। राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव, फर्जी दस्तावेज, अवैध नामांतरण, फ्रीहोल्ड की संदिग्ध प्रक्रियाएं तथा भूमि उपयोग परिवर्तन जैसे मामलों की परतें लगातार खुलती रहीं। अनेक मामलों में न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा और जांच एजेंसियों को कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
आज आवश्यकता केवल सीमित कार्रवाई की रह गई है। राज्य गठन के दिन से लेकर वर्तमान समय तक सरकारी, नजूल, वन, दानपात्र, चारागाह, नदी, गधेरे, तालाब तथा अन्य सार्वजनिक भूमि का जिलावार श्वेत पत्र जारी किया जाए। प्रत्येक इंच भूमि का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए। जिस भूमि पर अवैध कब्जा हुआ, उसका पूरा विवरण जनता के सामने रखा जाए। कब्जा करने वाले व्यक्ति, संस्था अथवा कंपनी का नाम सार्वजनिक हो तथा संबंधित भूमि तत्काल सरकारी नियंत्रण में लाई जाए।
राजस्व विभाग, विकास प्राधिकरण, नगर निकाय, तहसील, रजिस्ट्रार कार्यालय तथा अन्य विभागों में तैनात रहे उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भी जवाबदेही तय की जाए, जिनके कार्यकाल में सरकारी भूमि निजी नामों पर दर्ज हुई। अभिलेखों में हेराफेरी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, अवैध नामांतरण, गलत रिपोर्ट लगाने अथवा नियमों की अनदेखी करने वाले प्रत्येक अधिकारी के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज हो। सेवा निवृत्त अधिकारी भी जांच के दायरे में आएं और दोष सिद्ध होने पर उनकी संपत्तियों की भी जांच हो।
राज्य गठन के बाद ऐसे अनेक अधिकारी और प्रभावशाली व्यक्ति सामने आए जिनकी आय की तुलना में संपत्तियां कई गुना अधिक बताई जाती हैं। ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच समय की मांग बन चुकी है। प्रत्येक संदिग्ध संपत्ति का आय के स्रोत से मिलान किया जाए। जिनकी संपत्ति वैध आय से मेल खाती हो, उनका रिकॉर्ड स्वतः स्पष्ट हो जाएगा। जिन मामलों में गंभीर अंतर मिले, वहां कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो।
राज्य में बड़े स्तर पर भूमि खरीद की भी व्यापक जांच आवश्यक है। अनेक मामलों में भूमि अलग-अलग व्यक्तियों, रिश्तेदारों, सहयोगियों अथवा कंपनियों के नाम पर खरीदे जाने के आरोप समय-समय पर सामने आए हैं। जांच एजेंसियां वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचें और यह पता लगाया जाए कि अंतिम स्वामी कौन है, धन का स्रोत क्या है तथा खरीद के पीछे किसका संरक्षण कार्य कर रहा था।
इस पूरे प्रकरण की जांच केवल विभागीय स्तर तक सीमित रखने के स्थान पर विशेष जांच दल (SIT), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED) तथा आवश्यकता पड़ने पर आयकर विभाग सहित अन्य केंद्रीय एजेंसियों से कराई जाए। यदि किसी भू-माफिया के संबंध संगठित अपराध, हवाला नेटवर्क, बाहरी आर्थिक हितों अथवा अंडरवर्ल्ड से जुड़े पाए जाएं, तो ऐसे मामलों पर राष्ट्रीय स्तर की जांच आगे बढ़ाई जाए।
उत्तराखंड के मूल आंदोलन की भावना सरकारी संपत्तियों के संरक्षण से जुड़ी रही है। इस भावना का सम्मान तभी संभव है, जब राज्य गठन से लेकर आज तक सरकारी भूमि पर हुए प्रत्येक कब्जे की समयबद्ध जांच हो। जिस भूमि पर अवैध निर्माण खड़े किए गए, उन्हें ध्वस्त कर भूमि पुनः सरकार के नाम दर्ज की जाए। जिन अधिकारियों, कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों, भू-माफियाओं और प्रभावशाली लोगों की भूमिका सामने आए, उनके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।
राज्य की जनता लंबे समय से मांग कर रही है कि उत्तराखंड के लिए एक ऐसा स्थायी कानून बनाया जाए, जिसके तहत राज्य गठन के बाद सरकारी, नजूल और सार्वजनिक भूमि से जुड़े प्रत्येक प्रकरण की अनिवार्य जांच हो। किसी भी स्तर का राजनीतिक, प्रशासनिक अथवा आर्थिक प्रभाव जांच में बाधा बनने का अवसर प्राप्त न कर सके। प्रत्येक जिले में विशेष भूमि सत्यापन आयोग गठित हो, जो पुराने अभिलेखों का मिलान कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे।
उत्तराखंड आंदोलन का उद्देश्य केवल नया राज्य बनाना भर कभी रहा ही था। मूल लक्ष्य था जनहित, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, पारदर्शी प्रशासन और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य। आज उसी मूल परिकल्पना को सशक्त करने का समय है। सरकारी भूमि पर हुए प्रत्येक अवैध कब्जे को हटाना, दोषियों को कानून के दायरे में लाना तथा राज्य की संपत्ति को जनता के अधिकार में वापस लाना ही उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
